सजाई गई दिल्ली और ढँक दी गई ज़िंदगी

सजाई गई दिल्ली और ढँक दी गई ज़िंदगी

 

रत्ना भदौरिया

 

किसी शहर को सुंदर बनाने और किसी शहर की सच्चाई छिपाने में बहुत महीन-सा अंतर होता है। बाहर से देखने वाले को दोनों एक जैसे लग सकते हैं—साफ सड़कें, चमकती दीवारें, व्यवस्थित यातायात, रंगे हुए फुटपाथ और हर मोड़ पर विकास का सलीका। लेकिन शहर की असली कहानी अक्सर उन्हीं चीज़ों के पीछे छिपी होती है जिन्हें सबसे पहले पर्दे में किया जाता है।

दिल्ली में ब्रिक्स जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन के लिए तैयारियाँ होती हैं। देश की प्रतिष्ठा, राजधानी की छवि और अतिथियों के स्वागत के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। इसमें आपत्ति आयोजन पर नहीं है। दुनिया के सामने अपने देश को व्यवस्थित और सक्षम दिखाना स्वाभाविक इच्छा है। सवाल कहीं और से उठता है—क्या किसी देश की प्रतिष्ठा उसकी सड़कों की चमक से तय होती है या उसके नागरिकों की जिंदगी की रोशनी से?

आयोजन आते हैं तो शहर अचानक अपने ही लोगों से शर्माने लगता है।

झुग्गियाँ, जो वर्षों से उसी शहर की अर्थव्यवस्था को अपने श्रम से चलाती रही हैं, अचानक शहर की सुंदरता पर धब्बा दिखाई देने लगती हैं। उन्हें ढँक दिया जाता है, घेर दिया जाता है, कहीं पर्दों के पीछे कर दिया जाता है। वे लोग, जिन्होंने इस महानगर की इमारतें उठाईं, घरों में काम किया, सड़क किनारे दुकानें लगाईं, सामान ढोया, निर्माण स्थलों पर पसीना बहाया—उन्हीं का अस्तित्व कुछ दिनों के लिए राजधानी की प्रतिष्ठा के लिए असुविधाजनक हो जाता है।

कितनी विचित्र विडंबना है—

जिस श्रम से शहर खड़ा हुआ, उसी श्रमजीवी मनुष्य को शहर की तस्वीर से मिटा दिया गया।

सड़कों पर भीख माँगते लोग भी दिखाई नहीं देने चाहिए। उन्हें हटा दिया जाता है। जैसे गरीबी कोई अपराध हो, जैसे भूख किसी अंतरराष्ट्रीय मेहमान के सामने प्रदर्शित किए जाने योग्य वस्तु न हो। मगर सवाल यह है कि किसी भिखारी को सड़क से हटाने से क्या उसकी गरीबी भी हट जाती है? किसी भूखे आदमी को दृश्य से बाहर कर देने से क्या भूख अदृश्य हो जाती है?

शहर को साफ करना आवश्यक है, लेकिन गरीब को साफ कर देना सफाई नहीं है।

और फिर वे छोटे-छोटे चाय के ठेले हैं—वही चाय, जिसके उदाहरणों से कभी देश के सबसे बड़े राजनीतिक मंचों पर श्रम, संघर्ष और साधारण जीवन की कहानियाँ कही जाती हैं। चाय बेचने वाला व्यक्ति जब सत्ता की भाषा में प्रेरणा का प्रतीक होता है, तब वह सम्मान का पात्र है; लेकिन जब वही चाय का ठेला किसी अंतरराष्ट्रीय आयोजन के रास्ते में दिखाई पड़ता है, तो वह अचानक अव्यवस्था का प्रतीक क्यों बन जाता है?

यह प्रश्न केवल एक ठेले का नहीं है।

यह उस दोहरी दृष्टि का प्रश्न है जिसमें गरीब आदमी की मेहनत तब तक सुंदर लगती है, जब तक वह किसी भाषण की पृष्ठभूमि में हो। जैसे ही उसकी वास्तविक जिंदगी राजधानी की चमकदार तस्वीर के सामने खड़ी होती है, उसे पर्दे के पीछे भेज दिया जाता है।

शहर शायद पहली बार इतना सुंदर नहीं बनाया जा रहा; पहली बार उसकी कुरूपताओं को इतनी सावधानी से छिपाया जा रहा है।

सवाल यह नहीं कि दिल्ली को सुंदर क्यों बनाया गया। सवाल यह है कि सुंदरता की कीमत किसने चुकाई?

करोड़ों रुपये खर्च कर कुछ दिनों के लिए रास्ते चमक सकते हैं, दीवारें रंगी जा सकती हैं, फुटपाथ सजाए जा सकते हैं और उन जगहों पर पर्दे लगाए जा सकते हैं जहाँ से गरीबी दिखाई देती है। लेकिन क्या उतनी ही तत्परता से उन लोगों के जीवन में स्थायी परिवर्तन लाया गया जिनकी गरीबी को ढँकने में पैसा खर्च किया जा रहा है?

अगर झुग्गी शहर की समस्या है तो उसका स्थायी समाधान क्या है?

अगर भिखारी शहर की शर्म है तो उसके पुनर्वास की व्यवस्था कहाँ है?

अगर सड़क किनारे चाय बेचने वाला अतिक्रमण है तो उसके रोजगार का अधिकार कहाँ है?

और अगर अंतरराष्ट्रीय मेहमानों को दिल्ली की सच्चाई नहीं दिखानी है, तो फिर यह आयोजन किसके लिए है—दुनिया के लिए या देश के नागरिकों के लिए?

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