राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं

राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं

1.

ख़ामोशी का मौक़ा भी मुनादी भी

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ख़ामोशी का मौक़ा भी मुनादी भी
देश-दुनिया में ताज़ा-ताज़ा क़ब्ज़ा करता
राष्ट्राध्यक्षों का अपहरण करता
सीने पर बंदूक तानता,भीख माॅंगता
नोबेल दे दो,नोबेल दे दो
है बली बहुत मगर छली अद्वितीय
बिना बुलाये कहीं भी घुस जाता
भटकता-भटकाता… उलझता-उलझाता
हा हा करता,हाथ हिलाता,ऑंखें दिखाता
ख़ुद को अकेला पाता,सुरक्षा-घेरों में
मटक-मटककर सुरक्षित मचलता
ख़ुद ही ख़ुद के प्रिय-अप्रिय नारे लगवाता
अन्नदाता-अन्नदाता, ज़िंदाबाद-ज़िंदाबाद
वह जो तन-मन-जीवन से यौनरोगी
वेश्यागामी,कपटी,विश्व-गुंडा कौन है
बोले ढक्कनछाप विश्व-गुरू असत्यश्री
काका मेरा काका अमेरिका
ट्रम्पम् शरणम् गच्छामि
बम्बम् शरणम् गच्छामि
मौक़ा भी,मुनादी भी,ख़ामोशी भी
ओम् शांति.
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2.

झूलते हुए झूलता हूँ झूला

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झूलते हुए झूलता हूँ झूला
कुछ देर इधर,कुछ देर उधर हूँ मैं
कुछ देर बीच में किन्तु ठहरता नहीं हूँ
बीच में रहते हैं जो भी,अभी या कभी भी
ज़रा-ज़रा भी पाते नहीं हैं ठौर-ठिकाना
ठीक नहीं,दोनों तरफ़ वफ़ादारी ठीक नहीं
इस तरफ़ या उस तरफ़ हो जाना ही ठीक
युद्ध का वक़्त है यही और सही-सही
बीच युद्ध के दौरान बदलना औज़ार
और बदलना उपस्थिति ठीक नहीं
अपनों में रहने से ही होता हूँ मुक्त
अपनों में मरने से ही मिलती है मुक्ति
मुक्तिबोध मुक्तिमार्ग संभावना है अब भी
जॅंगल-जॅंगल झरते हैं झरने झर-झर
खिलते हैं फूल भी ख़ुशबूदार.

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