हिमाचलः वनों पर मंडराता रासायनिक खतरा

हिमाचलः वनों पर मंडराता रासायनिक खतरा

कुलभूषण उपमन्यु, अध्यक्ष, हिमालय नीति अभियान

इन दिनों हिमाचल प्रदेश के वनों में ग्लाइफोसेट और पैराकुएट जैसे घातक पौध नाशकों के छिड़काव के बाद मटर की फसल बिजाई के मामले सामने आए हैं। मंडी की थाची रेंज में ऐसे मामले सामने आने के बाद वन विभाग के कर्मियों द्वारा मटर की फसल बर्बाद करने की कार्रवाई की गई है।

पिछले वर्ष जब थुनाग, जंजैहली क्षेत्र में बरसात में भारी तबाही हुई थी उस समय भी ऐसी बातें निकली थीं कि उस क्षेत्र के ऊपरी इलाकों में पौध नाशक रसायनों का छिड़काव करके मटर लगाया गया था, जिससे भूस्खलन से नुकसान में भारी बढ़ोतरी हुई। अभी जो मामला सामने आया है उससे एक सवाल तो यह भी पैदा होता है कि क्या यह एकाकी मामला है या हिमाचल में अन्य जगह पर भी इस तरह का वन विनाश हो रहा है। सरकार को चाहिए कि तत्काल पूरे प्रदेश में जहां जहां बेमौसमी मटर और अन्य बेमौसमी सब्जियों का कारोबार हो रहा है, वहां सर्वे करवा कर देखा जाए कि खेतों के बाहर जंगल में तो सब्जियां नहीं उगाई जा रहीं।

हिमाचल में वन भूमि पर कब्जा करके खेती करने या छोटा मोटा आश्रय या गोशाला बना कर जम जाने का पुराना इतिहास रहा है। खास कर जब से व्यवसायिक खेती की बात आगे बढ़ी है, तबसे इस प्रवृत्ति में बढ़ोतरी हुई है। 80 के दशक में चिपको आंदोलन के सिलसिले में मैंने आदरणीय सुंदरलाल बहुगुणा जी के साथ पूरे हिमाचल का भ्रमण किया था, उसके बाद भी हम लोग दूरदराज इलाकों में हर वर्ष पैदल यात्राएं करते थे।

उस समय आलू और सेब के लिए वन भूमि पर कब्जे की प्रक्रिया चल रही थी। पहले ढलानों को धीरे धीरे नेपाली मजदूर रख कर साफ करवाया जाता और उसमें आलू लगाने के साथ-साथ सेब के पौधे लगा लिए जाते। वह वनों में काटो और कमाओ के नारे का युग था।

प्राइवेट सेल के माध्यम से किसानों की जमीन के नाम पर निजी ठेकेदार जंगल से भारी मात्रा में इमारती लकड़ी काट कर उसमें मिला कर स्मगल कर लेते थे। नेरवा में इस तरह के धंधे में लिप्त लोगों के 72 हजार स्लीपर पकड़े गए थे। छाजपुर के जंगल में कई बगीचे पहले आलू के खेत बने फिर सेब के बगीचे बन गए।

एक पदयात्रा में 1986 के आसपास जुब्बल और ननखड़ी के बीच में चूंजर में पुराने तालाब और उससे लगती ढलानों में आलू की खेती हो रखी थी। किंतु तब तक यह काम छोटे पैमाने पर था। हाथ से खुदाई करते समय लगता था। किंतु इन पौध नाशक रसायनों ने तो काम बहुत ही आसन कर दिया है। छिड़काव करो और ढलान में सीधे मटर या अन्य सब्जियां लगा दो। ढलान में जो स्थायी खेत बने हैं, उनको सीढ़ीदार खेत बना कर खेती होती है, जिससे भूमि कटाव नहीं होता है। किंतु यह तो फटाफट मामला है और मेहनत भी कम। बेमौसमी सब्जी के दाम भी ऊंचे मिल जाते हैं, जिससे यह लाभकारी गतिविधि बन गई है। इसलिए बहुत ही सावधानी और सतत निगरानी की जरूरत आन पड़ी है।

हैरानी की बात है कि वन विभाग के कानों तक यह बात इतनी देर से पंहुच रही है। इस तरह के कामों में कहीं न कहीं राजनीतिक संरक्षण की भी बातें सामने आती हैं। लोग और विभाग भी कई बार जानते हुए भी चुप रहते हैं। किंतु अब तो यह मामला वनों के लिए एक बड़े खतरे का रूप ले चुका है। इसलिए सरकार को व्यापक अभियान चला कर पूरे प्रदेश में जहां-जहां बेमौसमी सब्जी का बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा है, वहां देखना चाहिए कि जंगल तो इसकी चपेट में न आ जाएं।

सरकार मिशन 32% चला कर प्रदेश के 32 प्रतिशत भू भाग पर वनीकरण की योजना बना रही है, किंतु ऐसी हालत में सफलता संदिग्ध ही रहेगी। इस रासायनिक छिड़काव से सबसे ज्यादा हानि 6 से 8 हजार फीट ऊंचाई वाले क्षेत्रों में दुर्लभ जैव विविधता को हो रही है। उपरोक्त योजना में लक्ष्य तो संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र को सुधारने का रखा गया है, जो वनों को देखने की सही दृष्टि है। किंतु इन रासायनिक हमलों से यदि वन क्षेत्र को नहीं बचाया गया तो यह लक्ष्य कैसे प्राप्त किया जा सकता है।

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के थाची रेंज के जंगलों में ग्लाइसोफेट का कहर। फोटो सोशल मीडिया

ग्लाइफोसेट जैसे रसायन सब तरह से घातक हैं। इनके संपर्क में आने से कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है। जैव विविधता के नाश से आजीविका के भी कई संसाधन नष्ट हो जाते हैं। ये रसायन वनक्षेत्र की मिट्टी में उपस्थित जीवाणुओं को नष्ट करके कार्बन प्रचूषण क्षमता को भारी नुकसान पंहुचाते हैं। जगलों से बह कर ये रसायन आसपास के जल स्रोतों को जहरीला बना कर जल जीवों के लिए भी खतरा बन जाते हैं।

इन रसायनों से प्रभावित मिट्टी में जो फसल पैदा होती है उसमें भी इनके जहरीले तत्व आने की पूरी संभावना रहती है, जिस पर भी शोध किया जाना चाहिए। केरल सरकार इन रसायनों को पहले ही प्रतिबंधित कर चुकी है। केंद्र सरकार ने भी इस आशय के दिशा निर्देश जारी किए हैं।

इन रसायनों की बिक्री पर ही प्रतिबंध लग जाना चाहिए। राज्य में कृषि बीज और कीटनाशक दवाइयां बिक्री करने वाले ही इन दवाओं को उपलब्ध करवाते हैं और इन रसायनों को बनाने वाली कंपनियां नई नई लुभावनी जानकारियां विज्ञापनों के माध्यम से फैलाती रहती हैं।
आजकल बड़े पेड़ों को सुखाने की दवाइयों के सोशल मिडिया पर विज्ञापनों की बाढ़ आई हुई है। ऐसे विज्ञापनों पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए। हिमालय नीति अभियान कई दिनों से इन पौध नाशक रसायनों पर प्रतिबंध लगाने के लिए सरकार से भी अनुरोध कर रहा है। वनों के विनाश में इनके योगदान को देखते हुए हम हिमालय निति अभियान की ओर से पुन: सरकार से मांग करते हैं कि इस दिशा में शीघ्र प्रभावी कार्यवाही करके इस खतरे से निपटने का काम करे।

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