ऋतुराज : मनुष्य की गरिमा और प्रतिरोध के कवि
प्रतिबिम्ब मीडिया परिवार की तरफ से वरिष्ठ कवि ऋतुराज जी को विनम्र श्रद्धांजलि
हिंदी कविता के वरिष्ठ और विशिष्ट स्वर ऋतुराज के निधन के साथ हिंदी साहित्य ने एक ऐसे कवि को खो दिया है जिसने लगभग छह दशकों तक कविता को मनुष्य की गरिमा, सामाजिक न्याय, करुणा और प्रतिरोध की आवाज़ बनाए रखा। उनका जाना केवल एक कवि का जाना नहीं है, बल्कि हिंदी कविता की उस परंपरा की क्षति है जो हाशिये के मनुष्यों, उपेक्षित समुदायों और जीवन के साधारण अनुभवों को केंद्र में रखकर साहित्य का निर्माण करती रही है। ऋतुराज का जन्म 10 फ़रवरी 1940 को राजस्थान के भरतपुर में हुआ था। उन्होंने लंबे समय तक अंग्रेज़ी साहित्य का अध्यापन किया और बाद में चीन रेडियो इंटरनेशनल में भाषा-विशेषज्ञ के रूप में भी कार्य किया।
समकालीन हिंदी कविता में ऋतुराज का स्थान इसलिए विशिष्ट है कि उन्होंने कविता को न तो केवल वैचारिक घोषणापत्र बनने दिया और न ही उसे मात्र कलावादी आत्मलीनता में सीमित किया। उनकी रचनाशीलता में विचार और संवेदना, सामाजिक सरोकार और कलात्मकता, यथार्थ और कल्पना का दुर्लभ संतुलन दिखाई देता है। स्वयं उनका मानना था कि आधुनिक कविता की सफलता विचार और कलात्मकता के संतुलन पर निर्भर करती है।
नई कविता के बाद जिस पीढ़ी ने हिंदी कविता को सामाजिक यथार्थ से गहराई से जोड़ा, उसमें ऋतुराज का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे उन कवियों में थे जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद के भारतीय समाज में पैदा हुए मोहभंग, असमानताओं और विडंबनाओं को गहरी मानवीय दृष्टि से देखा। उनकी कविता में सत्ता-विरोध है, लेकिन वह नारेबाज़ी नहीं बनती; उसमें करुणा है, लेकिन वह भावुकता में नहीं बदलती। यही कारण है कि उनकी कविताएँ समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होती गईं।
उनके प्रमुख काव्य-संग्रहों में मैं आंगिरस, एक मरणधर्मा और अन्य, कितना थोड़ा वक़्त, पुल पर पानी, अबेकस, नहीं प्रबोधचंद्रोदय, सुरत निरत, लीला मुखारविंद, आशा नाम नदी और स्त्रीवग्ग उल्लेखनीय हैं। इन संग्रहों को पढ़ते हुए स्पष्ट होता है कि उनका कवि-मन जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं, साधारण मनुष्यों और उपेक्षित अनुभवों में भी बड़े मानवीय अर्थ खोज लेता था।
ऋतुराज की कविता का सबसे बड़ा गुण उसकी मानवीय पक्षधरता है। वे मूलतः वंचितों, पीड़ितों और हाशिये के लोगों के कवि माने जाते हैं। उनकी कविताओं में वह समाज उपस्थित है जो विकास और प्रगति की चमकदार कथाओं में अक्सर अदृश्य बना दिया जाता है। उन्होंने उन लोगों की आवाज़ को शब्द दिए जिन्हें मुख्यधारा का विमर्श प्रायः अनसुना कर देता है।
उनकी कविताओं में आदिवासी जीवन, श्रमिक संसार, ग्रामीण संवेदना और स्त्री-अनुभव एक विशेष गहराई के साथ उपस्थित हैं। अंतरराष्ट्रीय आलोचकों ने भी उनकी कविता की इस विशेषता को रेखांकित किया है कि वे महानगरीय दबावों से मुक्त होकर साधारण मनुष्य के जीवन-संघर्षों को केंद्र में लाते हैं। उनकी कविता रोज़मर्रा के जीवन की सूक्ष्मताओं, मौन त्रासदियों और छोटे-छोटे सुख-दुखों को असाधारण कलात्मकता से व्यक्त करती है।
स्त्री के प्रश्नों को लेकर भी ऋतुराज की संवेदना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनकी चर्चित कविता कन्यादान हिंदी साहित्य और शिक्षा-जगत में व्यापक रूप से पढ़ी जाती है। इस कविता में उन्होंने पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं के भीतर स्त्री की स्थिति, उसके संघर्ष और उसकी स्वतंत्र पहचान के प्रश्न को अत्यंत मार्मिक ढंग से उठाया है। यह कविता केवल एक पिता की चिंता नहीं, बल्कि स्त्री-अस्तित्व के प्रति एक आधुनिक और संवेदनशील दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
ऋतुराज की भाषा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी उनकी विषयवस्तु। उन्होंने कविता को कृत्रिम अलंकरणों से मुक्त रखते हुए एक ऐसी भाषा विकसित की जो सहज, संप्रेषणीय और विचारोत्तेजक है। उनकी कविता को पढ़ते हुए लगता है कि शब्द किसी सजावट का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से निकलकर आए हैं। उनकी भाषा में लोकजीवन की ऊष्मा, बौद्धिक गंभीरता और मानवीय आत्मीयता का अद्भुत संगम मिलता है।
उनकी रचनाओं की एक और विशेषता उनकी नैतिक दृष्टि है। वे केवल घटनाओं का विवरण नहीं देते, बल्कि मनुष्य की गरिमा को केंद्र में रखकर समाज का मूल्यांकन करते हैं। उनकी कविताएँ हमें यह सोचने के लिए विवश करती हैं कि विकास, आधुनिकता और प्रगति के नाम पर हम किन मानवीय मूल्यों को खोते जा रहे हैं। वे बार-बार हमें उन लोगों की ओर देखने के लिए प्रेरित करते हैं जो दिखते कम हैं, लेकिन समाज की वास्तविक नींव वही हैं।
समकालीन हिंदी कविता में ऋतुराज की उपस्थिति केवल एक कवि तक सीमित नहीं थी। वे साहित्यिक-सांस्कृतिक हस्तक्षेपों के लिए भी जाने जाते रहे। भारतीय भाषाओं की उपेक्षा के विरुद्ध उन्होंने लगातार आवाज़ उठाई और साहित्य को लोकतांत्रिक बनाने के प्रयासों में सक्रिय रहे। जयपुर साहित्य उत्सव की अंग्रेज़ी-केंद्रित प्रवृत्तियों के विरोध में उन्होंने समानांतर साहित्यिक आयोजन की पहल की, जो आगे चलकर एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मंच के रूप में विकसित हुआ।
उनके साहित्यिक योगदान को अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से मान्यता मिली। उन्हें मीरा पुरस्कार, पहल सम्मान, बिहारी पुरस्कार, सुधींद्र पुरस्कार, सोमदत्त परिमल सम्मान तथा सुब्रह्मण्य भारती हिंदी सेवी सम्मान सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। किंतु किसी भी बड़े रचनाकार की तरह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि पुरस्कार नहीं, बल्कि पाठकों और साहित्यिक समुदाय के भीतर अर्जित वह नैतिक सम्मान है जो उनकी रचनाओं ने उन्हें दिलाया।
आज जब हम ऋतुराज को याद करते हैं, तो उनकी कविता की सबसे स्थायी विरासत शायद वही मानवीय दृष्टि है जो हर प्रकार के अन्याय, असमानता और अमानवीयता के विरुद्ध खड़ी होती है। उन्होंने कविता को मनुष्य के पक्ष में खड़ा रहने की कला सिखाई। उनकी रचनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि साहित्य का अंतिम सरोकार सत्ता नहीं, मनुष्य है; वैभव नहीं, जीवन है; और शोर नहीं, बल्कि वह धीमी लेकिन दृढ़ आवाज़ है जो अन्याय के विरुद्ध बोलती रहती है।
ऋतुराज का निधन हिंदी साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति है, किंतु उनकी कविताएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवित सांस्कृतिक धरोहर बनी रहेंगी। वे उन कवियों में हैं जिनकी रचनाएँ समय के साथ पुरानी नहीं पड़तीं, बल्कि बदलते समाज में नए अर्थ ग्रहण करती हैं। हिंदी कविता का इतिहास जब भी मनुष्य की गरिमा, सामाजिक प्रतिबद्धता और कलात्मक संयम की चर्चा करेगा, ऋतुराज का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाएगा। उनकी कविता हमें भविष्य में भी यह याद दिलाती रहेगी कि सबसे कठिन समय में भी आशा, संवेदना और प्रतिरोध की लौ बुझनी नहीं चाहिए।
यह लेख चैटजीपीटी की सहायता से तैयार किया गया है।
वरिष्ठ कवि राजकुमार कुम्भज ने इन शब्दों में ऋतुराज जी को श्रद्धांजलि अर्पित की है-
प्रख्यात जनवादी रचनाकार ऋतुराज नहीं रहे.वे 86 साल के थे और प्रोस्टेट की बीमारी से जूझ रहे थे.
मीरा पुरस्कार,बिहारी पुरस्कार और पहल सम्मान से सम्मानित ऋतुराज की कविता “कन्यादान”बेहद लोकप्रिय रही है.
उक्त कविता राजस्थान के शिक्षा संस्थानों के पाठ्यक्रम में आज भी पढ़ाई जाती है.
वे प्रगतिशील लेखक संघ के महत्वपूर्ण सदस्य थे.
ऋतुराज की कविताओं का घर कभी-कभी मुझे अपना-सा अपना घर लगता रहा है.उनकी रिक्तता के बाद भी उनकी उपस्थिति बनी रहेगी.उनकी स्मृतियों को विनम्र नमन.
