जसवीर त्यागी की रोटी की गंध और अन्य कविताएं
रोटी की गंध
÷÷÷÷÷÷÷
सड़क किनारे पटरी पर
दो स्त्री-पुरुष रेहड़ी पर रोटी-सब्जी बना रहे हैं
स्त्री के छोटे-छोटे हिम्मती हुनरमंद हाथ
झटपट गोलाकार रोटियाँ बेलते हैं
पुरुष खाली थालियों को भरने में मग्न है
दोनों कर्मठ स्त्री-पुरुष
कामगारों की भूख भगाने में लीन हैं
तवे पर सिंकती रोटियों की गंध
नवंबर की हवा में घुल रही है
संसार की प्रिय गन्धों में सबसे ऊपर है
रोटी की गंध
चम्मच,कटोरी,थाली और चिमटे की आवाज़
भूखे आदमी को
अपने पास बुला रही है
रेहड़ी के इर्द-गिर्द
बड़े चाव से रोटी खा रहे हैं मेहनतकश-मजदूर
भोजन करता हुआ इंसान
किसी भी भाषा की श्रेष्ठ कविता है
रोटियाँ सेंकती स्त्री
और भोजन करते लोग
नवंबर माह की गुनगुनाती धूप में
दूर से ही चमकते हैं
ज्यों चमकती है
चूल्हे में आग।
●
स्त्री और घर
========
पत्नी ने सुबह-सुबह पति से कहा-
दूध फट गया
और उदास हो गयी
पति ने सुना
और अफसोस के धुंध की एक परत
जम गयी उसके चेहरे पर
पूरे दिन में स्त्री ने
चार अलग-अलग परिचितों से ज़िक्र किया
दूध के फट जाने का
हर बार बातचीत में
दूध की गुणवत्ता
और मंहगाई का संदर्भ आया
फटा दूध घूमता रहा
सुबह से रात तक
गृहणी के साथ-साथ
जबकि पति के मन में
दोबारा ख्याल नहीं आया दूध का
पुरुष घर में रहते हैं
और घर
स्त्रियों के भीतर रहता है।
■
दुकान
÷÷÷÷
जब सास थी
तो माँ के बुलाने पर
साल में एक-दो बार मायके हो आती थी वह
सास जबसे स्मृति-सदन में गयी हैं
आना-जाना बहुत कम हो गया है उसका
मायके में माँ
बेटी को याद करती हुई बुलाती है-
आ जाओ,मिल जाओ बूढ़ी माँ से
नाती-नातिन को देखने का मन हुलास मारता है
बार-बार के कहने पर भी
जा नहीं पाती बेटी
उलाहना देती हुई कहती है माँ-
सदा माँ-बाप जिंदा किसके रहे हैं दुनिया में?
जीते-जीते मत आओ
मरने पर दौड़कर आने का क्या फायदा?
बेटी,माँ को समझाती हुई कहती है-
तुम्हीं बताओ अम्मा
पहले सास के आसरे सब छोड़ आती थी
चिंता न थी कोई
अब घर-गृहस्थी किसके भरोसे छोड़कर आऊँ?
फिर इनकी दुकान भी तो है
दो-चार दिन दुकान बंद होने पर ग्राहक टूट जाते हैं
आप तो जानती हैं
महँगाई सुरसा का मुंह फैलाये रहती है
तुम तो समझदार हो अम्मा
बताओ क्या करूँ?
माँ,बेटी को मायके में बुलाना चाहती है
बेटी भी माँ से मिलना चाहती है
दोनों के बीच
दुकान किसी पहाड़-सी आ जाती है।
■
पर्यायवाची
=======
एक स्त्री को
कितने सारे काम-काज पुकारते रहते हैं
एक पूरा होता नहीं
दूसरा पहले से ही
पंक्ति में खड़ा मिलता है
स्त्री हार नहीं मानती
सारे कामों को निपटाती हुई
विजय-पथ पर आगे बढ़ती है
कभी-कभी लगता है
स्त्री और काम पर्यायवाची हैं।
आँख
÷÷÷
सिर्फ़ पुरुष की आँख से
संसार को नहीं देख सकते
ऐसा करना
आधा सच जानना है
प्रकृति ने दो आँखें दी हैं
स्त्री की आँख से भी
देखनी चाहिए यह दुनिया
दोनों आँखों से देखने पर ही
हम पूर्ण सच को जान पाते हैं।
●
जानना
÷÷÷÷÷
जब कभी
उसके बारे में सोचता हूँ
तो लगता है
उसे तब से जानता हूँ
जब उसे जानता भी नहीं था।
■
दुनिया
÷÷÷÷
बसंत
किसी एक फूल के खिलने से नहीं आता
समूची प्रकृति की पुकार है वह
संगीत
किसी एक स्वर से नहीं सजता
वह समग्रता में ग्राह्य बनता है
अच्छी किताब
चंद शब्दों से तैयार नहीं होती
भाषा की एक लंबी साधना
उसे कालजयी बनाती है
कोई भी जीत
किसी एक इंसान की नहीं होती
उसमें अपनों के अनेक हाथ होते हैं
यह दुनिया
किसी एक होने से नहीं
सब के होने से सुंदर बनती है।
|| सोच ||
हम सोचते हैं
काम से जब फुर्सत मिलेगी
और समय की कोई तंगी न होगी
तब अपनी पसंद की
वे किताबें पढ़ेंगे
जिन्हें बड़ी मशक्कत से
हासिल किया हमने
हम कभी नहीं सोचते
किताबें और समय
क्या सोचते होंगे ?
●
