लघु कथा
फल का चक्र
डॉ रीटा अरोड़ा
रमेश अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा था। डॉक्टर ने रिपोर्ट देखते हुए कहा,
“रमेश जी, अब खान-पान थोड़ा संभालिए। समोसे-कचौड़ी बंद, फल शुरू।”
रमेश ने मुँह बनाते हुए कहा,
“डॉक्टर साहब, फल तो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं।”
डॉक्टर हँसकर बोले,
“तो फिर बीमारी आपको पसंद आ गई है!”
अगले दिन रिश्तेदार मिलने आ गए। मामा फलों की टोकरी लेकर आए।
“ले बेटा, तेरे लिए फल लाए हैं। रोज थोड़ा-थोड़ा खाना।”
रमेश ने टोकरी देखते हुए कहा,
“मामा, इतने सारे फल! लगता है आप मुझे जल्दी घर भेजने के मूड में नहीं हैं।”
सब हँस पड़े।
तभी बाहर से आवाज आई,
“मामा जी, समोसे ले आऊँ?”
मामा ने कहा,
“हाँ भाई, दस-बारह ले आ। सबके लिए होंगे।”
रमेश ने हैरानी से पूछा,
“मेरे सामने समोसे?”
मामा हँसकर बोले,
“अरे बेटा, तू फल खा। हम समोसे खा लेते हैं।”
रमेश ने सेब उठाया और खिड़की से बाहर देखने लगा। रिश्तेदार गरमा-गरम समोसे-कचौड़ियाँ खाने में व्यस्त थे।
वह मुस्कुराया और बोला-
अब समझ आया… बीमारी आदमी को अस्पताल भेजती है और रिश्तेदारों को समोसे की दुकान!”
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