ओम निश्चल की कविता- प्रभु जी देखो धर्म हुआ व्यापार !

कविता

प्रभु जी देखो धर्म हुआ व्यापार !

ओम निश्चल

 

प्रभु जी देखो धर्म हुआ व्यापार !

लूटो खाओ दान – दक्षिणा कौन है पूछनहार !

मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे सब आस्था के आधार

काबू कर लो जनता का मन लूटो रकम अपार

दान – चढ़ावे, सोना – चांदी,मोती-माणिक हार

इन्हें छुपा कर पुट्ठे कर लो प्रभु की कृपा अपार

नहीं ट्रस्ट हो जहां किसी पर ट्रस्टी बंटाधार

जन-धन बिछता निज कदमों में जिसके जतन हजार

प्राण वायु हैं ईश्वर के घर देते छप्पर फार

द्वार – द्वार पर माल निहारत ठरकी ठेकेदार

फूल-पान-परसादी सब में बंधा कमीशन यार

जहां नौकरी नहीं वहां अब यह ही है रुजगार

मिली भगत से सधी व्यवस्था रामलला लाचार

बचा न पाए अपना भी धन रघुकुल के आधार

अभी लोभ औ यहां लाभ की माया अपरंपार

अभी जाल में और मछलियां फंसने को तैयार

बने पुजारी कारोबारी बोलें वचन कुफ़ार

पीती भोली-भाली जनता जिनके पांव पखार

आज अयोध्या शर्मसार है सरयू है लाचार

चंद लोभियों के चलते है क्षुब्ध यहां सरकार

जहां धर्म की हर चौखट पर लंपट और लबार

कैसे निभे आस्था प्रभु जी लो फिर से अवतार !

प्रभु जी देखो धर्म हुआ व्यापार !
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