ज्ञानेश कुमार को जाना होगा!
एम ए बेबी

एक जीवंत और जैविक लोकतंत्र के सबसे ज़रूरी सिद्धांतों में से एक यह है कि उस समाज में चुनाव कैसे होते हैं। इस बारे में जो ज़रूरी चीज है, वह है चुनाव कराने वाले निकाय की पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के समय जो भी गलतियां या विचित्रताएं रही हों, चुनाव आयोग के पास जो निष्पक्ष प्राधिकारिता होनी चाहिए, उन दिनों वह सार्वजनिक थी। लेकिन जब से ज्ञानेश कुमार ने काम संभाला है, मामला ठीक उल्टा हो रहा है। ज्ञानेश कुमार मतदाता सूचियों के कसाई की तरह काम कर रहे हैं, जीवित और असली मतादाताओंं को हटाकर उसे बर्बाद कर रहे हैं। भारत रत्न सी एन आर राव से लेकर कलाकार प्रकाश राज तक, उनसे वोट देने का अधिकार छीन लिया गया और इस अधिकार को वापस पाने के लिए उन्हें प्रशासनिक बाधाओं से गुज़रना पड़ा।
इंडियन एक्सप्रेस में 23 सितंबर को छपी ऋतिका चोपड़ा की जांच-पड़ताल से पता चलता है कि अब ज्ञानेश कुमार को आयोग के अंदर से ही चुनौती मिल रही है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में कम से कम 14 आपत्तियां रिकॉर्ड पर रखीं, जो चुनाव आयोग के नाम पर उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए फैसलों और आदेशों के खिलाफ थीं। इनमें से दो आपत्तियां कैबिनेट सचिव के पास गईं। प्रपत्र-6, जो मतदाता के रूप में पंजीकृत करने का फॉर्म है, जुलाई में यह पूछने के लिए बदल दिया गया था कि क्या आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी का नाम “पिछली एसआईआर” की सूची में है। हालांकि जोशी ने मई में ही चेतावनी दी थी कि इसके लिए मतदाता पंजीयन के नियमों में बदलाव की जरूरत है। संधू ने बाद में रिकॉर्ड किया कि यह बदलाव अनधिकृत और गैर-कानूनी था। जोशी ने मतदाता सूची डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीयकरण के बारे में भी चेतावनी दी, जबकि संधू ने कहा कि आयोग के आईटी प्रमुख के पास, अधिकृत चुनाव पंजीयन अधिकारियों को डेटाबेस तक मिलने वाली पहुंच को रोकने का, कोई कानूनी अधिकार नहीं है। पश्चिम बंगाल में, अधिकरणों (ट्रिब्यूनल) में 38 लाख अपीलें लंबित हैं, जिनमें से 16.10 लाख अपील खुद चुनाव आयोग ने दायर की हैं, जिसमें मतदाताओेंं के नाम हटाने की मांग की गई है। संधू ने पूछा कि ये अपील किसने फाइल कीं, लेकिन न तो उन्हें, न जोशी को, और न ही राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को अभी तक कोई जवाब दिया गया है।

अप्रैल महीने में विधानसभा चुनाव के अभियान के सिलसिले में पश्चिम बंगाल में रहते हुए, मुझे ऐसे निर्वाचन अधिकारियों की तस्वीरें मिलीं, जो चुनाव अधिकारी के रुप में अपनी ज़िम्मेदारियां तो निभा रहे थे, लेकिन वे भी वोट नहीं दे पा रहे थे, क्योंकि उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। स्टेट्समैन जैसे राष्ट्रीय दैनिकों ने उन्हें छापा था। पश्चिम बंगाल में, एसआईआर ने लगभग 91 लाख नाम सूची से हटा दिए हैं, जो कुल मतदाताओं का लगभग 12 प्रतिशत है। इनमें से 27 लाख नाम फैसले के बाद “तार्किक विसंगति” के नाम पर हटा दिए गए, जो सिर्फ़ बंगाल के लिए शुरू की गई एक श्रेणी है, और जब राज्य में विधानसभा चुनाव हुए, तो 99 प्रतिशत से ज़्यादा अपीलें अभी भी लंबित थीं। घोषित नतीजों के विश्लेषण में 49 ऐसे चुनाव क्षेत्र मिले हैं, जहाँ फैसले के बाद हटाए गए नाम ही जीत के अंतर से ज़्यादा थे। भाजपा ने उनमें से 26, टीएमसी ने 21 और कांग्रेस ने दो सीटें जीती, हालाँकि 2021 में टीएमसी के पास 49 में से 48 सीटें थीं। राजारहाट न्यू टाउन में जीत का अंतर 316 वोटों का था, जबकि फैसले के बाद, 24,132 वोट हटाए गए थे। सतगछिया में यह 401 था, जबकि 26,000 से ज़्यादा लोगों के नाम हटाए गए। हर श्रेणी के नाम हटाने के विश्लेषण से पता चला है कि 294 सीटों में से आधे से ज़्यादा सीटों पर मतदाता सूची से हटाए गए (बहिष्कृत) लोगों की संख्या जीत के अंतर से ज़्यादा थी। इससे यह साबित नहीं होता कि कोई भी बहिष्कृत मतदाता किसको वोट करता, लेकिन जब बहिष्कृत मतदाताओें की संख्या जीत के अंतर से ज़्यादा और निर्णयात्मक हो, तो लोकतंत्र आराम से नहीं चल सकता।
मोदी के राज में ऐसा लग रहा था कि कुछ अपवादों को छोड़कर स्वतंत्र और खोजी मीडिया कमोबेश खत्म हो गया है। यह खुशी की बात है कि इंडियन एक्सप्रेस ने साबित कर दिया है कि भारत में खोजी पत्रकारिता अभी भी ज़िंदा है और इसकी धार कायम है। इंडियन एक्सप्रेस के खुलासे के बाद चुनाव आयोग ने जो तथाकथित सफाई दी है, उसमें इस रिपोर्ट में उठाए गए असली मुद्दों को संबोधित नहीं किया गया है। उनके फैसलों में से एक है एजेंडा पहले से जारी करना और बैठक के बाद मिनट्स जारी करना। कई लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि इतनी बुनियादी बात का, जिसे कोई भी संगठन, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, अनुसरण करता है, चुनाव आयोग अब तक अनुसरण नहीं कर रहा था।
अब कई उलझन भरे सवाल उठ रहे हैं। ऐसा ही एक सवाल यह है कि शेषन तक मुख्य चुनाव आयुक्त और शेषन के बाद चुनाव आयुक्तों को कार्यपालिका नियुक्त कर रहा था। ऐसा इसलिए है, क्योंकि 1950 में संविधान स्वीकृत करने के बाद से लगातार केंद्र सरकारें उनकी नियुक्ति के बारे में संसद में कोई कानून बनाने में नाकाम रहीं थीं। अनुच्छेद-324 भारत के राष्ट्रपति को चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करने का अधिकार देता है, जब तक कि संसद उनकी नियुक्ति करने के लिए कानून नहीं बना देती। जनवरी 2015 में, अनूप बरनवाल ने चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति की व्यवस्था को चुनौती देते हुए एक जनहित याचिका दायर की। इस मामले की सुनवाई जस्टिस के. एम. जोसेफ की अगुवाई वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने की थी। केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, क्योंकि इसके गलत इस्तेमाल का कोई सबूत नहीं है।
इसी पृष्ठभूमि में पीठ ने 2 मार्च, 2023 को एकमत से फैसला सुनाया कि आयोग की आज़ादी सिर्फ़ कार्यपालिका पर नहीं छोड़ी जा सकती। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब तक संसद अनुच्छेद-324 के तहत कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की कमिटी की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाए। इसने संसद से यह भी अनुरोध किया कि चुनाव आयुक्तों को हटाए जाने के खिलाफ़ वही संरक्षण दिया जाए, जो मुख्य चुनाव आयुक्त को मिला हुआ है। प्रधानमंत्री देश का सबसे बड़ा कार्यकारी कार्यालय है, और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के बारे में फैसले लेने में उनकी भी भूमिका होनी चाहिए। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका पर किसी व्याख्या की ज़रूरत नहीं है। जब देश में चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए चुने जाने वाले व्यक्ति के बारे में राय में अंतर हो, तो देश के राजनैतिक रूप से तटस्थ मुख्य न्यायाधीश की मौजूदगी से आम सहमति बनाने में मदद मिलती। लेकिन, नरेंद्र मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के निर्देश को नज़रअंदाज़ कर दिया। सुप्रीम कोर्ट की समझदारी भरी, कानूनी और साफ़ सलाह को कानूनी रूप देने के बजाय, उन्होंने पहले एक अध्यादेश जारी किया और फिर मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को राजनीतिक रूप से एकतरफ़ा प्रक्रिया बनाने वाला विधेयक पेश किया। नतीजन, कार्यपालिका का प्रतिनिधित्व दो-तिहाई हो गया और विपक्ष का नेता सिर्फ़ मूक दर्शक बन गया।
अब यह बात साफ है कि ज्ञानेश कुमार के व्यवहार से, मोदी सरकार का सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को नज़रअंदाज़ करने का, मकसद पूरा हो गया है। और तो और, वह उस भाजपा के इशारों पर नाचने वाली कठपुतली की तरह काम कर रहे हैं, जिसे फासीवादी आरएसएस नियंत्रित करता है। इंडियन एक्सप्रेस के खुलासे के बाद, अगर उनमें ज़रा भी आत्मसम्मान होता, तो उन्हें तुरंत इस्तीफ़ा दे देना चाहिए था। ज्ञानेश कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर चिपके रहने का हर घंटा उनकी इज़्ज़त को कम कर रहा है और उनमें ईमानदारी की कमी को दिखाता है।
सीपीआई(एम) चाहती है कि पूरा गैर-भाजपा, गैर-एनडीए राजनैतिक समूह, अपने अलग-अलग तरह के मतभेदों के बावजूद, ज्ञानेश कुमार को हटाने और उन पर मुकदमा चलाने, एसआईआर की प्रक्रिया को रोकने, मतदाता सूची से हटाए गए सभी पात्र नामों को तुरंत बहाल करने और सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के सुझावों के अनुसार, चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था बनाने के आंदोलन में हाथ मिलाए। यह अभी तक का व्यापकतम संभव आंदोलन होना चाहिए।
हमारा नज़रिया यह है कि सिर्फ़ राजनैतिक पार्टियां ही नहीं, बल्कि पूरा नागरिक समाज, बुद्धिजीवी, कलाकार, लेखक और सांस्कृतिक हस्तियां — सभी को इस आंदोलन का हिस्सा बनकर एक साथ आना चाहिए। इस आंदोलन का पांच वामपंथी पार्टियों — सीपीआई(एम), सीपीआई, सीपीआई (एमएल)-लिबरेशन, एआईएफबी और आरएसपी ने समर्थन किया है, और हमने 29 सितंबर को व्यापक स्तर पर एक साथ आने की एक झलक देखी है।
30 सितंबर को हुई इंडिया समूह की बैठक में भी इस बात पर सहमति बनी है, ताकि हमारे संवैधानिक मूल्यों और भारत के विचार की रक्षा की जा सके। जैसा कि इंडिया समूह ब्लॉक की पत्रकार वार्ता में ऐलान किया गया है, देश के सभी जिलों में मिलकर संयुक्त रूप से विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे। इसे नए भारत के राजनीतिक विकास में एक ऐतिहासिक मोड़ बनना चाहिए।
