लघु कथा
मेरे बिना भी
डॉ रीटा अरोड़ा
रिटायरमेंट से एक दिन पहले अरुण फाइलें समेट रहा था।
रवि ने पूछा,
“इतने परेशान क्यों हो?”
“मेरे बाद ये विभाग कैसे चलेगा?”
“क्यों नहीं चलेगा?”
“पैंतीस साल दिए हैं मैंने। हर मुश्किल फाइल मेरे पास आती है।”
“सही है।”
“नए लोगों को आधा काम भी नहीं आता।”
रवि मुस्कुराया।
“सीख जाएँगे।”
अरुण को बात चुभी।
“इतना आसान है मुझे बदलना?”
“तुम्हें नहीं… तुम्हारा काम संभालना है।”
“फर्क?”
रवि ने मेज़ पर पड़ी ताश की गड्डी उठाई।
“एक पत्ता निकालो।”
अरुण ने बादशाह निकाला।
“अब खेल?”
“अधूरा।”
रवि ने उसकी जगह जोकर रख दिया।
“अब?”
अरुण कुछ क्षण पत्तों को देखता रहा।
“चल तो जाएगा…”
तभी नया कर्मचारी आया।
“सर, ये फाइल समझा देंगे?”
अरुण ने सामने वाली कुर्सी खिसका दी।
“बैठो।”
“सर, आपके बाद मुश्किल होगी।”
अरुण ने फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी।
“आज तुम सीख लो।”
शाम को उसने मेज़ खाली की, नेमप्लेट उतारी और बाहर निकल गया।
दरवाज़े तक पहुँचकर एक बार पीछे देखा।
उसकी कुर्सी पर वही नया कर्मचारी बैठा था।
मेज़ के कोने पर ताश का जोकर अब भी पड़ा था।
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