जसवीर त्यागी की पर्यावरण केंद्रित कविताएँ

जसवीर त्यागी की पर्यावरण केंद्रित कविताएँ

 

जुड़ाव

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कितने पत्तें
डाल से जुड़े होते हैं

कितनी छोटी डालें
बड़ी डालों के कंधों पर सवार रहती हैं

कितनी छोटी-बड़ी डालें
एक तने से आबद्ध रहती हैं

और एक तना
न जाने कितनी जड़ों के सिर पर सवार रहता है

दुनिया में बहुत कुछ
परस्पर एक-दूजे से बंधा है
तभी वह जिंदा है।

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सदाबहार के फूल

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सदाबहार के फूल
सदा मुस्कुराते रहते हैं
आख़िर ऐसा क्या है उनके पास?
जिसे पाकर वे उल्लसित रहते हैं

सदाबहार के फूलों से
पूछा मैंने एक दिन
सदा मुस्कुराने का राज क्या है?
सदाबहार के फूल मुस्कुराते हुए बोले-

हमें ज्ञात है
संसार और फूलों की हकीकत
बस!यही जानकर मुस्कुराते हैं
कि जीवन नश्वर ही सही
फिर भी कहीं-न-कहीं
बची रहे मुस्कुराहट

चाहे किसी डाल पर हो
या किसी की स्मृतियों में हो।

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जीवन

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बीज के लिए
मिट्टी जीवन है

मिट्टी के लिए
बीज जीवन है

मिट्टी और बीज
इंसान के लिए जीवन है

जब कभी
मिट्टी हो जाऊं मैं
तुम बीज हो जाना

हम दोनों मिलकर
जीवन हो जाएंगे।

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|| टूटना ||

 

झर रही हैं नीम की पत्तियाँ

पत्तियाँ अठखेलियाँ करती हुई
बगैर समझे-विचारे
कूद पड़ती हैं डाल से जमीन पर

हरे-पीले हल्के रंग की
हाथ से बुनी हुई-सी एक चादर
बिछती जा रही है पृथ्वी पर

पत्तियाँ जुदा हो रही हैं पेड़ से
और सुगन्ध पत्तियों से दूर जा रही है

पत्तियाँ हों
हो जीव-जंतु या मनुष्य
टूटता है जो एक बार अपने मूल से

फिर खोया-खोया-सा
भटकता फिरता है दर-बदर

नीम से टूटी हुई
पत्तियों की मानिंद।

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|| जन्म ||

 

एक दिन पेड़ से
किसी पत्ते-सा टूटकर
धरा पर गिरूँगा मैं
समय सोख लेगा
बची-खुची हरीतिमा भी

डाल से टूटे हुए पत्ते को
हवा उठा लेगी अपनी गोद में
और ले जाकर छोड़ देगी
किसी निर्जन स्थान पर
अज्ञात में पड़ा-पड़ा पत्ता
अकेलेपन के प्रहार से टूटेगा कई बार

फिर उड़ता हुआ कोई पंछी
आयेगा किसी दिन
उठा लेगा टूटे पात को अपनी चोंच में
ले जायेगा किसी हरे भरे पेड़ की डाल पर
बनायेगा अपने अजन्मे शिशुओं के लिए एक घरौंदा

इस तरह नवजात शिशुओं के जन्म के साथ-साथ
जन्म लेगा
डाल से टूटा हुआ पत्ता भी फिर एक बार।

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बुरांस का फूल

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उसने मुझे
बुरांस का फूल दिया उपहार में

एक दिन नहीं होगी वह
मैं भी नहीं होऊँगा किसी दिन संसार में

बुरांस के चटक लाल रंग का फूल
सदा जीवित रहेगा प्यार में।

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कर्म

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हवा चली
पत्तियाँ हिलीं

पत्तियों के हिलने से
पाखी जगे

पाखियों के जगने से
संगीत बजा

संगीत से
संसार कर्म के साज पर सजा।

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प्रकृति

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मैं खिला हुआ फूल था

किसी को पसंद आया
उसने तोड़ लिया

खिलना मेरी प्रकृति था
तोड़ना किसी ने समझा
अपना अधिकार

डाल से टूटने के बाद भी
मैं फूल ही होना चाहूँगा हर बार।

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अभिभावक

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एक पौधा लगाया
खाद-पानी दिया

बीच-बीच में
उसको अनेक बार निहारा
पौधा लगा अपना कोई सगा

पौधे को देख-देख
मन में अभिभावक होने का भाव जगा।

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सूखे पौधे

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बिन पानी
पौधे सूख गये हैं

सूखे हुए पौधे

मन को
खिलने नहीं देते।

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3 thoughts on “जसवीर त्यागी की पर्यावरण केंद्रित कविताएँ”

  1. जसवीर जी,
    क्या कमाल जी कविताएँ लिखी हैं आपने। हर कविता में स्नेहपूर्ण पारस्परिकता, जीवन की नश्वरता में भी अमरत्व एवं नैरन्तर्य, सौन्दर्य व सादगी -सब अवयव हैं। प्रकृति के सूक्ष्म अवलोकन तथा साहचर्य से जन्मी ये कविताएँ भी जीवंत बिम्ब समेटे हुए हैं।
    साधुवाद !

  2. जसवीर सर बहुत अच्छा कविता लिखते हैं

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