राजनैतिक व्यंग्य
ज्ञानू का दर्द
विष्णु नागर
महत्वाकांक्षा का मारा ज्ञानेश कुमार बेचारा बुरी तरह फंस चुका है। उसके प्राण अधर में लटके हैं। कब पद रूपी ये प्राण- पखेरू उड़ जाएं, कुछ पता नहीं। कब उसे धर्मेन्द्र प्रधान बना दिया जाए, कम से कम वह नहीं जानता। किसी भी दिन संदेसा आ सकता है, ज्ञानू तू हट जा।
न बेचारे से उगलते बन रहा है, न निगलते। रोज ये गरीब गंदी से गंदी गालियां खा रहा है। देशद्रोही, गद्दार, बेईमान, चोर, डाकू और भी उसे न जाने क्या-क्या कहा जा रहा है। उसकी गिरफ्तारी की मांग की जा रही है। राहुल गांधी धमकी दे रहे हैं कि ज्ञानेश, तू सरकार का भंडाफोड़ गवाह बन जा, वरना हम सत्ता में आए, तो तू जेल जाएगा! बच नहीं पाएगा। ये जो तू इम्यूनिटी नामक सुरक्षा तंत्र पर इतरा रहा है न, वह हट जाएगा। बचना हो, तो अभी बच जा! ये मोदी-शाह तुझे बचा नहीं पाएंगे। ये तो खुद कहीं छुपे होंगे। अपना मोबाइल कूड़ेदान में फेंककर रफूचक्कर हो चुके होंगे! ज्ञानू तू अक्ल से काम ले!
अंदर ही अंदर ज्ञानेश कुमार भी उबल रहा है। मोदी-शाह को मन ही मन बुरी से बुरी गालियां दे रहा होगा कि इन नासपिटों ने मेरी वफादारी का यह इनाम दिलवाया है? ज्ञानेश ब्राह्मण होता, तो इन्हें श्राप दे देता, इन्हें भस्म कर देता, मगर विधि की विडंबना कि बेचारे को बनिया परिवार में जन्म मिला, तो इस हद तक जा नहीं सकता। बेचारा सिविल इंजीनियरिंग छोड़कर आईएएस गालियां खाने के लिए तो नहीं आया था, वरना वहां खूब ऊपरी कमाई करता और गुड़गांव में विशाल बंगला बनाकर मस्ती से रहता। हद से हद इनकम टैक्स का छापा पड़ता। केस चलता। जेल हो जाती, तो जमानत मिल जाती। फिर से ऐश शुरू हो जाती!
बेचारा इसलिए तो अमित शाह की गोद में नहीं बैठा था कि कल के इन छोकरा-छोकरियों के जूते पे जूते खाऊंगा और चूं तक करने की इजाजत नहीं होगी। इसलिए तो बेचारे ने मोदी-शाह की इच्छापूर्ति के लिए कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के लिए कानून का ड्राफ्ट बनाने में मदद नहीं की थी। इसलिए तो इस जीव ने श्रीराम तीर्थ क्षेत्र की स्थापना का काम अपने कंधों पर नहीं लिया था और चोरी के लिए बहुत सी दरारें खुली नहीं छोड़ी थीं। इसलिए तो इस गरीब ने केरल के एक उच्च आईएएस अधिकारी को शाह के कहने पर भाजपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने की पेशकश नहीं की थी। इसलिए तो इस पुअर गाई ने रिटायरमेंट के बाद चुनाव आयुक्त और फिर मुख्य चुनाव आयुक्त के पद के लिए लार नहीं टपकाई थी। इसलिए तो इसने मतदाता सूची से 13 करोड़ के नाम नहीं काटे थे। इसलिए तो इसने अपनी इतनी ज्यादा ऐसी- तैसी नहीं करवाई थी।
सोचा क्या था और हो क्या गया। सोचा था कि इस पद से रिटायर होकर फिर राज्यसभा की सीट पा जाऊंगा और मंत्री बन जाऊंगा। खाऊंगा और खाने दूंगा। मंत्री नहीं बना, तो किसी ऐसे राज्य का राज्यपाल बना दिया जाऊंगा, जहां विपक्षी दल की सरकार होगी। उसके काम में दिन में दस बार टांग अड़ाऊंगा और मोदी-शाह के आशीर्वाद पर आशीर्वाद हासिल करता जाऊंगा और एक दिन इस देश का पहला गुप्ता उपराष्ट्रपति या राष्ट्रपति बन टांगें पसार कर लेट लगाऊंगा। जब सो-सोकर ऊब जाऊंगा, तो कुल्ला करने के बाद ये जिस कागज पर दस्तखत करने को कहेंगे, बेझिझक कर दूंगा। इस पर अनंतकाल पछताने की बजाय तिरंगे में लिपट कर इस दुनिया से प्रयाण कर जाऊंगा।
उधर मोदी-शाह इसे फंसाकर चुप बैठे हैं। वे इसे गालियों पर गालियां खाने दे रहे हैं। कह रहे हैं कि चुप बैठ और गालियां सुन। हम भी तो दो-दो, तीन-तीन किलो गालियां रोज खाते हैं, हमारी सेहत तो लगातार सुधर रही है। बिगड़ने का नाम नहीं लेती। देख मोदी जी को, कितने टनाटन हैं। बीच-बीच में झपकी लेते रहते हैं बस। पद नहीं होता, तो ऐसे रह पाते! सूख के कांटा हो जाते। दिल के रोगी हो जाते। शुगर बढ़ जाती! देख उनके गाल, कितने गोल और लाल हैं। बेटा तेरे पास पद है, तो सब है। हैल्थ है, वैल्थ है। तू भी गाली खा और हैल्थ बना। हद से हद जेल होगी, तो चले जाना। हम भी तेरा साथ देने आ जाएंगे। तेरी खैर खबर लेते रहेंगे।
हम तेरे पक्ष में अभी एक शब्द भी बोलेंगे तो हम भी निशाने पर आ जाएंगे। अभी तू भुगत। नौकरी से रिटायर होने के बाद इतना बड़ा तोहफा तुझे इसीलिए तो दिया था कि तू भी मोटी-मोटी गालियां खा। मोटी तनख्वाह लेता है, तो गाली भी मोटी खा और ऊपर से मुस्कुरा। मोदी जी की तरह कीर्तन करना सीख। झांझ-मजीरा बजा। ढोल बजा।
अब स्थिति यह है कि बेचारा रोज- रोज के कलह से मुक्ति पाने के लिए चाहे भी तो अपनी मर्ज़ी से इस्तीफा नहीं दे सकता। देगा, तो मरेगा और नहीं दे रहा है, तो भी जीते जी मर रहा है। त्यागपत्र मर्जी से देगा, तो मोदी-शाह उसे छोड़ेंगे नहीं कि क्या पता ये कौन सा रहस्य खोलकर ये हीरो बन जाए! इस डर से उसे किसी न किसी ऐसे केस में फंसा देंगे कि मरते दम तक चैन नहीं मिलेगा।
रोज गालियां पड़ रही हैं। रोज पुतले जलाए जा रहे हैं। रोज गधे पर बैठाया जा रहा है। इसका एक ही दूरगामी लाभ है कि बदनाम होंगे, तो क्या नाम न होगा, टाइप उसका नाम भी हो जाएगा। आज की जेन जी और उसके बाद आनेवाली जेन अल्फा जिंदगीभर मोदी-शाह के साथ उसका नाम लेगी। राजनाथ सिंह का नाम भूल जाएगी। शिवराज सिंह चौहान का नाम भूल जाएगी, मगर ज्ञानेश का नाम बदनाम होकर ही अमर रहेगा, यही गाली खाने का सबसे बड़ा पुरस्कार है। जब भी 2026 की बात होगी, ज्ञानेश उसमें आएगा ही आएगा।इस समय का राजनीतिक इतिहास जब भी लिखा जाएगा, तो राजीव कुमार का नाम लोग भूल जाएंगे, मगर ज्ञानेश कुमार का नाम अजर भी रहेगा और अमर भी!
इन बेचारे दोनों गुज्जुओं की भी मजबूरी है कि वोट चोरी न करवाएं, तो सत्ता पर कैसे काबिज रहें! 2014 में झूठ चल गया, 2019 में नफ़रत चल गई! 2024 में यह सब नहीं चला। बिना घपले के तो 240 सीटें भी न आतीं। चालीस पर अटक जातीं। अब 2029 में सूपड़ा साफ़ होना तय है। बीस सीटें भी मिल जाएं, तो ईश्वर की कृपादृष्टि मानना चाहिए। ऐसे में बेचारे करते भी क्या, जबकि कांग्रेस की तरह पचास साल सत्ता में रहने का सपना था इनका। इनका हिंदुत्व पिट गया। उसका नाम बदलकर सनातन किया, उसका भी मलीदा बन गया। राम मंदिर बन गया, मगर चला नहीं। ऊपर से चढ़ावा चोरी की घपलेबाजी खुल गई। बार-बार पुलवामा-पुलवामा खेल नहीं सकते। मुसलमानों से नफ़रत के खेल की असलियत भी खुल गई। खूब पैसा जमा किया, उसका लाभ भी उत्तरोत्तर कम होता गया। राज्यों को हजार करोड़ और लाख करोड़ की कथित सौगात देने का खेल भी खेला, वह भी बिगड़ गया। पुल बनते ही ढह गए, सड़कें उद्घाटन से पहले ही टूट गईं। पप्पू और जर्सी गाय कहना उल्टा पड़ गया। पार्टी तोड़ने,सांसद खरीदी का खेल भी अब फ्लाप है। जो इधर आ गए, आज माथा पीट रहे हैं। 2047 का सपना तो आंखों के सामने ही धूल खा रहा है। ज्ञानू तो चाहिए था न बेचारों को! इस देश में इन गरीबों की मजबूरी कोई नहीं सम़झता! सब संवेदनहीन हो चुके हैं।
