डॉ रीटा अरोड़ा की लघु कथा – वह छोटी सी ना

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

लघुकथा

वह छोटी सी ना

डॉ रीटा अरोड़ा

 

“मैंने कह दिया ना, मुझे यह ठीक नहीं लगता।”

पति ने थोड़े खीझे स्वर में कहा, “तो हर बार तुम्हारी मर्जी से ही होगा क्या?”

वह कुछ पल उसे देखती रही। फिर धीरे से बोली,
“नहीं… हर बार मेरी मर्जी से क्यों होगा? लेकिन हर बार तुम्हारी मर्जी से भी तो नहीं होना चाहिए।”

“तुम फिर वही बात शुरू कर रही हो।”

“मैं बात शुरू नहीं कर रही,” वह बोली, “बस आज मन में जो है, कह रही हूँ।”

वह कुछ देर चुप रही।

“सालों से तुम्हारी पसंद, घर की जरूरत, बच्चों की जिम्मेदारी… सबके साथ चलती रही। कभी मन नहीं था, फिर भी किया। कई बार अपनी बात छोड़ दी, सिर्फ इसलिए कि घर में बात न बढ़े।”

पति ने कहा, “तो मैंने तुम्हें कभी मजबूर किया है?”

वह हल्का-सा मुस्कुराई।
“मजबूर? नहीं। शायद जरूरत ही नहीं पड़ी।”

वह उसकी तरफ देखने लगा।

“तुम्हें पता ही नहीं चला कि कितनी बार मैंने ‘ठीक है’ सिर्फ इसलिए कहा क्योंकि मुझे बहस नहीं करनी थी।”

“तो अब क्या चाहती हो?”

वह कुछ क्षण चुप रही।

“बस… जब मैं ‘नहीं’ कहूँ, तो उसे भी जवाब समझो। जिद या अपमान नहीं।”

पति ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गया।

वह उठी और धीरे से बोली,
“आज पहली बार मुझे अपनी बात कहने के बाद भी अपराधबोध नहीं हो रहा।”

वह कमरे से बाहर चली गई।

पति वहीं बैठा रहा।

शायद उसे अभी भी लगा हो कि बात छोटी थी।
बस, अब वह छोटी बात उसके भीतर बहुत बड़ी हो चुकी थी।

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