डॉ रीटा अरोड़ा की लघुकथा – थोड़ा सा अपने लिए

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

लघु कथा

थोड़ा सा अपने लिए

डॉ रीटा अरोड़ा

 

“माँ, आप हर बात पर हाँ क्यों कह देती हो?” बेटे ने चाय का कप रखते हुए पूछा।

माँ मुस्कुराई, “तुम लोगों की खुशी में ही तो मेरी खुशी है।”

“लेकिन अगर आपकी खुशी कहीं पीछे छूट जाए तो?”

माँ कुछ पल चुप रही।

“माँ होना मतलब हर बार अपनी इच्छा छोड़ देना नहीं होता,” बेटे ने धीरे से कहा।

माँ ने उसकी ओर देखा।

“जहाँ मन न हो, वहाँ ‘न’ कहो। जहाँ थक जाओ, वहाँ रुक जाओ। हर किसी की उम्मीद पूरी करते-करते कहीं ऐसा न हो कि आपको ही अपनी जरूरत समझ न आए।”

माँ हल्का-सा मुस्कुराई, “बड़ा समझदार हो गया है मेरा बेटा।”

“आपसे ही सीखा है।”

अगले दिन बेटे का फोन आया-
“माँ, आज मेरे साथ चलोगी?”

माँ ने कुछ क्षण सोचा।

“आज नहीं बेटा।”

“क्यों?”

माँ ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा,
“आज मैंने अपने लिए कुछ तय किया है।”

फोन के उस पार कुछ पल खामोशी रही।

“ठीक है माँ,” बेटे ने बस इतना कहा।

माँ ने फोन रख दिया।

सामने मेज पर बेटे का दिया हुआ पुराना गुलदस्ता रखा था। उसने उसे देखा, फिर अपनी डायरी खोली।

कई वर्षों बाद उसने उसमें अपने लिए कुछ लिखना शुरू किया।

शब्द बहुत कम थे-

“आज से…”

वह कुछ देर रुकी।

फिर आगे क्या लिखा, यह शायद सिर्फ वही जानती थी।

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