लघुकथा
जीभ और दाँत
डॉ रीटा अरोड़ा
गाँव की साँझ थी। नीम के नीचे दादाजी चारपाई पर बैठे थे। पोता पास ही खेल रहा था।
“दादाजी, बुढ़ापे में दाँत गिर जाते हैं, जीभ क्यों नहीं गिरती?”
“क्योंकि बेटा, दाँत कठोर होते हैं, जीभ कोमल। जो अकड़ता है, टूट जाता है; जो झुकता है, बच जाता है।”
“दादी भी ऐसी ही थीं?”
दादाजी की आँखें ठहर गईं।
“हाँ, मैं छोटी-छोटी बातों पर डाँट देता था। वह चुपचाप रोटी सेंकती रहती थीं।”
“उन्हें गुस्सा नहीं आता था?”
“आता होगा… मैंने कभी पूछा ही नहीं।”
“फिर उन्होंने बोलना क्यों छोड़ दिया?”
“पहले बहुत बातें करती थीं। अपने सपनों की, बच्चों की, घर की। धीरे-धीरे बस ज़रूरत भर बोलने लगीं।”
“आपने पूछा नहीं?”
“एक बार पूछा था। बोलीं, कुछ नहीं। मैंने भी मान लिया।”
“आपको अच्छा लगता था उनका चुप रहना?”
दादाजी कुछ पल चुप रहे।
“तब लगता था, घर में शांति है।”
“और अब?”
“अब समझ आया कि घर शांत नहीं हुआ था, तेरी दादी ने अपने मन की आवाज़ दबा ली थी।”
पोता खेलने चला गया।
शाम की चाय आई। दादाजी ने आदतन पुकारा, “सुनती हो, चाय ठंडी हो रही है…”
अचानक उनकी आवाज़ रुक गई।
दादी अब कहाँ थीं?
उन्होंने अलमारी से दादी की पुरानी डायरी निकाली। पहला पन्ना खोला।
लिखा था-
“आज फिर बहुत कुछ कहना चाहती थी, लेकिन उनकी बातों के आगे मेरी बात की जगह ही कहाँ थी…”
दादाजी की आँखें धुँधली हो गईं। उन्होंने अगला पन्ना पलटा।
बाहर नीम की पत्तियाँ हवा में हिल रही थीं।
आज पहली बार उन्हें लगा- घर में चुप्पी नहीं, बहुत-सी अनकही बातें रह गई थीं।
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