मोहम्मद करीम छागलाः जिसने जेएनयू के विचार को संस्थागत रूप दिया
भारत के इतिहास में कुछ संस्थान ऐसे हैं, जिनके पीछे केवल एक व्यक्ति की कल्पना नहीं होती। उनके पीछे कई वर्षों की बहस, राजनीतिक परिस्थितियां, प्रशासनिक फैसले और कुछ दूरदर्शी लोगों की भूमिका होती है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी JNU भी ऐसी ही कहानी का हिस्सा है। आज JNU का नाम देश की राजनीति, शिक्षा और सार्वजनिक बहस में अक्सर सुनाई देता है। लेकिन इसके बनने के शुरुआती विचारों में जिस व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका थी, उसका नाम बहुत कम लोग जानते हैं।
यह नाम था मोहम्मद करीम छागला, जिन्हें आमतौर पर एम.सी. छागला के नाम से जाना जाता है। वह केवल राजनेता नहीं थे। वह वकील थे, न्यायाधीश थे, बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे, राजनयिक रहे और केंद्र सरकार में शिक्षा मंत्री भी बने। उनकी जिंदगी का सबसे दिलचस्प पहलू यह था कि उनका सार्वजनिक जीवन कई ऐसे मोड़ों से गुजरा, जहां व्यक्तिगत विचारों से ज्यादा संविधान, शिक्षा और संस्थाओं के भविष्य को महत्व दिया गया।
और JNU की कहानी में उनका अध्याय यहीं से शुरू होता है।

नेहरू के बाद बदल रहा था भारत का राजनीतिक और शैक्षणिक माहौल
27 मई 1964 को जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ। देश ने एक ऐसे प्रधानमंत्री को खो दिया था, जिन्होंने स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में उसकी राजनीतिक और संस्थागत दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। उनके निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने। इसी दौर में देश शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी कई चुनौतियों से गुजर रहा था।
उस समय केंद्र का शिक्षा मंत्रालय आज की तरह शक्तिशाली प्रशासनिक ढांचा नहीं रखता था। देश के अधिकांश विश्वविद्यालय राज्यों के अधीन थे। केंद्र की भूमिका मुख्यतः सलाह और समन्वय तक सीमित थी। दूसरी तरफ शिक्षकों की स्थिति भी चिंता का विषय थी।
यही वह समय था जब एम.सी. छागला शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अलग सोच सामने रख रहे थे। उनका मानना था कि किसी देश का भविष्य केवल इमारतों से नहीं बनता। उसके लिए अच्छे शिक्षक, बेहतर संस्थान और गंभीर शिक्षा की आवश्यकता होती है।
शिक्षक की कम तनख्वाह ने छागला को क्यों परेशान किया?
शिक्षा मंत्री बनने के बाद छागला ने देश की शिक्षा व्यवस्था को केवल फाइलों से समझने के बजाय उसकी जमीनी स्थिति पर ध्यान देने की कोशिश की। जब उन्हें शिक्षकों की कम तनख्वाह के बारे में जानकारी मिली, तो उन्होंने इसे गंभीर समस्या माना।
उनका सवाल सीधा था। यदि सरकार अपने सिविल कर्मचारियों के वेतन की समीक्षा के लिए वेतन आयोग बना सकती है, तो शिक्षकों के लिए ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता?
छागला के लिए शिक्षक केवल सरकारी कर्मचारी नहीं थे। वह आने वाली पीढ़ियों को तैयार करने वाले लोग थे। इसलिए उनके अनुसार शिक्षकों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति शिक्षा की गुणवत्ता से सीधे जुड़ी थी।
यही सोच आगे चलकर उनके व्यापक शिक्षा दृष्टिकोण का हिस्सा बनी। वह चाहते थे कि शिक्षा केवल स्कूलों की संख्या बढ़ाने तक सीमित न रहे। बच्चों को अच्छी किताबें, प्रशिक्षित शिक्षक, पर्याप्त सुविधाएं और वास्तविक सीखने का वातावरण मिले।
लेकिन फिर JNU का विचार आया कहां से?
यहां कहानी और दिलचस्प हो जाती है।
दिल्ली में उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय एक प्रमुख उच्च शिक्षा संस्थान था। छागला का विचार था कि राजधानी में एक और ऐसा विश्वविद्यालय होना चाहिए, जो केवल पारंपरिक शिक्षा तक सीमित न हो। उसमें उच्च स्तर का शोध, अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और अकादमिक उत्कृष्टता का वातावरण विकसित किया जा सके।
उनकी सोच के पीछे एक और व्यावहारिक कारण था। दिल्ली विश्वविद्यालय पर विद्यार्थियों का दबाव भी था। ऐसे में एक नए विश्वविद्यालय की स्थापना उच्च शिक्षा के विस्तार में मदद कर सकती थी।
लेकिन 1960 के दशक का भारत आज का भारत नहीं था। देश आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा था। संसाधन सीमित थे। ऐसे समय में एक नए केंद्रीय विश्वविद्यालय की कल्पना करना आसान निर्णय नहीं था।
फिर भी छागला ने इस विचार को आगे बढ़ाया।
अगस्त 1965 में आया वह बिल जिसने आगे की राह खोली
JNU की स्थापना तत्काल नहीं हुई। इसके पीछे कई चरणों की राजनीतिक और संसदीय प्रक्रिया थी। शिक्षा से जुड़े विचारों पर विशेषज्ञ स्तर पर चर्चा हुई। इसके बाद विश्वविद्यालय की स्थापना का प्रस्ताव संसद तक पहुंचा।
अगस्त 1965 में एम.सी. छागला ने राज्यसभा में विश्वविद्यालय से संबंधित विधेयक पेश किया। अगले महीने इसे लोकसभा में शिक्षा राज्य मंत्री भक्त दर्शन ने पेश किया।
हालांकि उस समय विश्वविद्यालय की स्थापना पूरी तरह उनके कार्यकाल में नहीं हो सकी। इसके बावजूद JNU के विचार को संस्थागत रूप देने वालों में छागला का नाम महत्वपूर्ण है।
यहीं एक जरूरी अंतर समझना भी जरूरी है। यह कहना कि अकेले छागला ने JNU बनाया, ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। विश्वविद्यालय की स्थापना एक लंबी संसदीय और प्रशासनिक प्रक्रिया का परिणाम थी। लेकिन इसके शुरुआती विचार और उसे आगे बढ़ाने में छागला की भूमिका को नजरअंदाज करना भी पूरी तस्वीर नहीं बताता।
वह शख्स जिसने जिन्ना के साथ काम किया, फिर उनसे रास्ता अलग कर लिया
एम.सी. छागला की जिंदगी का एक और अध्याय बेहद रोचक है।
30 सितंबर 1900 को बॉम्बे में जन्मे छागला एक संपन्न गुजराती शिया मुस्लिम परिवार से थे। उन्होंने सेंट जेवियर्स से शिक्षा प्राप्त की और आगे की पढ़ाई के लिए ऑक्सफोर्ड के लिंकन कॉलेज गए।
कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में वकालत शुरू की। इस दौरान उनका संपर्क उस समय के कई प्रसिद्ध वकीलों से हुआ। इनमें सर जमशेदजी कांगा और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे नाम शामिल थे।
एक समय छागला जिन्ना से काफी प्रभावित थे। उन्होंने मुस्लिम लीग के साथ भी काम किया। लेकिन जब जिन्ना ने अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग को आगे बढ़ाया, तो छागला ने उनसे अपनी राजनीतिक दूरी बना ली।
इसके बाद उन्होंने बंबई मुस्लिम नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना में भूमिका निभाई। यह उनके राजनीतिक जीवन का बड़ा मोड़ था। उन्होंने उस समय अलग रास्ता चुना, जब राजनीति तेजी से सांप्रदायिक और विभाजनकारी प्रश्नों के इर्द-गिर्द बदल रही थी।
अंबेडकर से लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट तक
छागला केवल अदालत में वकालत करने वाले व्यक्ति नहीं थे। 1927 में उन्हें गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, बॉम्बे में कानून पढ़ाने का अवसर मिला। इसी दौरान उनका संबंध डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे महान विधिवेत्ता से भी रहा।
1941 में उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। इसके बाद 1948 में वह उसी अदालत के मुख्य न्यायाधीश बने। 1958 तक उन्होंने इस पद पर सेवा की।
इसके बाद उनका सार्वजनिक जीवन न्यायपालिका से निकलकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक पहुंचा। वह संयुक्त राष्ट्र में भारत के शुरुआती प्रतिनिधिमंडलों का हिस्सा रहे। उन्होंने अमेरिका में भारतीय राजदूत और ब्रिटेन में भारतीय उच्चायुक्त के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई।
यानी जिस व्यक्ति ने बाद में शिक्षा मंत्रालय संभाला, उसके पास कानून, न्यायपालिका और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का लंबा अनुभव था।
नेहरू से निकटता थी, लेकिन जरूरत पड़ने पर सवाल भी उठाए

छागला और नेहरू के बीच राजनीतिक तथा प्रशासनिक संबंधों का एक महत्वपूर्ण पहलू उनकी स्वतंत्र सोच थी।
हरिदास मूंदड़ा प्रकरण की जांच के लिए बनी जांच प्रक्रिया में छागला की भूमिका भी सामने आई। इस मामले में तत्कालीन वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी पर गंभीर सवाल उठे और अंततः उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा।
कृष्णमाचारी नेहरू के करीबी माने जाते थे। इसलिए यह प्रकरण राजनीतिक रूप से संवेदनशील था। इसके बावजूद छागला ने जांच में अपने निष्कर्ष सामने रखे।
यह प्रसंग उनकी सार्वजनिक भूमिका का एक महत्वपूर्ण पहलू दिखाता है। उनके लिए संस्थागत जिम्मेदारी और व्यक्तिगत राजनीतिक संबंध हमेशा एक ही चीज नहीं थे।
शिक्षा मंत्री से विदेश मंत्री तक
छागला ने 1963 से 1966 तक शिक्षा मंत्री के रूप में काम किया। इसके बाद नवंबर 1966 से सितंबर 1967 तक उन्होंने विदेश मामलों के मंत्री की जिम्मेदारी संभाली।
शिक्षा मंत्रालय में रहते हुए उनकी चिंता केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं थी। वह प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर भी मुखर थे। उनका मानना था कि केवल स्कूल की इमारत खड़ी कर देना शिक्षा का विस्तार नहीं है।
एक विद्यालय में प्रशिक्षित शिक्षक, उपयोगी किताबें, बच्चों के लिए उचित वातावरण और वास्तविक शिक्षा जरूरी है। यही विचार उनकी शिक्षा संबंधी सार्वजनिक सोच का आधार रहा।
और फिर आई उनके जीवन की आखिरी पारी
सरकारी जिम्मेदारियों से अलग होने के बाद भी छागला ने सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह दूरी नहीं बनाई। वह वकालत से जुड़े रहे और अपनी आत्मकथा Roses in December भी लिखी।
उनका जीवन केवल पदों की सूची नहीं था। उसमें राजनीतिक मतभेद थे, न्यायिक जिम्मेदारियां थीं, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति थी और शिक्षा सुधार की चिंता थी।
9 फरवरी 1981 को 81 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। उनके निधन के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट में उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। 1985 में अदालत परिसर में उनकी प्रतिमा का अनावरण भी किया गया।
प्रतिमा पर लिखा संदेश उनके सार्वजनिक जीवन की एक संक्षिप्त तस्वीर प्रस्तुत करता है—एक महान न्यायाधीश, एक महान नागरिक और सबसे बढ़कर एक महान इंसान।
JNU की कहानी हमें क्या याद दिलाती है?
आज जब JNU का नाम सुनते ही लोगों के मन में अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक विचार उभरते हैं, तब उसके शुरुआती इतिहास को उसके पूरे संदर्भ में देखना जरूरी है।
इस विश्वविद्यालय की कहानी किसी एक नेता की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है, जब स्वतंत्र भारत अपने उच्च शिक्षा संस्थानों का ढांचा तैयार कर रहा था। एम.सी. छागला उन लोगों में थे जिन्होंने राजधानी में एक नए, उच्च स्तरीय विश्वविद्यालय की आवश्यकता को सामने रखा।
उनकी कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसने कानून, न्यायपालिका, राजनीति, कूटनीति और शिक्षा—इन सभी क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ी।
और शायद सबसे दिलचस्प बात यह है कि 30 सितंबर 1900 को जन्मे इस व्यक्ति का नाम आज भी JNU की शुरुआती परिकल्पना और भारतीय शिक्षा के इतिहास से जुड़ा हुआ है।
