भगत सिंह और बी. के. दत्त का 6 जून 1929 का बयान : क्रांति,विरोध और औपनिवेशिक न्यायालय – एक समीक्षा

भगत सिंह और बी. के. दत्त का 6 जून 1929 का बयान : क्रांति,विरोध और औपनिवेशिक न्यायालय – एक समीक्षा

डॉ. रामजीलाल

 

भगत सिंह का बयान, जो 6 जून 1929 को दिल्ली सेशंस कोर्ट में बी. के. दत्त के साथ दिया गया था और जिसे युवा कांग्रेस नेता व प्रसिद्ध एडवोकेट असफ अली ने पढ़ा था, भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के अंदर एक अहम राजनीतिक दस्तावेज़ है। हालांकि इसे अक्सर 8 अप्रैल 1929 को हुई सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बमबारी से जोड़ा जाता है,लेकिन इसका महत्व इस अकेली घटना से कहीं ज़्यादा है। यह बयान क्रांतिकारियों के मकसद, राजनीतिक विरोध की उनकी समझ, संस्थाओं को लोगों से अलग करने पर उनके विचार, लेबर और वर्कर्स के बारे में उनकी सोच और “क्रांति” के उनके अवधारणा को बताता है। असल में, यह एक नीति
दस्तावेज़ के तौर पर काम करता है जो क्रांतिकारी आंदोलन के मकसद और लक्ष्यों को बताता है।

1.पृष्ठभूमि असेंबली बम धमाका (8 अप्रैल, 1929):

8 अप्रैल, 1929 को, क्रांतिकारी भगत सिंह और बी.के. दत्त ने दिल्ली में सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में स्मोक बम फेंककर एक बड़ा रणनीतिक और राजनीतिक बयान दिया। यह कार्रवाई पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल के आस-पास के विवादित पॉलिटिकल माहौल के बीच हुई, जिसे कई लोग दमनकारी औपनिवेशिक कानून मानते थे जो भारतीय लोगों की उम्मीदों को नज़र अंदाज करता था।

इस घटना की एक खास बात यह थी कि सिंह और दत्त ने भागने की कोशिश नहीं की, बल्कि आत्मसमर्पण करने के लिए मौके पर ही रहे। यह फैसला रणनीतिक था, जिससे उनके बाद के ट्रायल को उनके राजनीतिक विचार पेश करने और बड़े दर्शकों को उनके कामों के पीछे के मकसद समझाने का एक मंच मिला। 6 जून को उनका बयान एक आम कानूनी बचाव से कहीं आगे था, और इसे एक राजनीतिक दखल के तौर पर पेश किया गया, जहाँ उन्होंने अपने कामों की ज़िम्मेदारी ली, साथ ही यह भी कहा कि उनका इरादा बिना सोचे-समझे हिंसा करना नहीं था। बल्कि आत्मसमर्पण, और रणनीति के साथ अपने ट्रायल को एक मंच की तरह इस्तेमाल करके अपने राजनीतिक संदेश को ज़्यादा लोगों तक पहुंचाया।

 

2. राजनीतिक दखल:

6 जून के बयान को आम कानूनी बचाव के तौर पर नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दखल के तौर पर देखा जाना चाहिए। दोनों क्रांतिकारियों ने अपने कामों की ज़िम्मेदारी ली, साथ ही इस बात का भी विरोध किया कि उनका इरादा बिना सोचे-समझे हिंसा करना था। उनके बयान का एक खास पहलू वायसराय, लॉर्ड इरविन को संबोधित करता है, जिन्होंने असेंबली की घटना को किसी व्यक्ति के बजाय एक संस्था पर हमला बताया था। सिंह और दत्त ने इस अंतर को माना और उसी के हिसाब से अपनी बात आगे बढ़ाई। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि उनके कामों ने औपनिवेशिक शासन को दिखाने वाले एक संस्था को निशाना बनाया, और निजी दुश्मनी से किए गए कामों और राजनीतिक विरोध के तौर पर देखे जाने वाले कामों के बीच अंतर करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।

3.ऐतिहासिक महत्व:

यह अंतर इतिहासकारों के लिए बहुत ज़रूरी है, क्योंकि इससे उन इरादों पर रोशनी पड़ती है जिन्हें भगत सिंह और दत्त ने अपने कामों के लिए ज़िम्मेदार ठहराया था। हालांकि यह विस्फोटकों के इस्तेमाल से जुड़े कानूनी या नैतिक नतीजों को हल नहीं करता है, लेकिन यह उनके क्रांतिकारी रुख को समझने के लिए एक संदर्भ देता है। इसके अलावा, उनके बयान को भगत सिंह की जेल डायरी, चिट्ठियों, निबंधों और कोर्ट में लिखी दूसरी बातों के साथ भी पढ़ा जाना चाहिए। समाज वीकली UK, द एशियन इंडिपेंडेंट UK और प्रतिबिम्ब मीडिया ,चंडीगढ़ में मेरे पिछले लेखों में उन्हें एक उन्हें एक क्रांतिकारी,अध्येता,पत्रकार तर्क शील,समाजवादी विचारक और राजनीतिक संगठन निर्माता के तौर पर देखा गया है। द जेल नोटबुक / डायरी उनके क्रांतिकारी कामों के साथ हुए असाधारण बौद्धिक विकास को दिखाता है।

संक्षेप में, सिंह और दत्त का बयान एक ज़रूरी किताब है जो भारत में औपनिवेशिक समय के दौरान क्रांतिकारी सोच और राजनीतिक विरोध को समझने में मदद करती है।

4.वायसराय का नज़रिया:

खास तौर पर, वायसराय, लॉर्ड इरविन, उन्होंने बमबारी की घटना को लोगों पर नहीं, बल्कि एक संस्था पर हमला बताया था। सिंह और दत्त ने इस अंतर को माना और अपने बयान में इसे और विस्तार से बताया। उन्होंने साफ किया कि उनका कार्य एक ऐसी संस्था के खिलाफ था जो औपनिवेशिक ज़ुल्म को दिखाती थी। इस सोच ने पढ़ने वालों को निजी दुश्मनी से किए गए कामों और राजनीतिक विरोध के इरादे से किए गए कामों के बीच फर्क करने के लिए बढ़ावा दिया। हालांकि, यह अंतर क्रांतिकारियों के इरादों के बारे में तो बताता है, लेकिन यह विस्फोटकों के इस्तेमाल से जुड़े मुश्किल कानूनी या नैतिक मुद्दों को हल नहीं करता है।

5.एक व्यावहारिक विरोध:

सिंह और दत्त ने अपने एक्शन को एक लेजिस्लेटिव असेंबली के खिलाफ एक व्यावहारिक विरोध के तौर पर बताया, जिसके बारे में उन्हें लगा कि वह भारत की राजनीतिक ज़रूरतों को ठीक से दिखाने में नाकाम रही है। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसी संस्थाएं आसानी से गंभीर प्रस्तावों को नज़रअंदाज़ कर सकती हैं, जो आखिरकार भारतीय लोगों के प्रति जवाबदेह होने के बजाय शाही सत्ता के अधीन थे। उनकी इच्छा “बहरों को सुनाना” थी, यह कहावत उनके कामों और आदर्शों की निशानी बन गई। यह बात उनके अपने राजनीतिक औचित्य के तौर पर काम करती है, न कि यह एक आम बात है कि हर स्थिति में हिंसा ज़रूरी है।

6.संस्थागत हमला बनाम लोगों को निशाना बनाना:

उनके पूरे बयान में, संस्थाओं और लोगों के बीच के अंतर को और मज़बूत किया गया। सिंह और दत्त ने इंसानी ज़िंदगी के लिए गहरा सम्मान दिखाया और उन मतलबों को खारिज कर दिया जिनसे लगता था कि उनके इरादे निजी नफ़रत में थे। उन्होंने माना कि, हालांकि असेंबली के कई सदस्य सीधे तौर पर ब्रिटिश साम्राज्य की नीतियों के लिए ज़िम्मेदार नहीं थे, लेकिन असेंबली खुद – जो औपनिवेशिक शासन के तहत काम कर रही थी – राजनीतिक दबदबे की निशानी थी। इसलिए, इस घटना को अलग-अलग सदस्यों पर हमले के बजाय संस्था की आलोचना के तौर पर पेश किया गया।

7. श्रमिक, श्रम और औपनिवेशिक राज:

उनके बयान में एक ज़रूरी विषय भारत में मज़दूरों और मज़दूर वर्ग पर ज़ोर देना था। सिंह और दत्त ने औपनिवेशिक कानून के अपने विरोध को देश की मज़दूर आबादी की बुरी हालत से जोड़ा। उन्होंने पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल को एक औपनिवेशिक राज के तौर पर देखा जो राजनीतिक और मज़दूर अधिकारों को कम करने को तैयार था। उनकी आलोचना संवैधानिक बहसों से आगे बढ़ी और आर्थिक शोषण के बड़े मुद्दों पर बात की।

यह नज़रिया भगत सिंह की बदलती सोशलिस्ट सोच से मेल खाता है, जो आज़ादी के बाद बनने वाले समाज पर ज़्यादा केंद्रित करती थी, सिर्फ़ ब्रिटिश शासकों की जगह भारतीय शासकों को लाने के बजाय। समाजवाद, वर्ग के मुद्दों, साम्राज्यवादी आलोचनाओं, तर्कवाद और सामाजिक समानता के साथ उनका जुड़ाव उनके लेखन और राजनीतिक गतिविधियों में और साफ़ हो गया, जिससे उनकी बौद्धिक वृद्धि और भारत के लिए एक बदलाव लाने वाले नज़रिए के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का पता चला।

8.असेंबली बम घटना के पीछे की प्रेरणा का विश्लेषण:

क्रांतिकारियों ने इशारा किया कि बम एक नाटकीय चेतावनी के तौर पर था। उन्हें लगा कि बदलाव की पारंपरिक अपीलों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है और लोगों का ध्यान खींचने के लिए ज़्यादा सख्त कार्यवाही ज़रूरी है। इस बात का मतलब दो स्तरों पर निकाला जा सकता है: पहला, बम धमाके के तुरंत के राजनीतिक मकसद को समझाने के तौर पर; दूसरा, उनके कामों के पीछे की क्रांतिकारी सोच की झलक के तौर पर।

बमों को क्रांति का एक रूप नहीं, बल्कि एक ज़रूरी राजनीतिक संदेश देने के एक यंत्र के तौर पर देखा गया। असेंबली में बने रहने और आखिर में आत्मसम्पर्ण करने का फैसला बहुत ज़रूरी था क्योंकि इससे आरोपियों को ट्रायल को अपने व्यक्तिगत विचारों के लिए एक प्लेटफॉर्म के तौर पर इस्तेमाल करने का मौका मिला

9.विचारधारा की बुनियाद:

भगत सिंह और बी. के. दत्त ने खुद को भारतीय इतिहास और व्यक्तिगत आयामों के जानकार विद्यार्थी के तौर पर पेश किया। उन्होंने इस बात को खारिज कर दिया कि उनके काम निजी बदले या भावात्मक आवेग से पैदा हुए थे। उनके प्रेरणा में साम्राज्यवादी शासन का विरोध ,ज़रूरतमंदो की वकालत, और बड़े पॉलिटिकल और सोशल सुधार के लिए कमिटमेंट शामिल था उनके बयानों से, क्रांतिकारी कामों के प्रति भगत सिंह के नजरिए और एक क्रांतिकारी को सिर्फ़ हिंसा का सहारा लेने वाले के तौर पर दिखाने के आम तरीके के बीच एक फ़र्क उभरता है। उनकी राजनीतिक सिद्धांत ज़्यादा क्रमबद्ध और सैद्धांतिक बनने के लिए विकसित हो रहे थे.

10.व्यक्तिगत दुश्मनी का न होना:

उनकी कहानी का एक खास पहलू व्यक्तिगत दुश्मनी का न होना था। भगत सिंह पहले भी लाला लाजपत राय की मौत के बाद क्रांतिकारी कोशिशों में शामिल हुए थे। दिसंबर 1928 में जे. पी. सॉन्डर्स की हत्या राय की मौत से जुड़े अन्याय का बदला लेने की कोशिश थी। हालाँकि, असेंबली बम धमाके को अलग तरह से देखा गया था; इसे असेंबली के खास सदस्यों के खिलाफ़ बदला नहीं माना गया था। भगत सिंह के कामों की सही अकादमिक समझ के लिए यह फर्क ज़रूरी है।
11.भगत सिंह की क्रांति की अवधारणा:
उनके बयान से एक मुख्य सवाल यह उठता है कि भगत सिंह क्रांति को क्या मानते थे। उन्होंने क्रांति को सिर्फ़ हिंसा के बराबर मानने के विचार को खारिज कर दिया। उनके हिसाब से,सच्ची क्रांति का मतलब था दमन कारी राजनीतिक और सामाजिक ढांचे में एक बड़ा बदलाव। उनका नज़रिया देश की आज़ादी से कहीं आगे था; उनका मानना था कि सिर्फ़ ब्रिटिश अधिकारियों की जगह भारतीय अधिकारियों को लाने से गहरे क्रांतिकारी मकसद पूरे नहीं होंगे, खासकर अगर आर्थिक शोषण जारी रहे।

यह नज़रिया उनके बाद के लेखों, खासकर युवाओं को लिखे उनके राजनीतिक खतों और जेल से लिखे उनके लेखों से मेल खाता है,जहाँ उन्होंने अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक सिद्धांतों पर गहराई से बात की।

12.दमन करने वालों की पहचान

दमन करने वालों को समझने के लिए दो लेवल पर सोचना होगा। सबसे पहला दमन करने वाला ब्रिटिश साम्राज्यवाद था, क्योंकि भारत अपने लोगों की मर्ज़ी के बिना औपनिवेशिक शासन के अधीन था। हालाँकि,भगत सिंह के बदलते समाजवादी नजरिए ने आर्थिक शोषण और वर्ग संबंधों की भी जाँच की, जिससे पता चलता है कि उनके क्रांतिकारी लक्ष्य सिर्फ़ शासकों को बदलना नहीं थे,बल्कि सामाजिक ढाँचों को बदलना भी था।6 जून के बयान का महत्व क्रांतिकारी राष्ट्रवाद से आज़ादी के ज़्यादा बड़े समाजवादी नजरिए की ओर बदलाव को दिखाने में है।

13. कानूनी कार्रवाई और परिणाम:

उनके बयान के राजनीतिक महत्व के बावजूद, कानूनी कार्रवाई पर कोई असर नहीं पड़ा। असेंबली बम केस की देखरेख दिल्ली में सेशंस जज लियोनार्ड मिडलटन ने की। भगत सिंह और बी. के. दत्त पर विस्फोटक इंडियन पीनल कोड की धारा 307 और एक्सप्लोसिव सब्सटेंस एक्ट के तहत आरोप लगाए गए थे। कोर्ट ने बम धमाके से जुड़े सबूतों और धमाकों से होने वाले खतरों की जांच की।

12 जून 1929 को, सेशंस कोर्ट ने दोनों लोगों को दोषी पाया और उन्हें उम्रकैद की सज़ा सुनाई। इस सज़ा को उनके कामों से खतरा पैदा करने के जवाब के तौर पर देखा गया। बयान की तारीख 6 जून और फैसले की तारीख 12 जून के बीच फर्क करना ज़रूरी है। बाद में उनकी सज़ा के खिलाफ लाहौर हाई कोर्ट में अपील की गई, जिसने सज़ा को बरकरार रखा।

14. कानूनी मामलों में फर्क:

असेंबली बम केस और लाहौर षडयंत्र केस (1929-1930)के बीच फर्क करना बहुत ज़रूरी है। पहले केस में खास तौर पर सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में बमबारी पर फोकस था, जबकि दूसरे केस में सॉन्डर्स की हत्या से जुड़ी एक बड़ी क्रांतिकारी साज़िश और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ी गतिविधियां शामिल थीं।

भगत सिंह पर बाद में सुखदेव और राजगुरु के साथ लाहौर षडयंत्र केस (1929-1930) में मुकदमा चला, जिसके बाद उन्हें मौत की सज़ा हुई और 23 मार्च 1931 को उन्हें फांसी दे दी गई।

यह कोर्ट का बयान न सिर्फ़ मुश्किल समय में कानूनी बचाव का काम करता है, बल्कि सोशलिस्ट आदर्शों का एक मजबूत ऐलान भी है। यह हिंसा की वकालत करने से बचता है, बल्कि इसका मकसद बेपरवाह अधिकारियों को उनकी बेपरवाही से जगाना है। यह बयान बहुत ध्यान से दिखाता है कि औपनिवेशिक असेंबली और मज़दूरों द्वारा सहे जाने वाले क्रमबद्ध ज़ुल्म और शोषण के बीच एक राजनीतिक सेतु बनाने की बहुत ज़रूरत है, और यह दिखाता है कि असेंबली का होना सिर्फ़ एक खोखला दिखावा है जो शासन के नाम पर है।

दार्शनिक के हिसाब से,यह दस्तावेज एक उत्कृष्ट राजनीतिक घोषणा पत्र(पॉलिटिकल मैनिफेस्टो) की तरह काम करता है, जिसका मकसद मज़दूर वर्ग को दबाने वाले मौजूदा शोषण करने वाली व्यवस्था -सामाजिक,आर्थिक ,राजनीतिक–को खत्म करना है। यह वास्तव में समाजवादी समाज बनाने की सोच रखता है, जहाँ मज़दूरों को अपने प्रभुसत्ता सम्पन्न अधिकार और इज़्ज़त वापस पाने का अधिकार हो। यह सोच आज के नव-उदारवादी माहौल में गहराई से गूंजती है, जहाँ असमानताएँ और क्रमबद्ध अन्याय लगातार बढ़ रहे हैं और अनगिनत लोगों को समाज के हाशिए पर कर रहे हैं। यह बयान बदलाव के लिए एक साफ़ आवाज़ है, और समाज से उन मजबूत शक्तिशाली व्यवस्था का सामना करने की अपील करता है जो दुख और असमानता को बनाए रखते हैं।

डॉ. रामजीलाल, सामाजिक वैज्ञानिक, पूर्व प्रिंसिपल, दयाल सिंह कॉलेज,करनाल (हरियाणा, भारत)

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