वीरेश कुमार त्यागी का बाढ़-विभीषिका पर केंद्रित गीत
छोड़कर कीचड़, हताशा औ’ महामारी,
जा चुका है अब घरों से बाढ़ का पानी।
जो कहानी लिख गया सैलाब धरती पर,
सभ्यता सिर धुन रही अपना, उसे पढ़कर!
कर रहे थे गर्व जिन संसाधनों पर हम,
बह गये वे बाढ़ के द्रुत वेग में, ढहकर!
था भयावह रूप ऐसा, हो गया जिसमें,
प्रार्थनाओं के स्वरों का शोर, बेमानी…।।
रौंद डाले वृष्टि ने सब अंकुरित सपने,
घर जलाया हो कहीं ज्यों आस-दीपक ने!
एक धूमिल-सी किरण के अश्व पर चढ़कर,
खोजती आँखें उन्हें, जो खो गये अपने!
थामकर उँगली विकलता की हुई बेघर,
प्यास बेबस, तिलमिलाई भूख मरजानी…।।
कह विसंगतियाँ प्रकृति की, दोष दें जिनको,
हम स्वयं देते निमंत्रण रात-दिन उनको!
देश, दुनिया की प्रगति की ओट लेकर हम,
कर रहे नित नष्ट नैसर्गिक विरासत को!
आ रही जो आपदाएँ अब जहाँ भर में,
हैं हमारी ही कर्मगत भूल अनजानी…।।
इक प्रबल सम्भावना सोई रहे जब तक,
आग जीवट की रहे उर में दबी तब तक!
है दिवाकर निज समय का जो, भला उसको,
रख सके हैं मेघ, दुख के, ढाँप कर कब तक?
झाड़कर नैराश्य, जीवन फिर उठा रँगने,
उल्लसित होकर, धरा की ओढ़नी, धानी…।।
