वोट ही छीन लिया, तो लोकतंत्र कैसा?

वोट ही छीन लिया, तो लोकतंत्र कैसा?

धर्मेन्द्र आज़ाद

 

आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि चुनाव कौन जीतेगा। सवाल इससे कहीं बड़ा हो गया है—क्या हर नागरिक का वोट वास्तव में सुरक्षित है?

SIR को लेकर देश में उठ रहे सवाल इसी बुनियादी चिंता को सामने ला रहे हैं। क्योंकि लोकतंत्र में चुनाव की निष्पक्षता केवल मतदान के दिन तय नहीं होती; यह इस बात से भी तय होती है कि किसका नाम मतदाता सूची में है और किसका नहीं।

विपक्षी राजनीतिक दल और सिविल सोसाइटी लंबे समय से आरोप लगाते रहे हैं कि इस कवायद का राजनीतिक लाभ सुनियोजित तरीके से भाजपा को पहुँचाया जा रहा है। इन आरोपों की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।

आँकड़े इन आरोपों को और गंभीर बनाते हैं। SIR के तहत 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में अब तक 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं। दिल्ली में ही करीब 47 लाख नाम अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लिकेट जैसी श्रेणियों में डाले गए, करीब 11 लाख नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर रह गए और लगभग 32 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए।

अब सामने आए नए खुलासों से सवाल और गंभीर हो गए हैं। खबरों के मुताबिक, चुनाव आयोग के तीन में से दो आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग की कार्यप्रणाली पर आपत्ति दर्ज की है। जब संस्था के भीतर से ही इतने गंभीर सवाल उठ रहे हों, तो जवाबदेही और स्वतंत्र जाँच की माँग और भी जरूरी हो जाती है।

कहने को भारत का संविधान हर नागरिक को बराबर अधिकार देता है, लेकिन वास्तविक जीवन में धन, बाहुबल और सत्ता के प्रभाव के सामने आम नागरिक के अधिकार पहले भी कभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहे। दूसरी ओर, प्रभावशाली लोगों पर कानून अक्सर मेहरबान रहा है।

लोकतांत्रिक संस्थाएँ जनता के हितों की रक्षा का दावा करती हैं, लेकिन व्यवस्था का तराजू हमेशा ताकतवर आर्थिक वर्गों के पक्ष में झुका रहता है। चुनावों में पूँजी, कॉरपोरेट हितों और सत्ता के गठजोड़ से कौन अनजान है?

फिर भी जनता के हाथ में एक महत्वपूर्ण अधिकार बचता था—उसका वोट।

कम-से-कम निरंकुशता और तानाशाही की हद पार होने पर जनता के पास सत्ता बदलने और कम बुरे विकल्प को चुनने का एक औजार तो था। शायद यही वजह है कि राजनीतिक दल, दिखावे के लिए ही सही, जनता के प्रति हमदर्दी दिखाने और उसके सवालों का जवाब देने के लिए कुछ हद तक विवश होते थे।

लेकिन अगर वोटर लिस्ट भी मनमर्जी से बनने लगे, योग्य नागरिकों के वोट मतदाता सूची से बाहर होने लगें और फर्जी वोटर जोड़े जाने लगें, तो यह महज चुनावी प्रक्रिया की खामी या सामान्य गलती नहीं है। यह जनता के सीमित लोकतांत्रिक अधिकार पर सीधा प्रहार है—उस अधिकार पर, जिसे जनता ने लंबे संघर्षों से हासिल किया है।

SIR की प्रक्रिया पर शुरू से ही सवाल उठते रहे हैं। अब, जब इसे लेकर स्वयं चुनाव आयोग के भीतर गंभीर मतभेद सामने आए हैं, तो मुख्य चुनाव आयुक्त समेत चुनाव आयोग की भूमिका की स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जाँच होनी चाहिए। सरकार और चुनाव आयोग के बीच मिलीभगत के आरोपों की भी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। और यदि वोट के अधिकार से जानबूझकर खिलवाड़ या “वोट चोरी” साबित होती है, तो जिम्मेदार लोगों पर कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

पूँजीवादी व्यवस्था में लोकतंत्र पहले ही सीमित है; जनता के वोट को भी सीमित कर दिया जाए, तो लोकतंत्र सिर्फ एक खोखला आवरण बनकर रह जाता है।

आज असली सवाल सिर्फ वोट देने का नहीं, वोट बचाने का बन गया है। चुनाव केवल सत्ता बदलने की प्रक्रिया नहीं है—यह जनता की उस न्यूनतम राजनीतिक शक्ति का माध्यम है, जिसके जरिए वह सत्ता से सवाल पूछ सकती है और उसे बदल सकती है।

मनमर्जी से तैयार की गई मतदाता सूची से बना तथाकथित जनादेश और उसके दम पर बनाई गई सरकारों के लोकतांत्रिक वैधता पर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।

लोकतन्त्र को बचाने और मजबूत करने के लिए जनता का सिर्फ मतदाता बनना भी पर्याप्त नहीं है, उन्हें इससे आगे बढ़कर अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का पहरेदार भी बनना होगा।

आज वोट का अधिकार बचाना लोकतंत्र बचाने की दिशा में पहला कदम है। लेकिन मंज़िल सिर्फ इतनी नहीं हो सकती। जरूरत ऐसे वास्तविक जनवादी लोकतंत्र की है, जिसमें हर नागरिक के समान अधिकार केवल संविधान की किताब में नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन में भी सुरक्षित हों।

लोकतंत्र तभी सार्थक होगा, जब सत्ता जनता की मालिक नहीं, जनता की जवाबदेह सेवक बने।

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