लघुकथा
बेफ़िक्री का रिश्ता
डॉ रीटा अरोड़ा
“माँ, मैं शादी क्यों करूँ? अच्छी नौकरी है, अपना पैसा है, अपनी ज़िंदगी है। शादी के बाद आज़ादी क्यों खोऊँ?” बेटी ने पूछा।
“बेटा, पिता से अपनी हर परेशानी बेझिझक कह देती हो न?”
“हाँ, वो मेरे पापा हैं।”
“भाई से लड़कर फिर हँस भी लेती हो?”
“माँ, वो मेरा परिवार है!”
माँ मुस्कुराई, “और शादी के बाद पति परिवार नहीं हो सकता?”
“पता नहीं! आजकल शादी के बाद हर बात में दखल, हर फैसले पर सवाल!”
माँ ने पूछा, “जब ऑफिस से थककर आती हो, मन उदास होता है, तब क्या कभी किसी के साथ की ज़रूरत महसूस नहीं होती?”
“होती है, माँ। लेकिन उसके लिए शादी क्यों?”
“ज़रूरी नहीं कि शादी करो। लेकिन बेटा, पैसा तुम्हें आत्मनिर्भर बना सकता है, हर भावनात्मक ज़रूरत पूरी नहीं कर सकता।”
“और अगर पति ऐसा न निकला तो?”
“तो ऐसे रिश्ते में समझौता मत करना, जहाँ तुम्हें अपनी आज़ादी साबित करनी पड़े। मगर हर रिश्ता बेड़ियाँ भी नहीं होता।”
बेटी माँ के कंधे पर सिर रखकर बोली, “माँ, ऐसा साथी सच में मिल सकता है?”
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “मिल सकता है बेटा, जिसके सामने तुम्हें हर वक्त मज़बूत बनने का दिखावा न करना पड़े।”
बेटी कुछ देर चुप रही।
“काश, माँ! ऐसा कोई मिले जिसके साथ मुझे कुछ साबित न करना पड़े।”
माँ मुस्कुराई। बेटी की आँखों में अब शादी का डर नहीं, एक अनकही उम्मीद थी।
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