जसवीर त्यागी की दुःख केंद्रित कविताएँ

जसवीर त्यागी की दुःख केंद्रित कविताएँ

नया दुःख

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दुःख कहीं नहीं जाता
देर सबेर
भटकता हुआ
आ जाता है द्वार

नया दुःख
पुराने को
मिटा तो नहीं पाता

थोड़ा पीछे की ओर
धकेल देता है।

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तफ़्तीश

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तफ़्तीश में कहा गया
वह आदमी अकेला रहता था

वास्तव में यह सच न था

उसके दुःख भी
उसके साथ रहते थे।

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दुःखों का विस्तार

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दुःख बढ़ रहे हैं
नये-नये दुःख जन्म ले रहे हैं

दिन-प्रति-दिन
दुःखों का दायरा बढ़ता जा रहा है

दुःखों को दूर करने वाली दवाईयां
कम हो रही हैं

दुःखों को समझने
और सुलझाने वाले इंसान घटते जा रहे हैं

दुःख व्यापक
और उनके निदान सिकुड़ते जा रहे हैं

व्यापकता और सिकुड़न के बीच
दाने-सा पिसता हुआ इंसान
पल-पल कम हो रहा है।

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दुःख

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दुःख स्लेट पर लिखी
कोई इबारत नहीं

जिसे झटके से
पोछकर हटा दिया जाये

दुःख कंधों पर टिका शीश है
हर पल साथ है।

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दुःख एक सवाल है

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हर किसी के
अपने-अपने दुःख हैं

किसी के बड़े,किसी के छोटे
किसी के कम,किसी के ज्यादा

कोई किसी दूसरे के दुःख
न ले सकता है
और न दे सकता है

इंसान अपने दुःखों को अकेला छोड़कर
किसी एकांत की शरण भी नहीं जा सकता

दुःख कपड़े पर लगा
कोई दाग नहीं
जिसे रगड़-मसलकर हटा दिया जाए

दुःख कोने में पड़ी
उपेक्षित फालतू चीज़ नहीं
कि कबाड़ी के तराजू पर धर दी जाए

दुःख साहूकार से लिया कर्ज़ नहीं
कि खेत-खलियान बेचकर चुकता कर दिया जाए

और दुःख घर का कोई चूहा भी नहीं
जिसे चूहेदानी में रोटी का टुकड़ा लगाकर
कैद किया जा सके

दुःख कर्मों की काया से चिपकी खाल है
दुःख नींद में भी
जागता हुआ सवाल है।

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अपना-अपना दुःख

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बचपन की रामलीला याद आती है
गाँव के बच्चे,बूढ़े,स्त्रियाँ
सभी करते थे इंतजार

बड़े चाव और सच्चे भाव से
रामलीला को सहेजते थे
अपने-अपने संस्कारों के संसार में

जब आता था सीता-हरण का प्रसंग
सीता का विलाप देखकर
आँसुओं में घिर जाती थीं
भोली-भाली ग्रामीण स्त्रियाँ

हम बालक आँसुओं में भीगी स्त्रियों को
विस्मय और कौतूहलता से निहारते थे
तब रुदन के ऊँचे-नीचे
घुमावदार रास्तों से अनजान थे

समय का पहिया
जब परिवर्तन के रास्तों पर चला
फिर समझ सके
किसी के दुःख से द्रवित होने का भाव

तब जान पाये
सीता के दुःख में ही शामिल था
ग्रामीण स्त्रियों का भी अपना-अपना दुःख।

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सुख-दुःख

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हर किसी को सुख सुहाता है
उसे दुलारते हैं
दुःख नहीं चाहता कोई
उसे दुत्कारते हैं

अप्रिय होने पर भी
दुःख सबके द्वार जाता है
उसे आता देख
हर कोई मुँह फेर लेता है
अपने प्रति यह भर्त्सना
कैसी लगती होगी दुःख को?

दुनिया में हर भाव को
गहराई से समझने की दरकार है
यहाँ तक की दुःख को भी

बहुत सारे दुःख
हमारी नासमझी से पैदा होते हैं
क्यों न हम दुःख को भी?
नये नजरिये से समझने का जतन करें

संभव है फिर वह दुःख न लगे
जिसे अभी तक
हम दुःख मानकर जीते रहे हैं।

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अपना-अपना दुःख-2

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एक आदमी मिला
उसने जी भर
मेरे संग समय बिताया

विदा लेते हुए
वह मेरे गले लगा

और कुछ ही देर में
फूट-फूट कर रोने लगा

किसी के लिए भी
यह दुविधा की घड़ी हो सकती थी

फिर मुझे लगा
शायद उसका दुःख
किसी एकाकी बुज़ुर्ग-सा था

जिसे देखने सुनने वाला
आसपास कोई न था।

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जुड़वाँ

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सुख और दुःख
दो जुड़वाँ भाई हैं।

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पकना

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दुःख
धीरे-धीरे पकता है

समय आने पर
झर जाता है।

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