किताबों में स्त्रीवाद, सड़कों पर स्त्री
रत्ना भदौरिया
स्त्री के पक्ष में लिखा गया साहित्य कम नहीं है। किताबों की अलमारियाँ स्त्री की अस्मिता, स्वतंत्रता, देह और अधिकारों से भरी पड़ी हैं। पन्नों पर पितृसत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध है, भाषणों में मुक्ति की आकांक्षा है और सभागारों में स्त्री की स्वतंत्रता के पक्ष में गूंजते हुए स्वर हैं। शब्दों ने स्त्री के लिए एक नई दुनिया रची है—लेकिन उन शब्दों से बाहर निकलते ही एक दूसरी स्त्री दिखाई देती है, जिसकी दुनिया अब भी उतनी ही अंधेरी है।
वह किसी विमर्श की प्रतिनिधि नहीं है। वह किसी मंच की वक्ता नहीं है। उसके पास अपने शोषण को परिभाषित करने वाली भाषा तक नहीं। वह गरीब है, वंचित है और व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर खड़ी है। दुष्कर्म के बाद उसका संघर्ष अपराधी से समाप्त नहीं होता; वहीं से उसकी दूसरी लड़ाई शुरू होती है—अपनी बात मनवाने की, अपनी पीड़ा पर विश्वास करवाने की और न्याय के दरवाजे तक पहुँचने की।
वह थाने जाती है तो उसके साथ केवल उसका दुख नहीं जाता; उसके साथ उसकी गरीबी भी जाती है। उसकी आवाज के साथ उसकी सामाजिक हैसियत भी खड़ी होती है। वह जितनी असहाय होती है, उतना ही कठिन हो जाता है उसके शब्दों का सुना जाना। अपराध उसके शरीर के साथ हुआ था, लेकिन उसके बाद उसकी पूरी जिंदगी उस अपराध की छाया में चलती रहती है।
यहीं किताबों का स्त्रीवाद एक असहज जगह पर आकर ठहर जाता है।
क्योंकि जिस स्त्री की स्वतंत्रता पर हम विचार करते हैं, उसके पास अपनी स्वतंत्रता बचाने के लिए संसाधन हैं; और जिस स्त्री के पास संसाधन नहीं हैं, उसके लिए स्वतंत्रता का पहला अर्थ ही है—कोई उसकी बात सुन ले।
एक स्त्री अपनी देह पर अधिकार की घोषणा कर सकती है; दूसरी अपनी देह पर हुए अपराध के बाद न्याय की एक पंक्ति लिखवाने के लिए दर-दर भटकती है। एक स्त्री के लिए स्त्रीवाद अपनी पहचान चुनने का अधिकार हो सकता है; दूसरी के लिए वही शब्द शायद इतना दूर है कि वह केवल इतना जानती है कि उसके साथ गलत हुआ है और उसे न्याय चाहिए।
यह अंतर स्त्रीवाद के विचार को गलत नहीं बनाता, लेकिन उसके सामाजिक विस्तार पर एक कठोर प्रश्न अवश्य खड़ा करता है।
क्या स्त्री की मुक्ति का विमर्श उस स्त्री तक पहुँचता है, जिसके पास अपने पक्ष में खड़ा होने के लिए न पैसा है, न पहुँच, न प्रभाव और न कोई मंच?
या फिर हमारी वैचारिक संवेदनाएँ भी समाज की तरह वर्गों में बँटी हुई हैं?
गरीब स्त्री की त्रासदी यह नहीं कि उसके साथ अपराध हुआ; त्रासदी यह भी है कि अपराध के बाद उसे अपनी ही पीड़ा का पीछा करना पड़ता है। वह आवेदन लेकर घूमती है, बयान देती है, इंतजार करती है, फिर पूछती है—अब क्या होगा? उसका जीवन न्याय की तारीखों और दरवाजों के बीच धीरे-धीरे घिसता रहता है।
उसके लिए न्याय कोई विमर्श नहीं, रोजमर्रा की भूख जितनी ठोस जरूरत है।
और यहीं साहित्य, स्त्रीवाद और समाज—तीनों की दूरी दिखाई देती है। हम स्त्री के बारे में बहुत कुछ कह चुके हैं, लेकिन उस स्त्री की आवाज सुनने के लिए कितनी बार उसके पास गए हैं, जो अपनी पीड़ा लेकर किसी सड़क के किनारे, किसी थाने के बाहर या किसी बंद दरवाजे के सामने बैठी है?
किसी गरीब स्त्री के साथ हुए दुष्कर्म पर लेख लिख देना उसके पक्ष में खड़ा होना नहीं है। उसकी पीड़ा को शब्द दे देना भी पर्याप्त नहीं। क्योंकि शब्दों की दुनिया में उसे न्याय नहीं मिलता; न्याय उसे उस वास्तविक दुनिया में चाहिए जहाँ उसकी शिकायत दर्ज होनी है, जहाँ अपराधी पर कार्रवाई होनी है और जहाँ उसकी गरिमा को फिर से मनुष्य की गरिमा माना जाना है।
इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं कि स्त्रीवाद कितना लिखा गया। प्रश्न यह है कि उस लेखन और उस स्त्री के बीच कितनी दूरी बची हुई है।
एक ओर पुस्तकालयों में स्त्री की मुक्ति पर बहसें हैं और दूसरी ओर सड़क पर एक गरीब स्त्री अपने साथ हुए दुष्कर्म के बाद न्याय के लिए भटक रही है। दोनों दृश्य एक ही समाज के हैं।
फिर यह विरोधाभास किसका है?
क्या हमने स्त्री की मुक्ति को इतना बौद्धिक बना दिया है कि उसकी सबसे गरीब, सबसे असहाय और सबसे अधिक पीड़ित स्त्री तक पहुँचते-पहुँचते उसके अर्थ ही समाप्त हो जाते हैं?
और यदि किताबों में स्त्री की आवाज लगातार मजबूत होती जा रही है, लेकिन सड़क पर न्याय के लिए भटकती स्त्री अब भी अकेली है—
तो आखिर हमारी किताबों में बोल कौन रहा है, और हमारी सड़कों पर चुप कौन है?
