लघुकथा
नज़रिया
डॉ रीटा अरोड़ा
“फिर रिजेक्ट?”
रिया ने नेहा का चेहरा देखकर पूछा।
“हाँ… तीसरी बार।”
“बुरा लग रहा है?”
“बहुत। लगता है मुझमें ही कुछ कमी है।”
रिया ने उसकी तरफ कॉफी बढ़ाई।
“एक रिजेक्शन तुम्हारी काबिलियत तय करेगा?”
“एक नहीं… तीन हैं।”
“और कोशिशें?”
नेहा चुप हो गई।
रिया मुस्कराई—
“वो गिनना भूल गई?”
नेहा ने फोन उठाया।
“कभी-कभी लगता है, सब मुझसे आगे निकल गए।”
“हो सकता है। लेकिन उनकी मंज़िल तुम्हारी थोड़ी है।”
“और मेरी?”
“शायद रास्ते में है।”
नेहा की आँखों में हल्की चमक आई।
“तुम्हें सच में लगता है कुछ अच्छा होगा?”
रिया हँसी-
“मुझे इतना पता है—आज का रिजेक्शन कल का फैसला नहीं है।”
तभी मोबाइल पर एक नई जॉब का नोटिफिकेशन चमका।
नेहा ने उसे खोला।
“Profile अच्छी लग रही है…”
“तो?”
नेहा की उँगली *Apply* पर जाकर रुक गई।
रिया ने कुछ नहीं कहा।
खिड़की से आती सुबह की रोशनी स्क्रीन पर पड़ रही थी।
नेहा मुस्कराई और कॉफी का एक घूँट लिया।
स्क्रीन अब भी खुली थी…
और सामने रास्ता भी।
