लघुकथा
बुढ़ापा अब मजबूरी नहीं, मस्ती है
डॉ रीटा अरोड़ा
“अरे भाई साहब, आजकल आप पार्क में कम दिखाई देते हैं!” शर्मा जी ने पूछा।
“क्या बताऊँ! कभी दोस्तों के साथ किट्टी, कभी जन्मदिन की पार्टी, और अगले महीने गोवा जाने का कार्यक्रम है।”
“वाह! इस उम्र में इतनी मस्ती?”
“क्यों भाई, मस्ती करने की उम्र की कोई सीमा होती है क्या?”
वर्मा जी हँस पड़े, “हमने तो सारी उम्र बच्चों और परिवार के लिए ही निकाल दी। अब पोते-पोतियों के साथ खेलकर समय बिताते हैं।”
“बिल्कुल बिताइए, लेकिन अपनी जिंदगी को सिर्फ उन्हीं तक सीमित क्यों रखें? उनके अपने दोस्त हैं, हमारी अपनी दुनिया क्यों नहीं?”
“बात तो सही है। लेकिन लोग क्या कहेंगे?”
“लोग तो तब भी कहते थे, जब हम नौकरी करते थे। अब पेंशन हमारी, समय हमारा और जिंदगी भी हमारी!”
तभी मेहरा जी गुनगुनाते हुए आए, “भई, आज शाम क्लब में संगीत और डांस है। सब तैयार रहना!”
शर्मा जी मुस्कुराए, “अरे, मुझे भी ले चलना। कब तक घुटनों के दर्द और उम्र का रोना रोते रहेंगे?”
“बस, यही जज़्बा चाहिए!” वर्मा जी बोले।
मेहरा जी ने चुटकी ली, “और हाँ, बच्चों को हमारी चिंता करने दो, हमें अपनी खुशियों की चिंता करनी है!”
चारों ठहाका लगाकर हँस पड़े।
उम्र बढ़ना तय है, लेकिन उम्र के साथ जीना या सिर्फ काटना-यह चुनाव आज भी हमारा है।
~
