कविता
फुटपाथ की लड़की
अनुपम शर्मा
लालबत्ती जली
मेरी गाड़ी चौक पर रूकी
गाड़ी की तरफ दौड़ते हुए आए
कुछ बच्चे
कोई शीशा साफ करने वाला
कोई पापड़ बेचने वाला
कोई रूमाल और खिलौने बेचने वाला
अचानक
गाड़ी के दरवाजे पर दस्तक हुई
एक चौदह-पंद्रह साल की लड़की
गोद में शीशु लिए
भीख मांगने आई
मैंने गाड़ी का शीशा नीचे किया
वह बोली – “बच्चा भूखा है कुछ दे दो”
मैंने पूछा – “बच्चा किसका है?”
वह बोली- मेरा
मैंने उसे गौर से देखा और पूछा –
“तुम तो खुद अभी बच्ची हो !
फिर तुम्हारा बच्चा कैसे?”
वह कुछ पल चुप रही फिर बोली –
“हम फुटपाथ की लड़कियों को ऐसे ही बच्चे हो जाते हैं।”
उसकी आवाज़ में
ना शिकायत थी
ना सवाल था
था तो बस एक कड़वा सच
मैंने पूछा – ” तुम स्कूल क्यों नहीं जाती?”
वह झुंझला कर बोली -” पैसे देने हो तो दो दिमाग क्यों खाती हो ”
मैंने चुपचाप
दस रूपए उसकी हथेली पर रख दिए
उसी क्षण
बत्ती हरी हो गई
गाड़ी आगे बढ़ गई
और देखते ही देखते
मेरी आंखों से ओझल हो गई
“वह फुटपाथ की लड़की”
लेकिन उसकी एक बात –
“हम फुटपाथ की लड़कियों को ऐसे ही बच्चे हो जाते हैं”
अब भी मेरे अन्तर्मन में लाल बत्ती की तरह जल रही है।
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