अनुपम शर्मा की कविता – जंगल अभी जिंदा है

कविता

जंगल अभी जिंदा है

अनुपम शर्मा

 

जंगल अभी जिंदा है

अक्सर कहा जाता है कि

समाज सभ्य हो गया है

पर हकीकत तो यह है कि

सभ्यता की ओट में

छिपा हुआ एक जंगल है

जहां कई भेड़िए विचरते हैं

अक्सर ये भेड़िए

सफेदपोश लिबास में छिपकर

अपनी ताकत के मद में चूर होकर

बेबस और लाचार स्त्रियों को

झूठी उम्मीद की रोशनी दिखाते हैं

और भरोसे की मिट्टी में

छल के बीज बो देते हैं

कभी-कभी यह भेड़िए

शराफत का चोला ओढ़ कर

अधिकार की कुर्सी पर बैठकर

या प्रेम का मुखौटा लगाकर

तन्हा और टूटी हुई स्त्रियों को

अपने मोहपाश में बांधकर

सपनों की नई दुनिया दिखाते हैं

सज्जनता का वेश बनाकर

छल के बीज बो देते हैं

कभी-कभी यह भेडिए

जंगली सुअरों की तरह

झुंड में आते हैं

अवसर की ओट में

अकेली और असहाय स्त्रियों को

यूं दबोचते हैं

जैसे झुंड में घिरे भेड़िए

किसी शिकार को दबोचते हैं

अंत में यह सभी भेड़िए

नोचते हैं

रौंदते हैं

और अंतत: मार डालते हैं।

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