सफल चुनाव नीति और असफल अर्थनीति की मोदी सरकार
ओमप्रकाश तिवारी
क्यों आया भारतीय अर्थव्यवस्था पर संकट? कहां पर हैं इसके बीज? भारत में पिछले 12 सालों से केंद्र में भाजपा सरकार है। मोदी के नाम पर भाजपा राज्यों में चुनाव जीतती जा रही है लेकिन अर्थव्यवस्था नहीं संभल पाई।
हालांकि वह कहती रही कि भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है लेकिन असल में देश में असमानता और गरीबी के साथ बेरोजगारी ज़्यादा रही। प्रतिव्यक्ति आय में असमानता ज़्यादा रही। शेयर बाज़ार की मजबूती दिखाकर अर्थव्यवस्था का ग़ुब्बारा उड़ाया गया। अब उसकी हवा निकल चुकी है। विदेशी निवेशक भाग रहे हैं। डॉलर के मुक़ाबले रुपया कमजोर हो गया है। भुगतान संतुलन गड़बड़ा गया है। ईरान युद्ध तो बहाना है। नाकामी असली तराना है।
साल 2014 से 2026 तक खूब नारे गढ़े गए।
गुजरात मॉडल, अच्छे दिन से शुरू होकर पांच ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी और विश्वगुरु तक पहुंच गया। समय-समय पर नारे बदलते गए लेकिन चेहरा केवल नरेंद्र मोदी ही बने रहे। चंदे से मिले धन से चुनाव जीते गए। राज्य से लेकर जिले तक में आलीशान दफ्तर बनते रहे। नहीं बनी तो वह नीति जिससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती। असर और पश्चिम बंगाल चुनाव के समय भी नारे गूंज रहे थे। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो रहा है। विदेशी निवेशक शेयर बाजार से पैसा निकाल कर जा रहे थे लेकिन सब ठीक था। खूब पैसा खर्च किया गया और भाजपा चुनाव जीत गई। दोनों ही राज्यों में सरकार बनते ही पीएम मोदी को याद आया कि ईरान का अमेरिका- इजराइल के साथ युद्ध चल रहा है। डॉलर को बचाना है। एक रैली में अपील कर दी थी एक साल तक सोना मत खरीदो, गाड़ी मत चलाओ, विदेश मत जाओ। खर्च कम करो। ईरान युद्ध की वजह से अर्थव्यवस्था पर संकट है। डॉलर को बचाना है। पर क्या यही असली कारण है?
रुपया तो पिछले बारह सालों से कमजोर होता ही जा रहा है। आयात ज्यादा और निर्यात कम हो होने से भुगतान संतुलन भी बिगड़ ही रहा है।
सरकार बार-बार दोहराती है कि भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। मगर ये जीडीपी के कुल आकार का आंकड़ा है। 140 करोड़ की आबादी को जब इस जीडीपी से बांटा जाता है तो प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया में भारत 140वें नंबर के आसपास खड़ा दिखाई देता है। इस बीच बांग्लादेश, वियतनाम जैसे देश कई पैमानों पर आगे निकल गए। हम हैं कि ढोल पीटते रहे। अभी पीट ही रहे हैं।
मरीज में रोग की वजह जानने के बाद ही उसका इलाज हो सकता है। यह रोग कैसे हुआ और क्या है इसे जाने बिना ही इलाज किया जा रहा है।
ऐसे में मरीज का मरना तो तय ही है। ओक्सफेम की रिपोर्ट कहती है कि भारत के 1% अमीरों के पास 40% से ज्यादा दौलत है। नीचे के 50% के पास सिर्फ 3% दौलत है। इसका मतलब है कि देश में असमानता, गरीबी और बेरोजगारी तीनों बढ़ीं हैं। सरकार ने अपने आंकड़ों में इन तीनों को ही कम कर दिया। जैसे मिठाई पर चांदी की वर्क लगाई जाती है वैसे ही सरकार ने विकास पर चांदी का वर्क लगा दिया।
सीएमआईई के डेटा के मुताबिक युवा बेरोजगारी 20% के पार रही। नोटबंदी, जीएसटी और कोविड के बाद असंगठित क्षेत्र, एमएसएमई और किसान की कमर टूट गई। सरकारी आंकड़ों में गरीबी घटी, पर हकीकत में थाली महंगी हुई और नौकरी घटी।
इस बीच सेंसेक्स 80 हजार के पार चला गया। निफ्टी नई ऊंचाई पर पहुंच गया। इसे “भारत की ग्रोथ स्टोरी” बताया गया। जानकार बताते हैं कि शेयर बाजार का उछाल घरेलू रिटेल निवेशकों के पैसों से आया था। इससे कंपनी के मुनाफे बढ़े, लेकिन नौकरी नहीं बढ़ी। वैलुएशन इतना महंगा हो गया कि विदेशी निवेशक पैसा निकाल कर भाग रहे हैं।
2024-25 में एफआईआई ने रिकॉर्ड बिकवाली की। शेयर बाजार का गुब्बारा फूलता रहा, लेकिन असली इकोनॉमी की हवा निकलती रही। क्योंकि शेयर बाजार अर्थव्यवस्था नहीं है। यह एक तरह का जुआ घर है। यहां पर लगा धन कागाजों में बढ़ता और घटता है। उत्पादन नहीं होता है। बिना उत्पादन हुए उपभोग नहीं होता है। बिना उपभोग के उत्पादन नहीं होता है। इस तरह आर्थिकी का पूरा चक्र बिगड़ जाता है। यही हुआ है। आज डॉलर के मुकाबले रुपया 96 रुपये पर है। साल 2014 में एक डॉलर के मुकाबले में रुपया 58 से 60 रुपये हुआ करता था। 12 साल में करीब 60% की गिरावट आई है।
फॉरेन रिजर्व 700 बिलियन डॉलर है, पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई को हर हफ्ते डॉलर बेचकर रुपया संभालना पड़ रहा है। चालू खाता घाटा बढ़ रहा है। पूंजी बाहर जा रही है क्योंकि दुनिया का पैसा अब अमेरिका के AI, सेमीकंडक्टर, बायोटेक में जा रहा है।
भारत को “फ्रंटियर टेक्नोलॉजी” में छोटा खिलाड़ी माना जाता है। भारत ने एआई और सेमीकंडक्टर में प्रयास शुरू किए हैं लेकिन दूरी हो चुकी है।
समय रहते उचित कदम नहीं उठाया गया। सरकार की पूरी नीति दो-चार पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने की रही। ये लोग सरकार से लाभ लेकर अपनी पूंजी बढ़ाते रहे लेकिन देश में रोजगार नहीं पैदा किए। असमानता को दूर करने के बजाय उसकी खाई को और गहरा और चौड़ा ही किया। यही लोग अब अमेरिका सहित कई देशों में अरबों का निवेश करने वाले हैं। देश से कमया धन विदेश में जा रहा है या जाने वाला है। ऐसे में कोई विदेशी यहां पर क्यों रुकेगा या आएगा?
जाहिर है कि ईरान युद्ध महज एक बहाना है। जो संकट है वह नीतिगत नाकामी है। कच्चे तेल का दाम 110 डॉलर हुआ तो कहा गया “युद्ध की वजह से रुपया गिरा”। पर रुपया तो पिछले 10 साल से लगातार गिर रहा है। 2013 में एक डॉलर 58 रुपये में मिल जाता था। आज 96 रुपये में भी एक डॉलर नहीं मिल पा रहा है।
युद्ध न होता तो भी विदेशी निवेश भाग ही रहे थे। व्यापार घाटा बढ़ ही रहा था, मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी जीडीपी में घट रही थी। जाहिर है कि तेल का बहाना देकर नीतिगत नाकामी छुपाई जा रही है।
भाजपा की मोदी सरकार ने बीते 12 सालों में चुनाव नीति तो बनाई आर्थिक नीति नहीं बना पाई। धार्मिक कट्टरता को बढ़ाकर समाज में विभाजन और नफरत फैलाकर चंदे से मिले धन से वह चुनाव दर चुनाव जीतती रही लेकिन समाज में बेरोजगारी, गरीबी, असमानता बढ़ती रही। इसे ढंकने के लिए वह झूठे आंकड़े पेश करती रही।
जीडीपी का साइज बढ़ जरूर गया लेकिन आम आदमी की थाली छोटी हो गई। शेयर बाजार की चमक में बेरोजगारों का अंधेरा छुपाया गया। अब जब विदेशी निवेशक भाग रहे हैं, रुपया टूट रहा है, तो हकीकत सामने आ गई है। गुब्बारे की हवा निकल गई है। जिस नीति से चुनाव जीते गए उसी की वजह से अर्थव्यवस्था बेहार हो गई। एक तरह से मोदी सरकार की सफलता में ही उसकी असफलता निहित है।
