जसवीर त्यागी की प्रेरणा केंद्रित कविताएँ

 

जसवीर त्यागी की प्रेरणा केंद्रित कविताएँ

कर्म-पूजा

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एक मोची को
जूते बनाते हुए नजदीक से देखा
उसकी श्रमशीलता ने मुझे बांध लिया

एक कुम्हार को
बरतन बनाते हुए निहारा गौर से
उसकी एकाग्रता ने मेरा मन मोह लिया

एक किसान को
खेत में काम करते हुए अवलोका
उसके परिश्रम ने मुझे प्रेरणा से भर दिया

एक स्त्री को
घर सँवारते सहेजते हुए परखा
उसकी अनन्यता के समक्ष
झुक गया मेरा शीश

मैंने महसूस किया
ये सब अपने-अपने हुनर के महाकाव्य लिखते हैं

मैं कविता लिखने की कोशिश करता हूँ
और खुद को कवि समझता हूँ

वे सब दुनिया को रचते हैं
और अपने कर्म को पूजा समझते हैं।

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प्रेरणा

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क्यों घेर लेता है अकेलापन?
माहौल लगता है पराया-पराया

इर्द-गिर्द घूमता है
एक अजनबी-सा काला साया
सोचता हूँ अब डूब जाऊँगा

सहसा कौंध जाती हैं
तुम्हारी सजल आँखें
लगता है कुछ कह रही हैं
एक मौन पीड़ा सह रही हैं

होंठ थिरकने लगते हैं
हाँ!उठो चलो
बढ़ो आगे, डरो नहीं
मैं हूँ तुम्हारे साथ

यह देख जाग जाता हूँ
ह्रदय में फूट पड़ता है
एक अमर विश्वास

अब कभी डरूंगा नहीं
जानता हूँ
तुम हो यहीं-कहीं मेरे आसपास।

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यह जीवन

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जीवन वह नहीं
जो हम सिर्फ अपने लिए जीते हैं

जीवन वह है
जो दूसरों के लिए जीया जाता है
जैसे कोई पेड़
कोई नदी
यहाँ तक कि
आसमान में चाँद,सूरज और तारे
वे भी दूसरों के लिए जीते हैं

हम जब दूसरों को
प्रेम और प्रेरणा नहीं दे पाते

नहीं बन पाते
किसी के होठों की हँसी

और न ही कोई सपना बन
किसी की आँखों को सजा पाते हैं

तब यह जीवन
सजा लगने लगता है।

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ठिठोली

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चिलचिलाती धूप
और गर्म लू के थपेड़ों से

एक नन्हा पौधा
अपने-आप में सिकुड़ता हुआ
डरा बैठा था

मैं उसके पास गया
पानी से उसकी मित्रता करवायी

कुछ समय बाद
मैंने देखा

नन्हा पौधा
आने-जाने वालों से
ठिठोली कर रहा है।

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|| समय ||

 

पातहीन पेड़ भी
हरा हो उठता है एक दिन

सूखी नदी में
चमकने लगता है जल

भटके हुए राहगीर को
मिल जाती है मंजिल

सुनसान रास्तों पर
बसने लगती है आबादी धीरे-धीरे

समय आने पर
बंजर पड़े खेतों में
मुस्कुराने लगते हैं अंकुर

अंधेरे घर में
जगमगाता है दीया किसी रोज

असंभव और निराशा शब्दों में
छुपे होते हैं संभव और आशा

समय एक जैसा रहता नहीं सदा

करवट बदलता है वह भी
नींद से जागता है एक दिन।

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|| अभी भी दुनिया में ||

 

अभी भी फूलों से आती है सुगन्ध
अभी भी संगीत पर थिरकते हैं पांव

अपने नवजात शिशुओं को
घोसलों में अकेला छोड़
अभी भी चिड़िया निकलती हैं चुगने दाना

परदेस गये लोगों का
अभी भी करते हैं इंतजार परिवार में
बुज़ुर्ग अभी भी
किसी भटके हुए राहगीर को दिखाते हैं रास्ता

अभी भी प्रेम में की गई
हल्की-सी शरारत पर
कोई बोल सकता है
धत! बुद्धू कहीं के

मेह में भीगते हुए
किसी अजनबी को देख
अभी भी लोग खोल देते हैं किवाड़

बेहिचक दे देते हैं
लत्ते-कपड़े और चप्पल
खिला देते हैं पेट भर खाना अभी भी

बहुत सारी नयी-नयी चीजें
ले रही हैं जन्म अभी भी

अभी भी दुनिया में
बचा है बहुत कुछ सुंदर
और वह बचा रहेगा तब तक

जब तक बचा रहेगा
पृथ्वी पर एक भी आदमी शेष।

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तुम वीर योद्धा हो

 

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तुम्हें लगता है
तुम्हारे दुःख ज़्यादा हैं दूसरों से
तुम्हारे ही आँगन में
टूटकर गिरा है परेशानियों का पहाड़

दुःख के तूफान ने
तहस-नहस की है
सिर्फ़ तुम्हारी ही खुशियों की
हरी-भरी क्यारियाँ

जैसे तुम दुःख को जानते हो
वैसे ही वह भी जानता है तुम्हें

दो-चार बार के वार से
तुम घुटने टेकोगे नहीं
छोड़कर नहीं जाओगे रण भूमि
नहीं करोगे पराजय स्वीकार

जीवन-समर में लड़ोगे तुम
अपनी अंतिम साँस तक
शूरवीर हो
लड़ोगे दुःख रूपी दुश्मन से बार-बार

दुःख उतरता है
अपनी पूर्ण शक्ति के साथ
तुमसे जीतने के लिए

वह अच्छी तरह जानता-समझता है
उसका मुकाबला है अपराजेय संग

दुःख बार-बार
चुपके-चुपके पग धरता है
वह भी सच्चे वीर योद्धा से डरता है।

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