शेक्सपियर अपने स्त्री पात्रों को निर्णय की आजादी देते हैं
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देशबंधु कॉलेज कालकाजी दिल्ली में ‘शेक्सपियर के स्त्री पात्र’ पर संगोष्ठी
हिंदी विभाग, देशबंधु महाविद्यालय, कालकाजी, नई दिल्ली द्वारा 15 अक्तूबर 2026 को ‘शेक्सपियर के स्त्री पात्र’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता अंग्रेजी विभाग देशबंधु महाविद्यालय की सेवानिवृत्त प्राध्यापिका शरीना जोशी ने की तथा मुख्य वक्ता के तौर पर अंग्रेजी विभाग, इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिकल एडुकेशन एंड स्पोर्ट्स साइंसेज के प्रोफेसर संजीव कौशल उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने किया ।

बजरंग बिहारी तिवारी ने सर्वप्रथम शेक्सपियर कार्यक्रम की श्रृंखला का परिचय प्रस्तुत किया । इसी क्रम में उन्होंने कहा कि एलिजाबेथ युग में यूरोप का पितृसत्तात्मक समाज बहुत क्रूर था जहां शक्ति और सत्ता की लड़ाई में स्त्रियां प्रापर्टी समझी जाती थीं। इसी समय यूरोपीय दुनिया रेनेंसां से रू-ब-रू हो रही थी। यह समय भारत में भक्ति आंदोलन का समय है। जिसमें सोदे्देश्य लेखन जनहित के लिए हो रहा था। जायसी बैकुंठ के लिए, कबीर ब्रह्म प्रचार के लिए एवं तुलसी लोक कल्याण के लिए लिख रहे थे। भारत में इससे पूर्व नाटक की एक विस्तृत परंपरा रही है लेकिन इस समय भारतीय साहित्य से नाट्य लेखन गायब हो गया। इसका जवाब आज तक इतिहास कारों के पास नहीं है।
बजरंग जी ने आगे कहा कि शेक्सपियर के 37 नाटक प्राप्त होते हैं जिसके चार चरण हैं और इसमें भी तीसरा चरण जो कि त्रासदी से संबंधित है वही सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सार्थक है। इसी क्रम में बजरंग जी ने कहा कि प्रोफेसर राजीव वर्मा की पहल से पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के सिलेबस में भारतीय साहित्य का महत्वपूर्ण पेपर था जिसे एक साल तक पढ़ाया जाता था। जिससे हिंदी के छात्रों को अन्य भाषाओं के महत्वपूर्ण लेखकों को जानने-समझने का मौका मिलता था। अब उसे तीन महीने में सिकोड़ दिया गया है। ऑनलाइन रिफ्रेशर कोर्स की भी यही त्रासदी है। रिफ्रेशर कोर्स की संकल्पना में ही यह था कि अलग-अलग जगहों के लोग मिलें। लेकिन समस्या यह है कि सत्ता प्रतिष्ठानों को यह चिंता लगी रहती है कि लोग आपस में मिले-जुलें नहीं।

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी वर्धिनी सभा की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य ही था कि लोग आपस में मिले-जुलें। इसी सभा की एक बैठक में भारतेंदु कहते हैं कि इंग्लैंड वाले हमारे लोक कथाओं तक की रेकी कर चुके हैं और हम हैं कि उनके साहित्य के विषय में कुछ नहीं जानते । बजरंग जी इसी क्रम में उन महिलाओं को याद करते हैं जो सत्ताधारियों से लड़ रहीं हैं। शेक्सपियर पर हो रहे इस कार्यक्रम को बजरंग जी इन्हीं लड़ाकू क्रांतिकारी महिलाओं को समर्पित करते हैं साथ ही शेक्सपियर के नाटकों की चुड़ैलों के रोल पर विचार करने के लिए मंच को सूत्र भी देते हैं। उन्होंने आगे कहा कि उत्तर औपनिवेशिक समाज की बड़ी त्रासदी यह है कि योरोप के संदर्भ में कुछ कहने पर लोग तुरंत अपने देश से तुलना करने लगते हैं। मध्यकालीन भक्ति साहित्य में सोद्देश्य लेखन के कारण स्त्री चरित्र को बुरे पात्र के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया जबकि दुनिया के अन्य साहित्य में ऐसा नहीं है।

कार्यक्रम की अगली कड़ी में प्रोफेसर ललित मोहन ने स्वागत वक्तव्य दिया और कार्यक्रम की अनुमति देने के लिए प्रिंसिपल राजेन्द्र पांडेय का धन्यवाद किया। ललित मोहन ने कहा कि शेक्सपियर के यहां स्त्रियां पात्रों तथा अपनी भूमिकाओं दोनों ही रूपों में आती हैं। 1960 में नारीवादी साहित्य की लहर आयी तब शेक्सपियर को सर्वाधिक पढ़ा गया। भारतेंदु युग से पहले नाटक न लिखने के कारण को बताते हुए ललित जी ने कहा कि अंग्रेजी में गद्य का विकास पहले हुआ हमारे यहां बहुत बाद में। शेक्सपियर के यहां स्त्रियां मां के रूप में अधिक नहीं हैं। उनके नाटकों में लड़कियां अधिक हैं जो कि अपने पिताओं से संघर्षरत हैं। नारीवादी समय में नयी नजर से शेक्सपियर को देखा-परखा गया । यह करना बहुत जरूरी है कि प्राचीन साहित्य को नये नजरिए से देखा जाए जिससे नया विचार बोध पैदा हो सके ।
मुख्य वक्ता प्रो. संजीव कौशल का श्रोताओं को परिचित कराने का कार्य बजरंग जी ने किया और कहा कि संजीव जी मुक्तिबोध के अध्येता और अनुवादक हैं साथ ही फेमिनिज्म की दुनिया में इन्होंने महत्वपूर्ण काम किये हैं। अपनी बात की शुरुआत करते हुए संजीव जी ने कहा कि शेक्सपियर के यहां परिस्थितियों बोलती हैं जिसके कारण उनके चरित्र जीते-जागते इंसान लगते हैं। प्रेमचंद के यहां कई जगहों पर लेखकीय आग्रह अधिक है जिसके कारण बोरियत होने लगती है।
संजीव जी कहते हैं कि हिंदी में प्रायः देवियां हैं लेकिन और जगहों (खासकर अंग्रेजी में) जीती-जागती वास्तविक स्त्रियां हैं। शेक्सपियर गांव से जब लंदन आए तो उन पर यहाँ के अभिजनों ने चोरी का इल्ज़ाम लगाया। जीवन बेहद कठिन होने के कारण बाद में वे स्टेज तथा ड्रामा कंपनी के लिए काम करते हैं। उनका पूरा लेखन थियेटर के लिए है जो कि बगैर लोगों के नहीं लिखा जा सकता। लेखक को आइसोलेट नहीं होना चाहिए। यह आइसोलेशन शेक्सपियर के यहां नहीं है । शेक्सपियर के नाटकों में आप डूब जाते हैं। इसकी बड़ी वजह है भाषा का बर्ताव। लेखक चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, भाषा उसके कंट्रोल में नहीं रहती। वह भाषा को गढ़ता रहता है उससे जूझता रहता है।
संजीव जी ने आगे कहा कि दुनिया में सर्वाधिक लूटी जाने वाली मजदूर स्त्रियां हैं। सवाल पूरी सच्चाई के साथ आपके साथ रहता है बदलता केवल जवाब है। स्त्री को किस रूप में कौन कंट्रोल कर रहा है? यही वह सवाल है जो हमारे साथ चला आ रहा है। विवाह, परिवार आदि संस्थाओं में औरतों की क्या आजादी है? साहित्य क्या पितृसत्ता को प्रतिष्ठित करता है? पुरुष का प्रेम वस्तुत: नियंत्रण के अंदर ही होता है। जिसमें उसका अहं केंद्र में है। वह दरअसल अपने आप से ही प्रेम करता है। पुरुष की आवाज स्त्री की आवाज को दबाती है। प्रेम करना पितृसत्ता के लिए ख़तरनाक है। विवाह संस्था का निर्माण भी पितृसत्ता ने अपने फायदे के लिए किया है।
औरतों की खूबसूरती के मानक क्या हैं?
संजीव जी आगे कहते हैं कि शेक्सपियर के नाटकों में औरतों के पास डायलॉग कितने हैं। उस युग में औरतों को नाटकों में स्पेस देना ही बड़ी बात थी। आज हमारे सामने औरतों की खूबसूरती के मानक क्या हैं? उनको काम की वैल्यू के आधार पर खूबसूरत कहा जाय या शरीर की बनावट के आधार पर? यह वही तरीका है जिससे हम स्त्री-पुरुष के गुणों का निर्धारण करते हैं। यह निर्धारण दरअसल सत्ता पर कब्जे का है। जिसमें औरतों के लिए परिवेश, विवाह, राजनीति, पवित्रता, शील, आज्ञाकारिता, यौनाचरण आदि पैमानों को तय किया जाता है। यही वह मानक हैं जिनसे औरतों को कंट्रोल किया जाता है। स्त्रियों की स्वतंत्र इच्छा, सार्वजनिक व्यक्तित्व और यौन इच्छा आदि का कोई मतलब नहीं है। स्त्री का शरीर उसका है भी।
शेक्सपियर इन सवालों से टाकराते हुए पुरुषों की नैतिक कमजोरियों को रेखांकित करते हैं। नारी की प्रतिष्ठा समाज में कौमार्य, वंश की निरंतरता, पवित्रता और यौनाचरण से तय हौती है। कौमार्य के नाम पर व्यक्तिगत नैतिकता का पहरा दरअसल पुरुष सत्ता का पहरा है। आचरण के आधार पर परिवार की प्रतिष्ठा पुरुषों के लिए अलग और स्त्रियों के लिए अलग है। शेक्सपियर के यहां सत्ताओं का सवाल बहुत है जिससे नियंत्रण की ताकत आती है। स्त्री की पवित्रता को सामाजिक आधार से जोड़कर देखा जाता है। शेक्सपियर की एक महिला चरित्र डेस्डीमोना है जिसका पिता ही उसके खिलाफ षड्यंत्र करता है। क्योंकि वह निर्णय लेती है। स्त्री द्वारा निर्णय की आजादी ही शेक्सपियर के यहां पर सबसे महत्वपूर्ण है।
शेक्सपियर के यहां चरित्र की विविधता बहुत है
संचालन कर रहे बजरंग जी कहा कि रेनेंसां के समय में शेक्सपियर हुए। उनके यहाँ आदर्श चरित्र नहीं हैं उनमें अच्छाई और बुराई दोनों है। इसी क्रम में ‘मर्चेंट आप वेनिस’ नाटक से ‘द क्वालिटी आप मर्सी’ का पाठ अंग्रेजी विभाग की प्रोफेसर वंदना माथुर जी ने किया। अध्यक्षता कर रही शरीना जी ने कहा कि चुड़ैलें कौन हैं? वह वीयर्ड सिस्टर्स हैं। शेक्सपियर के यहां चरित्र की विविधता बहुत है। शादी दो समूहों के बीच होती है उसमें स्त्री की स्थिति सिक्के की तरह है। शरीना जी किंगलेयर नाटक का सीन याद करते हुए कहती हैं कि किंगलेयर अपनी तीनों बेटियों से पूछता है कि मुझे सर्वाधिक प्रेम कौन करता है? कोडलिया जो कि अपने पिता से वाकई में बहुत प्रेम करती है परन्तु किंगलेयर उसी के साथ सर्वाधिक क्रूरता पूर्ण व्यवहार करता है।
औरत फंसी हुई है पितृसत्ता के अलावा और भी बहुत सी चीजों में। जिसमें कौमार्य, सिंगल मदर, पवित्रता, पुत्र-पुत्री आदि चीजें हैं। पूरी दुनिया में औरतों के लिए जगह नहीं है। आप एबोर्ट भी अपने मन से नहीं कर सकतीं। शरीना जी ने आगे कहा कि शेक्सपियर के समय तक अधिकांश प्ले हाउस राजा की हवेली में होते थे। बाद में प्लेहाउस की संरचना बदली जिसके तहत प्ले हाउस में राजा, मर्चेंट और गरीब मजदूर सब नाटक देख सकें । इसलिए शेक्सपियर के नाटकों में आपको सभी तरह के चरित्र दिखेंगे। हमें रेसिस्ट नजरिए से भी शेक्सपियर को पढ़ने की जरूरत है। आगे उन्होंने कहा कि शेक्सपियर के यहां रोमांस के साथ पितृसत्ता आती है। सभ्यता, शादी, परिवार, समाज, त्योहार, धर्म आदि सब इसी पितृसत्ता के उपकरण हैं। हर जगह इस पितृसत्ता को स्थापित किया जा रहा है अलग अलग तरीकों से। औरतों का इस्तेमाल हो रहा है पुरुषों के फायदे के लिए। औरतों से जुड़े हुए जो प्रश्न हैं उनका अंत त्रासदीपूर्ण ही होता है। शादी ही अंत में समाधान है क्योंकि दर्शक भी यही चाहता है। शेक्सपियर के यहां प्यार के तरीके को आलोचित करना महत्वपूर्ण है।
जीवंत पात्र तभी होंगे जब रचना में सायकोलॉजिकल डेप्थ होगी
प्रोफेसर संजीव कुमार ने अंत में सार-संक्षेप करते हुए कुछ बातें श्रोताओं के समक्ष रखीं और कहा कि हिंदी और संस्कृत की अलग परंपरा है और अंग्रेजी की अलग। रचना की गुणवत्ता के आधार पर दोनों की सोद्देश्यता में फर्क है। तुलना करने से हमें बचना चाहिए। रचना में रचनाकार भी कहता है और परिस्थितियां भी। दोनों में अंतर हो जाता है। रचनाकार जहां अधिक कहने लगता है तो रचना बोरियत पैदा करने लगती है। इसलिए रचनाकार और परिस्थितियां दोनों का सामंजस्य बहुत जरूरी है। भाषा लेखक के नियंत्रण से बाहर की चीज है। लेखक उस पर काबू पाना चाहता है लेकिन वह रचना इसकी चुगली कर देती है। जीवंत पात्र तभी होंगे जब रचना में सायकोलॉजिकल डेप्थ होगी। चरित्र तभी जीता-जागता लगेगा। रिपोर्ट तथ्य नहीं है केवल। हमें रिकार्ड की वैधता चेक करनी पड़ती है। क्योंकि सबाल्टर्न चेतना कहती है कि हर चीज को साहित्य की तरह पढ़ा जाना चाहिए। आप स्रोत को पढ़ते कैसे हैं यह महत्वपूर्ण है। उसकी वैलिडिटी को चेक करना जरूरी होता है। प्रेमचंद का उदाहरण देते हुए संजीव जी ने कहा कि गोदान को आप किस तरह पढ़ेंगे। साहित्य की तरह अथवा इतिहास की तरह? यह पढ़ने के तरीके पर निर्भर करता है कि आप पाठ का उपयोग किस लिए कर रहे हैं।
कार्यक्रम के अंत में हिंदी विभाग की शिक्षिका डॉ. सीमा, डॉ. प्रीति और डॉ. श्रवण गुप्त ने वक्ताओं से कतिपय सवाल किये। दूसरे वर्ष की छात्रा जाह्नवी ने भी वक्ताओं से सामाजिक बदलाव को लेकर महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा। वक्ता और अध्यक्ष ने जवाब में कहा कि सतर्क रहिए, कानूनी हक से रूबरू रहिए और आर्थिक ताकत पैदा कीजिए। क्योंकि आज के समय में औरतों को पागल करार करके पागलखाने भेजना बहुत आसान है। कार्यक्रम के अंत में विभाग प्रभारी प्रोफेसर अनुज कुमार रावत ने सभी का औपचारिक धन्यवाद किया। कार्यक्रम में हिंदी विभाग के सभी साथियों के साथ ही भौतिकी विभाग के डॉ. अश्विनी कुमार, दर्शनशास्त्र से प्रोफेसर सुभाषिनी बारिक, पंजाबी विभाग से डॉ. मुनीश, दयाल सिंह कालेज से डॉ. अभय कुमार उपस्थित थे। हिंदी आनर्स के तीनों वर्षों के छात्र छात्राओं के अलावा अन्य विषयों के विद्यार्थी-शोधार्थी भी इस कार्यक्रम में मौजूद थे।

इतनी अच्छी रिपोर्ट छापने के लिए प्रतिबिंब मीडिया का बहुत धन्यवाद।