शेखर जोशी का संस्मरण – भैरवनामा

प्रतुल जोशी ने अपने पिता और प्रसिद्ध कहानीकार शेखर जोशी के संस्मरण ‘भैरवनामा’ का एक हिस्सा अपने फेसबुक वॉल पर प्रकाशित किया है। यह भैरव प्रसाद गुप्त के इलाहाबाद में रहते हुए उनके सपादकत्व पर केंद्रित है। प्रतुल जोशी से आभार सहित शेखर जी के इस रोचक संस्मरण को प्रतिबिम्ब मीडिया के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ में प्रतुल जोशी जी ने भैरव जी पर जो लिखा है वह भी यथावत दे रहे है। संपादक 

आज मेरे मानसगुरु, हिन्दी साहित्य के यशस्वी संपादक एवं उपन्यासकार,जलेस के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष भैरव प्रसाद गुप्त जी का जन्म दिवस है। 7 जुलाई, 1918 को आपका जन्म बलिया जिले के सिवान कलां गांव में हुआ था। मेरे जीवन को shape देने में भैरव जी की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हम बच्चे उन्हें प्यार से ‘ताऊजी’ कहते थे। भैरव जी पर हमारे पिताजी शेखर जोशी जी ने एक लंबा संस्मरण ‘भैरवनामा’ नाम से लिखा जो नवारुण प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तिका ‘फ़क़ीरों के शहर इलाहाबाद में ‘ में संग्रहीत है। आज उनके जन्मदिवस के मौके पर उसी संस्मरण के कुछ अंश मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। – प्रतुल जोशी

शेखर जोशी का संस्मरण – भैरवनामा

“बीसवीं शताब्दी में पचास और साठ का दशक साहित्यिक दृष्टि से स्वर्ण काल रहे थे। इस काल-खंड में हमें इलाहाबाद में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। साहित्यकारों के दो प्रमुख संगठन ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ और ‘परिमल’ तब वहाँ खूब सक्रिय थे।

शेखर जोशी

नयी प्रतिभाओं को अग्रजों के सान्निध्य में अपनी प्रतिभा निखारने का अवसर तो मिलता ही था, अग्रज पीढ़ी को भी युवा प्रतिभाओं की मानसिकता को समझने के बाद रुढ़ियों से मुक्त होने में मदद मिलती थी। भैरव जी बलिया से इलाहाबाद आ कर ई.सी.सी. में पढ़ाई के बाद कानपुर और मद्रास में समय बिताकर वर्ष 1944 में इलाहाबाद में माया प्रेस में ‘माया’ पत्रिका के संपादन से जुड़े थे। उनका प्रारम्भिक उपन्यास ‘शोले’ उनके परवर्ती उपन्यासों से इस अर्थ में बिल्कुल भिन्न था कि वह विचारधारा से शून्य अविश्वसनीय घटनाओं और संयोग-वियोग वाले कथानक से बुना गया था। इलाहाबाद की नर्सरी में जहाँ मुझ जैसे नौसिखिया को बहुत कुछ सीखने को मिला, वहीं भैरव जी के लेखन में भी एक गुणात्मक परिवर्तन आया।

कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कार निर्धारण में श्रीपत जी की ही इच्छा सर्वोपरि रही। 1955 की प्रविष्टियों में कोई भी कहानी उन्हें ऐसी नहीं लगी, जिसे पुरस्कार योग्य समझा जाता। अमरकान्त की कहानी ‘डिप्टी कलक्टरी’ को भैरव जी प्रथम पुरस्कार देने के पक्ष में थे, लेकिन दस अच्छी कहानियों को चुना गया और उनमें से पहली चार को द्वितीय पुरस्कार के लिए नामित किया गया। शेष छह कहानियों को ‘कहानी’ के साधारण अंकों में प्रकाशन के लिए रखा गया। मेरी कहानी ‘कविप्रिया’ सातवें स्थान पर रही, जिसका पारिश्रमिक तब दस या पंद्रह रुपए मुझे मिला था। प्रथम पुरस्कार की राशि 1500 रुपए तथा द्वितीय पुरस्कार की राशि एक हजार रुपए रखी गई थी। चौथी कहानी शायद किसी संदेह के कारण विवादित रही इसलिए कुल सात सौ पचास रुपए में पुरस्कार निबटा दिया गया। सम्पादक मण्डल द्वारा पुरस्कारों की घोषणा के संबंध में कुछ पंक्तियाँ पठनीय हैं, जो इस प्रकार हैं-

हमें खेद है कि 407 कहानियों में से एक भी ऐसी कहानी न मिली, जिसे पढ़ कर हम उछल पड़ते और हमारे मुँह से निकल पड़ता कि यह रही वह कहानी, जिस पर बेझिझक प्रथम पुरस्कार दिया जा सकता है। काफी उदार होकर भी हम उसमें से केवल दस कहानियाँ ही छाँट पाए। उनमें से चार को ही द्वितीय पुरस्कार, ढाई-ढाई सौ रुपए का, देना तय पाया गया।

1. डिप्टी कलक्टरी, अमरकान्त (बलिया)
2. राजा निरबंसिया, कमलेश्वर (इलाहाबाद)
3. आटे के सिपाही, आनन्द प्रकाश जैन (मेरठ)

4. विचाराधीन, इस कहानी के विषय में एक संदेह उठ खड़ा हुआ है। इसकी घोषणा बाद में होगी। संदेह निवारण होते ही, हम उन्हें सूचना देंगे, और कहानी के अगले अंक में उसकी घोषणा होगी।

शेष छह कहानियाँ ये हैं –

1. भग्गो ताई हृदयेश (शाहजहाँपुर)

2. वह इंसान था कमला चोपड़ा (दिल्ली)

3. कविप्रिया 0चन्द्रशेखर (नई दिल्ली)

4. लक्ष्मण सिंह कृष्ण बलदेव वैद (दिल्ली)

5. अजायबार – देवेन्द्र (पटना)

6. हिसाब का सवाल – जगदीश नारायण माथुर (अलीगढ़) ”

होना तो यह चाहिए था कि चयनित दस कहानियों में से श्रेष्ठ कहानी को प्रथम पुरस्कार दिया जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ‘डिप्टी कलक्टरी’ को प्रथम पुरस्कार न देने का कारण कमलेश्वर के प्रति अतिरिक्त मोह था या फिर घोर आर्थिक मितव्ययिता ?

अमरकान्त पहले ‘अमृत पत्रिका’ समाचार पत्र के सम्पादकीय विभाग में थे, बलिया से लौटे तो भैरव जी ने उन्हें अपने सहायक के रूप में सरस्वती प्रेस में नियुक्ति दिला दी। अमरकान्त के आने और श्याम संन्यासी के चले जाने के बाद ‘कहानी कार्यालय का वातावरण बहुत खुशगवार हो गया था। मार्कण्डेय, कमलेश्वर भी वहाँ आ जाते। छुटटी के बाद मैं भी स्टेशन से सिविल लाइंस पहुंच जाता। अमरकान्त प्रकाशनार्थ आई हुई ढेरों कहानियों में से चुनकर कुछ कहानियाँ भैरव जी की ओर अग्रसर कर देते। जिस दिन कोई अच्छी कहानी उनकी नजर में आ जाती, उसकी चर्चा वह हम लोगों से करते। एक दिन जब मैं ‘कहानी’ कार्यालय पहुँचा तो अमरकान्त ने अचानक ‘छुटकी भौजी बैगन को टेंगन क्यों कहेंगी’ वाक्य से मेरा स्वागत किया। मैं इस प्रकरण को सुनकर चकराया तो उन्होंने स्पष्ट किया कि उस दिन उन्होंने एक नयी लेखिका, प्रतिमा लाल की कहानी पढ़ी है, जिसका आरम्भ ही इस वाक्य से होता है।

‘कहानी’ पत्रिका के अतिरिक्त भैरव जी मासिक ‘उपन्यास’ पत्रिका का भी संपादन करने लगे थे। यह पत्रिका भी बहुत लोकप्रिय हो गई थी। कृष्ण बलदेव बैद का ‘उसका बचपन’, ‘उमराव जान अदा’ और एलन पैटन नामक एक अफ्रीकी लेखक का उपन्यास Cry My Beloved Country का अनुवाद, इत्यादि बहुत लोकप्रिय हुए। ‘कहानी’ पत्रिका को काफी विज्ञापन भी मिलने लगे थे। Audit Bureau of Circulation (ABC) का प्रमाण-पत्र भी दे दिया था। इससे उसकी आर्थिक स्थिति बेहतर हो गई थी लेकिन उसका लाभ उन लोगों को नहीं मिल पा रहा था जिनके श्रम पर इस आमदनी का आधार था। भैरव जी ने कर्मचारियों का नेतृत्व किया और श्रीपत जी से सबके लिए वेतन वृद्धि की माँग रखी। श्रीपत जी ने कोई सकारात्मक उत्तर नहीं दिया तो कर्मचारियों ने एक लिखित आवेदन प्रस्तुत किया। आवेदन-पत्र में हस्ताक्षर करने वाले जगत शंखधर भी थे, जो श्रीपत जी के मित्र और बनारस शाखा की देखभाल करने वाले थे। अब वे इलाहाबाद आ गए थे। वे श्रीपत जी के साथ उनके आवास पर रहते थे।

जब वे लोग आवेदन-पत्र ले कर श्रीपत जी के कमरे में पहुँचे तो कहा जाता है कि श्रीपत जी ने जगत जी को देख कर पूछा “दोस्ती का यही सिला है?” जगत जी ने जवाब दिया- “दोस्ती अपनी जगह, नौकरी अपनी जगह पर है।” बाद में जगत जी भी बनारस लौट गए थे।

हम दोनों भाइयों की स्कूली शिक्षा राजस्थान के अजमेर जनपद में हुई। पाँच-छह वर्ष तक हम लोग गर्मियों की छुट्टी में राजस्थान से उत्तराखंड में अपने गाँव आया-जाया करते थे। लम्बी रेल यात्रा में समय बिताने के लिए हम रेलवे बुक स्टॉल से ‘माया’ और ‘रंगभूमि’ पत्रिकाएँ खरीद लेते थे। ‘माया’ में प्रकाशित कहानियों से लड़कपन में परिचय हो गया था। आज भी याद है कि मराठी से रार सर्वटे और उर्दू से महमूद अहमद ‘हुनर’, द्वारा अनुदित कहानियाँ उनमें प्रकाशित होती थीं। पत्रिका के संपादक के रूप में माया में क्षितिंद्र मोहन मित्र का ही नाम जाता था। एक दिन मैंने भैरव जी से पूछ ही लिया कि आपने वर्षों तक माया का भी संपादन किया है। माया में प्रकाशित कहानियाँ भी अच्छी लगती थीं। उनमें खूब रोचकता और पठनीयता होती थी। लेकिन कहानी पत्रिका में जो कहानियाँ आप देते हैं, उनमें पठनीयता के साथ-साथ सामाजिक समस्याओं की भी गहरी पकड़ रहती है। आपके संपादकीय दृष्टिकोण में यह परिवर्तन लाने में क्या श्रीपत जी का निर्देशन है?

भैरव जी ने कहा, “ऐसी कोई बात नहीं। मेरे द्वारा कहानियों के चयन में श्रीपत कोई हस्तक्षेप नहीं करते और न दिशा-निर्देश देने जैसी कोई बात है। इसका एक अन्य कारण है। मैंने ‘माया’ में ख्वाजा अहमद अब्बास की एक कहानी ‘सरदार जी’ शीर्षक से प्रकाशित की थी। इस कहानी को लेकर बड़ा बवाल मचा। और किसी पाठक ने कोर्ट केस कर दिया। माया बाबू (क्षितिंद्र मोहन मित्र) मुझसे बोले, ‘महाशय जी, आपने यह विवादास्पद कहानी छापी है। आप केस को निबटाइए।’ मैं अपने वकील से मिला। वकील ने सलाह दी कि हम लेखकों की एक मीटिंग बुलाकर यह कहानी उन्हें सुनायें और उनकी राय कहानी के बारे में लें। यदि लेखकों की राय सकारात्मक हुई तो हम अपनी ओर से एक प्रतिवेदन न्यायाधीश को दे सकते हैं। आपके लिए यह हितकर हो सकता है।

मुझे वकील की राय ठीक लगी और मैंने उन्हें अपनी सहमति दे दी। लेखकों को जुटाने का काम भी वकील ने ही किया। गोष्ठी में मैंने ‘सरदार जी’ कहानी का पाठ किया। कहानी पाठ की समाप्ति के पश्चात सभी लेखकों की राय बनी दि कहानी में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। और विरोधी पक्ष को मुकदमे में मुँह की खानी पड़ेगी। न्यायाधीश का निर्णय भी हमारे पक्ष में गया। तब मुझे मालूम हुआ कि यह मीटिंग प्रगतिशील लेखक संघ की तरफ से बुलाई गई थी। तब से मैं भी संघ की मीटिंगों में जाने लगा।”

यह एक निर्विवाद तथ्य है कि जहाँ कथा पत्रिकाओं के संपादन कौशल में गुप्त जी ने देश भर में इलाहाबाद का नाम फैला दिया, वहीं इलाहाबाद की समृद्ध रचनात्मक परंपरा ने उनकी लेखकीय प्रतिभा को निखारने में भरपूर योगदान दिया। कानपुर में लिखे गए कमजोर, अविश्वसनीय वियोग-संयोग वाली प्रेमकथा ‘शोले’ के बाद ‘गंगा मैया’, ‘सती मैय्या का चौरा’, ‘धरती’, ‘एक छोटी सी शुरुआत’ जैसे उपन्यासों में भैरव जी ने सामाजिक दायित्व बोध का निर्वाह किया और ‘चाय का प्याला’ जैसी अप्रतिम कहानी दी।

उनका उपन्यास ‘गंगा मैया’ फ्रेंच भाषा में अनूदित हुआ। एक रेडियो नाटक भी बी.बी.सी. लंदन की हिंदी सेवा से प्रसारित हुआ था।

वर्ष 1959 में राजकमल प्रकाशन के संचालक श्री ओमप्रकाश के आमन्त्रण पर भैरव जी ने ‘नई कहानियाँ’ पत्रिका का संपादन राजकमल की इलाहाबाद शाखा से प्रारम्भ किया तो देखते-देखते यह पत्रिका भी काफी लोकप्रिय हो गई। यह संयोग ही है कि इस पत्रिका को अधिक पठनीय बनाने के लिए भैरव जी को डॉ नामवर सिंह का सहयोग मिल गया।

नामवर जी ने कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से अपने क्षेत्र से लोक सभा का चुनाव लड़ा था। चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली, बल्कि इसी कारण बी.एच.यू. से उनकी नियुक्ति भी निरस्त कर दी गई थी। इस मुक्तावस्था में वह अक्सर इलाहाबाद आते थे और कहानी विधा पर मित्रों के साथ बहस-मुबाहिसा होता था। भैरव जी ने उनसे आग्रह किया कि वे प्रति माह ‘नई कहानियाँ’ पत्रिका के लिए एक स्तम्भ लिख दें। नामवर जी की पुस्तक ‘कहानी-नयी कहानी’ में संकलित लेख इसी स्तंभ के लिए लिखे गए थे।

डॉ. नामवर सिंह ‘कहानी’ पत्रिका के नववर्षांक में 1957 से ही प्रति वर्ष हिंदी कहानी पर समीक्षात्मक लेख-लिखने लगे थे।”

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