तय करना होगा—मतदाता सरकार चुनेगा या सत्ता मतदाता को चुनेगी?

ज्वलंत मुद्दा

तय करना होगा—मतदाता सरकार चुनेगा या सत्ता मतदाता को चुनेगी?

धर्मेन्द्र आज़ाद

तानाशाही हमेशा गोलियाँ और टैंक लेकर नहीं आती… कभी-कभी अटपटे फरमानों और चुनावी धाँधली के रास्ते भी आती है।

SIR को लेकर सवाल अब लगातार गहराते जा रहे हैं। इसके ज़रिए इस आधे-अधूरे लोकतंत्र को भी खत्म करने की साज़िशों की बू आ रही है।

निर्वाचन आयोग के ही दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने चुनाव प्रक्रिया में किए जा रहे बदलावों और फैसलों को लेकर पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग के भीतर आपत्तियाँ दर्ज कीं। फॉर्म 6 को लेकर भी दोनों ने आपत्ति की। रिपोर्टों के अनुसार, विवेक जोशी ने सवाल उठाया कि निर्धारित फॉर्म 6 में वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना बदलाव कैसे किया जा सकता है। बाद में संधू ने इस बदलाव को “अनधिकृत/अवैध” बताते हुए इसे तत्काल हटाने की बात कही।

इसके बावजूद इन आपत्तियों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। सवाल उठता है—आख़िर क्यों?

मुख्य चुनाव आयुक्त, ज्ञानेश कुमार, पर पहले से सवाल उठ रहे थे कि वैधानिक प्रक्रिया के बिना फॉर्म 6 में बदलाव क्यों किया गया। फॉर्म 6, निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 का हिस्सा है और उसमें बदलाव के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।

लेकिन इस विवाद के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त, ज्ञानेश कुमार की ओर से यह कहा गया कि SIR से जुड़े फॉर्म 6 के अतिरिक्त घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट से मंज़ूरी मिली थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उसने फॉर्म 6 के किसी संशोधित संस्करण को मंज़ूरी नहीं दी थी और यह भी जानना चाहता है कि फॉर्म 6 में बदलाव किसने किया।

अब सवाल है—इसे किसने बदला, किसकी मंज़ूरी से बदला और किसके हित में बदला?

तो सवाल सिर्फ एक फॉर्म 6 का नहीं है।

सवाल लोकतंत्र के उस दरवाज़े का है, जिससे होकर नागरिक सरकार चुनता है।

क्योंकि तानाशाही हमेशा टैंक, बंदूक और गोलियों के साथ नहीं आती।

कभी वह एक साधारण-से फ़ॉर्म के रास्ते आ सकती है,
कभी मतदाता सूची के रास्ते—असल नाम हटाकर, नक़ली नाम जोड़कर,
कभी EVM की गड़बड़ियों के आरोपों के रास्ते,
कभी ED, CBI, IT जैसी संस्थाओं के दुरुपयोग के आरोपों के रास्ते,
कभी विधायकों-सांसदों की ख़रीद-फ़रोख़्त के रास्ते,
और कभी अदालतों के जनविरोधी समझे जाने वाले फ़ैसलों के रास्ते।

सबसे बड़ा ख़तरा तब है—
जब जनता सरकार चुनने जाए, लेकिन उससे पहले यह तय किया जाने लगे कि कौन जनता की ओर से वोट देने का अधिकार रखता है और कौन नहीं।

फिर सवाल सीधा है—
लोकतंत्र में मतदाता सरकार चुनता है, या किसी ख़ास राजनीतिक पार्टी और उसके साथ खड़ी संस्थाएँ मिलकर अब मतदाता चुनने लगी हैं?

क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ चुनाव कराने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है—निष्पक्ष चुनाव, स्वतंत्र मतदाता, जनता के हितों के अनुरूप शासन-तंत्र और सत्ता की जवाबदेही।

क्या SIR के नाम पर लोकतंत्र के बुनियादी अधिकारों पर सवाल खड़े नहीं हो रहे?

क्या संस्थाओं के दुरुपयोग के आरोपों की स्वतंत्र जाँच नहीं होनी चाहिए?

क्या इन सारी अनियमितताओं के बढ़ने के साथ-साथ पूँजीपतियों और भ्रष्टाचारियों को देश को लूटने-खसोटने की छूट भी बढ़ती नहीं जा रही है?

क्या इसके विरोध में उठने वाली आवाज़ों के दमन और महिलाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोपों की भी निष्पक्ष जाँच नहीं होनी चाहिए?

अब सिर्फ सवाल नहीं—जवाबदेही चाहिए।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, जिनकी भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, को तत्काल अपने पद से इस्तीफ़ा देना चाहिए, उनसे जुड़े आरोपों और उनके निर्णयों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।

SIR और फॉर्म 6 में हुए बदलावों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच हो। स्पष्ट किया जाए—बदलाव किसने किया, किसकी मंज़ूरी से किया और किसके निर्देश या प्रभाव में किया।

जिन राज्यों में SIR के बाद चुनाव हो चुके हैं, वहाँ पूरी चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची की स्वतंत्र जाँच हो। यदि यह साबित होता है कि SIR के कारण वैध मतदाता मतदान से वंचित हुए, फर्जी नाम जोड़े गए या चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हुई, तो कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई हो और, जहाँ आवश्यक हो, पुनर्निर्वाचन कराया जाए।

SIR में हटाए गए प्रत्येक मतदाता के मामले की स्वतंत्र समीक्षा हो और गलत तरीके से हटाए गए नाम तत्काल बहाल किए जाएँ।

निर्वाचन आयोग और प्रशासन के उन अधिकारियों की उच्चस्तरीय जाँच हो, जिन्होंने इस प्रक्रिया में निर्णय लिए। साथ ही, जिन राजनीतिक दलों, नेताओं या अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों पर अनुचित दबाव या हस्तक्षेप के आरोप हैं, उनकी भी उच्चस्तरीय और समयबद्ध जाँच हो।

दोष सिद्ध होने पर सभी दोषियों को कानून के अनुसार कड़ी सज़ा दी जाए।

मामलों का समयबद्ध न्यायिक निपटारा हो, ताकि लोकतंत्र से जुड़े अपराध और अनियमितताएँ वर्षों तक फाइलों में दबी न रहें।

क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किसने फॉर्म 6 बदला।

सवाल यह है—
क्या किसी ने मतदाता के अधिकार के साथ खिलवाड़ किया?
और अगर किया, तो जवाबदेह कौन है?

लोकतंत्र में मतदाता सरकार चुनता है—
सत्ता मतदाता नहीं चुनती।

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