आलेख
हरियाणा के बारे में
डॉ रणबीर सिंह दहिया
हरियाणा आज भी एक कृषि प्रधान प्रदेश के रुप में जाना जाता है हालांकि कृषि क्षेत्र के योगदान का प्रतिशत कई कारणों के चलते कम हुआ है। राज्य के सर्मथन और सुरक्षा के माहौल में यहां के किसान और मजदूर-महिला और पुरुष- ने अपने खून पसीने की कमाई से नई तकनीकों,नये उपकरणों,नये खाद बीजों व पाणी का भरपूर इस्तेमाल करके खेती की पैदावार को एक हद तक बढ़ाया और राष्ट्रीय स्तर पर स्थान बनाया जिसके चलते हरियाणा के एक तबके में सम्पन्नता आई मगर हरियाणवी समाज का बड़ा हिस्सा इसके वांछित फल नहीं प्राप्त कर सका।
यह एक सच्चाई है कि हरियाणा के आर्थिक विकास के मुकाबले में सामाजिक विकास बहुत पिछड़ा रहा है। ऐसा क्यों हुआ? यह एक गम्भीर सवाल है और अलग से एक गम्भीर बहस की मांग करता है। हरियाणा के सामाजिक- सांस्कृतिक क्षे़त्र पर शुरू से ही इन्ही सम्पन्न तबकों का गलबा रहा है। देश के विभाजन के वक्त जो तबके हरियाणा में आकर बसे उन्होंने हरियाणा की दरिद्र संस्कृति को कैसे प्रभावित किया इस पर भी गम्भीरता से सोचा जाना शायद बाकी है। क्या हरियाणा की संस्कृति महज रोहतक, जीन्द व सोनीपत जिलों की संस्कृति है ? क्या हरियाणवी डायलैक्ट एक भाषा का रुप ले सकता है?
महिला विरोधी,दलित विरोधी तथा प्रगति विरोधी तत्वों को यदि हरियाणवी संस्कृति से बाहर कर दिया जाए तो हरियाणवी संस्कृति में स्वस्थ पक्ष क्या बचता है ? इस पर समीक्षात्मक रुख अपनाकर इसे विष्लेषित करने की आवष्यकता है। क्या पिछले दस पन्दरह सालों में और जयादा चिन्ताजनक पहलू हरियाणा के सामाजिक- सांस्कृतिक माहौल में शामिल नहीं हुए हैं?व्यक्तिगत स्तर पर महिलाओं और पुरुषों ने बहुत सी सफलताएं हासिल की हैं। समाज के तौर पर 1857 की आजादी की पहली जंग में सभी वर्गों,सभी मजहबों व सभी जातियों के महिला पुरुषों का सराहनीय योगदान रहा है। इसका असली इतिहास भी कम सामने आया है और कम लोगों तक पहुंच सका है।
हरियाणा में फौजियों की काफी संख्या रही है उनका हरियाणा के सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य पर गहरा प्रभाव रहा है। हरियाणा में नाथ परम्परा की भूमिका भी पूरी तरह सामने नहीं आ पाई है। आज के दिन प्रतिक्रियावादी ताकतों का दखल हमारे सामाजिक सांस्कृतिक जीवन में बढ़ा है। वे बिन्दु क्या हैं हमारी विरासत में जो कि हमारे आने वाले सांस्कृतिक सामाजिक जीवन में सकारात्मक तथा मानवतावादी व वैज्ञानिक नजर पैदा करने में मददगार हो सकते हैं।
इसी प्रकार हमने 1983 में जिस प्रकार हरियाणा के सामाजिक सांस्कुतिक परिदृश्य को परिभाषित करने के प्रयास किये आज 30 साल के बार क्या दोबारा से उसकी समीक्षा करने की आवष्यकता नहीं है। ये सब सवाल हैं जिनके साथ आने वाले समय में हमें रुबरु होकर ही अपना रास्ता तय करना होगा। यही सवाल दिमाग में रख कर एक नजर डालने का प्रयास किया गया है। इसे बहुत ढंग से समृद्ध किये जाने की आवश्यकता है।
