कसौली में देश की पहली बियर फैक्ट्री, जनरल डायर से रिश्ता

कसौली डायरी -2

कसौली में देश की पहली बियर फैक्ट्री, जनरल डायर से रिश्ता

संजय श्रीवास्तव

कसौली में सड़कें पतली हैं और इनकी हालत भी कुछ खस्ता. जब तक कैंट इलाका शुरू नहीं हो जाता. वहां साफसुथरी और उम्दा सड़कें मिलती हैं. जैसे ही कसौली में इंट्री लेते हैं तो एक जगह है गढ़खल, यहां बहुत जाम लगता है. इसी से लगा है एक चौक यानि चौराहा. सामने ही जो रास्ता जा रहा, उसी से कार लेकर आगे बढ़ता हूं. पतली, कच्ची -पक्की, उबड़ खाबड़ सड़क. चुनिंदा घरों और दो चार दुकानों के बीच से निकलती हुई. बमुश्किल से ये रास्ता 300 मीटर दूर एक फैक्ट्री के गेट पर ले जाता है. 1850 के दशक में यहीं पर देश की पहली सफल ब्रुअरी यानि बियर बनाने की फैक्ट्री लगी. कंपनी के मालिक थे एडवर्ड डायर यानि जलियांवाला बाग के खलनायक ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर के पिता. जिनमें जोखिम लेने की क्षमता थी और था एक चतुर बिजनेस माइंड, जिसने ब्रिटिश भारत में उनके वारे न्यारे कर दिए.

फैक्ट्री गेट बगल में सुरक्षा गार्ड केबिन. बोर्ड पर लिखा है – मोहन मीकिन लिमिटेड, स्टेबलिश्ड – 1855, कसौली डिस्टलरी. यहीं पर आजकल देश की प्रसिद्ध रम ओल्ड मांक और व्हिस्की सोलन नंबर वन बनती है. किसी जमाने में यहीं बियर बनाई जाती थी. गेट पर सुरक्षा गार्ड फैक्ट्री में अंदर जाने से साफ मना कर देता है. हां एक राहत जरूर देता है कि बगल वाली कच्ची सड़क से 200 मीटर पीछे चले जाइए, वहां से फैक्ट्री का कुछ हिस्सा नजर आ जाएगा, जो आपके लिए काफी है.

सामने पूरी डिस्टलरी नजर आ जाती है. घरघराती हुई मशीनें. सामने लकड़ी के तमाम पीपे. जिसमें द्रव को कम से कम सालभर के लिए रखकर छोड़ दिया जाता है, ये फर्मेंटेशन और मेच्योरेशन का काम करते हैं. सोलन में आज भी इसके लिए लकड़ी के बड़े ड्रमों या पीपों का इस्तेमाल होता है, जिन्हें ‘ओक कैस्क’ या ‘वेट्स’ कहते हैं.

गेट पर खड़ा काले रंग का स्टीम इंजन सबसे बड़ा कौतुहल था. दरअसल ये लोकोमोटिव बॉयलर का काम करता था. इसे इंग्लैंड से 1906 में खरीदकर लाया गया. ये वर्ष 2006 तक काम करता रहा. बैकगेट का सेक्योरिटी गार्ड बताता है, आपको पीछे से ये फैक्ट्री अगर छोटी लग रही है तो ऐसा नहीं है. ये काफी बड़ी है. काफी लोग काम करते हैं.

अब कहानी तब से शुरू करते हैं जब ईस्ट इंडिया कंपनी पूरे भारत में पैर पसारकर काबिज हो चुकी थी. सेना की गारदें पूरे देश में फैल चुकी थीं. उत्तर भारत में 19 सदी के मध्य तक कसौली एक बड़ी सैनिक छावनी बन चुकी थी. आसपास कुछ और सैन्य छावनियां. हर शाम अंग्रेज अफसर और जवान बियर और शराब के जाम छलकाते थे. ये उनकी जिंदगी को रंगीन करने के लिए बहुत जरूरी थी. ये तब इंग्लैंड से समुद्री जहाजों से आती थी. खपत खासी.

19वीं सदी के शुरू में मध्यम वर्गीय बैकग्राउंड से ताल्लुक रखने वाला एक पढ़ा लिखा अंग्रेज एडवर्ड डायर शायद अपने दोस्त अफसरों के बुलावे पर यहां आया. उसकी समझ में आ गया है कि भारत में बियर की बहुत खपत है. अगर उसकी फैक्ट्री यहीं लगा ली जाए तो बहुत मुनाफा होगा. खरीदार के रूप में अंग्रेजी राज का पूरा सिस्टम और सेना का बड़ा बाजार.

अब तलाश शुरू हुई कि ठंडी जगह की, जो बियर बनाने के लिए आदर्श हो. ये कसौली में पूरी हुई. जो बहुत ठंडी थी. यहां नेचुरल वाटर भी था. कह सकते हैं कि उसने ईस्ट इंडिया कंपनी के हुक्मरानों से बात की, उन्हें अपनी बियर फैक्ट्री भारत में ही खोलने के इरादे के बारे में बताया. वह इंग्लैंड लौटा, जिससे मशीनों और तकनीक के साथ जल्दी भारत लौटे. चंद महीनों बाद मशीनें मुंबई या कोलकाता बंदरगाह पर आ पहुंचीं. वहां से बैलगाड़ी पर लादकर यहां तक लाई गईं. साथ में आए अंग्रेज इंजीनियर कि मशीनों को इंस्टाल करें.

1855 में ब्रुमरी की मशीनें चल पड़ीं. बियर बनने लगी. बिकने लगी. डायर की बियर की मांग खूब बढ़ गई. स्वाद वही जो ब्रिटिश सैनिकों के लिए इंग्लैंड से आने वाली बियर में होता था. कसौली का ठंडा मौसम बियर बनाने के लिए अनुकूल तो था लेकिन कुछ समय बाद वहां पानी की कमी होने लगी. लिहाजा बियर बनाने का मुख्य काम यहां 20 किलोमीटर दूर सोलन ब्रुअरी में शिफ्ट कर दिया गया.

कसौली की मूल यूनिट को डिस्टिलरी में बदल दिया गया, जहां आज ‘ओल्ड मंक’ सोलन वन, सोलन गोल्ड और सोलन ब्लैक जैसे ब्रांड्स की शराब बनाई जाती है.

एडवर्ड ने इस काम में बहुत पैसा पीटा. इंग्लैंड में बड़ी और ऊंची हैसियत बनाई. उसकी उम्र ढलने लगी थी. उसने एक पार्टनर तलाशा. 1887 में डायर की कंपनी ने एच.जी. मीकिन की कंपनी से हाथ मिलाया. अब इस कंपनी का नाम था – ‘डायर मीकिन एंड कंपनी’. देश जब आजाद हुआ तो मशहूर उद्यमी पद्मश्री कपिल मोहन के पिता नरेंद्र मोहन ने इस कंपनी को खरीदा. कंपनी के साथ अब तक डायर का नाम भी चल रहा था जो भारत में जनरल डायर के कारण बहुत नकारात्मक इमेज देता था. लिहाजा नए मालिकों ने ‘डायर’ नाम हटाकर कंपनी का नाम कर दिया – ‘मोहन मीकिन ब्रुअरीज’.

आप जो ओल्ड मंक पीते हैं, वो कसौली से 1950 के दशक में लांच हुई. कसौली की डिस्टिलरी आज भी एशिया की सबसे पुरानी और सक्रिय डिस्टिलरी में एक मानी जाती है.

चलते -चलते बता दें पिछले प्रवेश द्वार पर रखा पुराना स्टीम इंजन करता क्या था. उसका इस्तेमाल अनाज पीसने वाली मिलों और अन्य भारी मशीनों को चलाने के लिए मुख्य ऊर्जा स्रोत के रूप में होता था, तब बिजली सीमित थी. बियर और व्हिस्की बनाने की प्रक्रिया में जौ को उबालना और एक निश्चित तापमान पर रखना सबसे अहम होता है. वो काम भी इस इंजन से निकलने वाली भाप से होता था, जिससे बड़े-बड़े तांबे के बर्तन गर्म रखे जाते थे. साथ ही पहाड़ों में झरने के पानी को खींचने और डिस्टिलेशन की लंबी प्रक्रिया के दौरान तरल को एक टैंक से दूसरे टैंक में भेजने में भी इस इंजन का प्रयोग होता था.

तो ये भी देश की पहली सफल ब्रुअरी की कहानी. तो अब जब आप कभी बियर का गिलास पकड़ें तो ये भी सोचें कि कैसे करीब 170 साल पहले इसे एक अंग्रेज ने बनाना शुरू किया. एक डायर ने देश को बियर पिलाई और दूसरा डायर जलियांवाला नरसंहार के चलते देश का खलनायक बन गया.

संजय श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से साभार

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