जसवीर त्यागी की फूल केंद्रित कविताएँ
फूल का जन्म
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घर के आँगन में रखे गमले में
गेंदे का एक फूल खिला है
दूर से ही जीत के परचम-सा
चमकता है फूल
फूल के खिलने पर
किसी ने थाली नहीं बजायी
न किसी ने बांटी मिठाई
और न ही किसी ने
कोई गीत गाकर
बजाई खुशियों की शहनाई
कुछ न होने पर भी
गेंदे का फूल मुस्कुरा रहा है अकेला
अपनी मुस्कुराहट की महक से
सुवासित कर रहा है परिवेश
दे रहा है जीने का संदेश
लोभ और लालच में डूबी इस दुनिया में
किसके पास फुर्सत है
एक ताज़ा मासूम फूल को देखने की?
जो एक फूल को नहीं देख पाते
वे मनुष्य होने का हक अदा नहीं कर पाते।
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साधारण-असाधारण
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गुड़हल के पौधे पर
लाल रंग के दो फूल खिले हैं
मन चाव की चाशनी में मग्न है
कितनी साधारण-सी बात है
किसी पौधे पर फूल का खिलना
कितनी असाधारण बात है
खिले फूल का
हमारी सोच की डाल पर सुरक्षित बचा रहना।
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बुरांस का फूल
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उसने मुझे
बुरांस का फूल दिया उपहार में
एक दिन वह नहीं होगी
मैं भी नहीं होऊँगा किसी दिन संसार में
बुरांस के चटक लाल रंग का फूल
सदा जीवित रहेगा प्यार में।
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आकर्षण
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मिट्टी में खिले
फूलों से अधिक
चट्टानों की दरारों में खिले फूल
ज्यादा आकर्षित करते हैं।
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गेंदे के फूल
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गमले में लगे गेंदे पर
दो फूल खिले हैं
उनकी मासूमियत की महक
खींच लेती है अनायास अपनी ओर
सिर चढ़कर बोलता है
पीले रंग का जादू
क्या नाता है मेरा उनसे?
कोई काम न होने पर भी
अपने आप ही उठ जाते हैं पाँव उस तरफ
जहाँ एकांत में
अकेले मुस्कुराते रहते हैं
गेंदे के फूल।
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मिट्टी और फूल
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डाल से टूटा हुआ फूल
फिर से डाल पर
लग नहीं सकता
वह मुरझाकर,सूखकर
मिट्टी में मिल सकता है
पुष्प के जीवन की
यही सार्थकता है
अल्प अवधि में भी
उसने अपना परिवेश
या किसी का
घर-आँगन महकाया तो सही
यही सोचकर
खुद को करता है
मिट्टी के हवाले
यह जानते हुए
कि उसका जन्म भी
एक दिन मिट्टी से ही हुआ था।
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एक फूल
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मैं डाल से झर गया एक फूल
जमीं पर आ गिरा
आते-जाते मुसाफिर देखते रहे
किसी ने मुझे उठाया नहीं
पता नहीं कहाँ से?
एक स्त्री आयी
उसने मुझे उठाया
और घर ले आयी
स्त्री ने मुझे सहेजा,संवारा,दुलार किया
मैं इस बात को गया भूल
कि डाल से टूटकर
जमीं पर पड़ा
था मैं एक फूल
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गुड़हल के फूल
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लाल रंग के गुड़हल के फूल
खिले हुए हैं डाल पर
रह-रहकर मुस्कुराते-लुभाते हैं
आँखों में चमकते-दमकते रहते हैं
गुड़हल के फूल
साँसों में महकता है कुछ
अलग-अलग,नया-नया-सा
बार-बार टोहता-टटोलता हूँ
अपने में ही कुछ छिपा हुआ
महसूस करता हूँ
दिव्यता और नव्यता में
नहाया हुआ-सा अशेष
न जाने
मन की किस डाल पर?
खिले हुए हैं
गुड़हल के लाल रंग के फूल ।
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कपास का फूल
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मैं
गुलाब का नहीं
कपास का फूल
होना चाहता हूँ।
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सदाबहार के फूल
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सदाबहार के फूल
सदा मुस्कुराते रहते हैं
आख़िर ऐसा क्या है उनके पास?
जिसे पाकर वे उल्लसित रहते हैं
सदाबहार के फूलों से
पूछा मैंने एक दिन
सदा मुस्कुराने का राज क्या है?
सदाबहार के फूल मुस्कुराते हुए बोले-
हमें ज्ञात है
संसार और फूलों की हकीकत
बस!यही जानकर मुस्कुराते हैं
कि जीवन नश्वर ही सही
फिर भी कहीं-न-कहीं
बची रहे मुस्कुराहट
चाहे किसी डाल पर हो
या किसी की स्मृतियों में हो।
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प्रकृति
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मैं खिला हुआ फूल था
किसी को पसंद आया
उसने तोड़ लिया
खिलना मेरी प्रकृति था
तोड़ना किसी ने समझा
अपना अधिकार
डाल से टूटने के बाद भी
मैं फूल ही होना चाहूँगा हर बार।
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सार्थकता
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फल की सार्थकता
सदा पेड़ पर लगे रहने में नहीं
उपयुक्त अवसर पर
पेड़ से टूट जाने में है
फल का पेड़ से अलग होना
पेड़ से दूरी नहीं है
फल की स्वाधीनता है
स्वाधीन होना
सार्थकता का प्रथम सोपान है।
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फूलों का घर
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प्रातःकाल की सैर पर जाते हुए
अपनी शाख से टूटा हुआ फूल
अकेला सड़क पर पड़ा मिला
सड़क पर लोग आ-जा रहे थे
किसी ने नहीं उठाया
सड़क पर गिरा उदास मासूम फूल
फूल सड़क पर पड़ा हुआ कोई पैसा नहीं
जो हर किसी की नज़र में ठहर जाए
फूल किसी सच्चे सह्रदय की
संवेदना की शाख पर ही खिलता है
मैंने फूल को उठाया
और अपनी कमीज की जेब के घर में सजा लिया
जहाँ है मेरी जेब
ठीक उसके नीचे ही धड़कता है मेरा दिल
चाहता हूँ जब तक रहूँ इस दुनिया में
फूल मेरे दिल में अपना घर बनाकर रहें।
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मंजिल
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अभी-अभी होकर गुजरा हूँ
हरसिंगार की बगल से
एक दिव्य गंध ने
अपने मोहक जादू के पाश में
जकड़ लिया है मुझे
कदम मेरे थम गये हैं
मंजिल का रास्ता भूल गया हूँ
अवाक अविचल खड़ा सोचता हूँ
हरसिंगार से अच्छी मंजिल
भला और क्या होगी?
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