कविता
कॉकरोच
जयपाल
आज तुम कॉकरोच कह रहे हो
कल मक्खी-मच्छर कहा करते थे
उससे पहले कीड़े-मकोड़े समझ कर पैरों के नीचे कुचल दिया करते थे
शूद्र/अछूत बताकर बंधक बना लेते थे
गुलाम बनाकर खरीद-फरोख्त कर लेते थे
दास-दासी तुम्हारी ही खोज थी
तुम्हीं थे राजा, तुम्हीं ईश्वर
और देवता भी तुम्हीं थे
मुल्ला/मौलवी/ फादर/पंडित
जल,जंगल और जमीन
पृथ्वी,आकाश और पाताल के मालिक
सब कुछ तुम्हीं थे प्रभु
बाकी सब तो थे बस कीड़े/मकोड़े/कॉकरोच
धूल,मिट्टी,गोबर,कीचड़ घास-फूस
नदी, जंगल, घाटियां, पेड़, पर्वत
झाड़/झंखाड़ों में रहने वाले
लेकिन अब सब कुछ पलट रहा है
कॉकरोच राजमहल की तरफ बढ़ रहे हैं
वे तुम्हारे बेडरूम में घुस गए हैं
बाथरूम में घूम रहे हैं
तुम्हारी नींद में दौड़ रहे हैं
खाने-पीने की मेज पर चढ़ गए हैं
तुम्हारा मज़ाक उड़ा रहे हैं प्रभु
तुम्हारे राजमहल के सामने जो प्रदर्शन चल रहा है
वह कॉकरोचों का ही प्रदर्शन है
तुम हैरान हो कि कॉकरोच भी भूख हड़ताल करने लगे हैं
आमरण अनशन पर बैठ गए हैं
समय पलट रहा है प्रभु
देखो तुम्हारा सिंहासन हिल रहा है
हिलाने वाले भी कॉकरोच हैं
ये वही कॉकरोच हैं प्रभु
जिन्हें तुम पैरों के नीचे कुचल दिया करते थे !
