आपदा प्रबंधन

शिक्षा, मनोविज्ञान और आपदा प्रबंधन को साथ लेकर हजारों लोगों को तैयार कर रहे हैं डॉ. विक्रम सिंह चौहान~ दीपक वोहरा

कल्पना कीजिए, अचानक धरती कांपने लगे। इमारतें हिलने लगें। चारों तरफ चीख-पुकार मच जाए। किसी को समझ न आए कि सुरक्षित स्थान कहाँ है और किसे पहले बचाया जाए। या फिर किसी रेल दुर्घटना के बाद कुछ ही मिनटों में घटनास्थल पर अफरा-तफरी का माहौल बन जाए। ऐसी परिस्थितियों में अक्सर सबसे बड़ा संकट केवल दुर्घटना नहीं होता, बल्कि सही समय पर सही निर्णय न ले पाना भी होता है।

यही वह क्षण होता है, जब प्रशिक्षण, संयम और जागरूकता किसी व्यक्ति के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकते हैं।

आपदा कभी सूचना देकर नहीं आती। भूकंप, बाढ़, चक्रवात, आग, भूस्खलन, महामारी, रेल या सड़क दुर्घटना जैसी घटनाएँ कुछ ही क्षणों में सामान्य जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर सकती हैं। ऐसे समय में प्रशिक्षित बचाव दलों की भूमिका तो महत्वपूर्ण होती ही है, लेकिन यदि आसपास मौजूद सामान्य नागरिक भी बुनियादी आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हों, तो वे शुरुआती समय में बेहद महत्वपूर्ण सहायता उपलब्ध करा सकते हैं।

इसी सोच को समाज तक पहुँचाने के प्रयास में डॉ. विक्रम सिंह चौहान का नाम सामने आता है। शिक्षा, मनोविज्ञान, प्रशासन और आपदा प्रबंधन जैसे अलग-अलग क्षेत्रों की पढ़ाई और प्रशिक्षण को अपने कार्य से जोड़ते हुए उन्होंने विद्यार्थियों, पुलिसकर्मियों, रेलवे कर्मचारियों, स्वयंसेवी संस्थाओं और आम नागरिकों के बीच आपदा प्रबंधन की समझ विकसित करने की दिशा में काम किया है।

आपदा सिर्फ प्रकृति की देन नहीं

आम तौर पर जब हम आपदा शब्द सुनते हैं तो हमारे सामने भूकंप, बाढ़ या चक्रवात की तस्वीर उभरती है। लेकिन आपदा का दायरा इससे कहीं बड़ा है।

प्राकृतिक शक्तियों के कारण होने वाली घटनाएँ प्राकृतिक आपदाएँ कहलाती हैं। भूकंप, बाढ़, सूखा, चक्रवात, सुनामी, बादल फटना, प्राकृतिक भूस्खलन, शीत लहर, लू और जंगलों में आग जैसी घटनाएँ इसका हिस्सा हैं।

दूसरी ओर, मानव की असावधानी, लापरवाही, तकनीकी विफलता अथवा सुरक्षा व्यवस्था में कमी के कारण होने वाली घटनाएँ मानव निर्मित आपदाओं का रूप ले सकती हैं। सड़क, रेल और वायु दुर्घटनाएँ, औद्योगिक दुर्घटनाएँ, आग, रासायनिक घटनाएँ, विस्फोट तथा अन्य तकनीकी आपदाएँ इसके उदाहरण हैं।

लेकिन दोनों तरह की आपदाओं में एक बात समान है—तैयारी।

आपदा आने से पहले की तैयारी ही यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि आपदा के बाद नुकसान कितना होगा।

आपदा प्रबंधन का अर्थ सिर्फ राहत पहुँचाना नहीं

आपदा प्रबंधन को अक्सर राहत और बचाव तक सीमित समझ लिया जाता है। वास्तव में इसका दायरा इससे कहीं व्यापक है।

आपदा प्रबंधन में आपदा से पहले तैयारी, जोखिम को कम करने के प्रयास, लोगों को प्रशिक्षण देना, आपदा के दौरान राहत और बचाव कार्य तथा उसके बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण जैसे कई चरण शामिल होते हैं।

किसी स्कूल में मॉक ड्रिल कराना, कर्मचारियों को अग्निशमन यंत्र चलाने का प्रशिक्षण देना, प्राथमिक उपचार की जानकारी देना, सुरक्षित निकासी मार्ग की पहचान करना और लोगों को आपातकालीन परिस्थितियों में शांत रहने का अभ्यास कराना—ये सभी आपदा प्रबंधन का हिस्सा हैं।

डॉ. विक्रम सिंह चौहान इसी व्यापक सोच के साथ प्रशिक्षण और जागरूकता को महत्व देते हैं।

डॉ. चौहान की पहचान केवल आपदा प्रबंधन से जुड़े प्रशिक्षक के रूप में नहीं है। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी विविध है।

वे मनोविज्ञान में पीएचडी हैं। उन्होंने पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर डिग्री हासिल की है। वे डिजास्टर मैनेजमेंट में प्रमाणित काउंसलर हैं और हिंदी साहित्य में भी पोस्ट ग्रेजुएट हैं। इसके अलावा चाइल्ड साइकोलॉजी सहित विभिन्न विषयों में उनकी विशेषज्ञता बताई जाती है।

यह विविध शैक्षणिक पृष्ठभूमि आपदा प्रबंधन को समझने के उनके तरीके को अलग आयाम देती है।

किसी आपदा के समय केवल भौतिक नुकसान ही नहीं होता। लोगों पर मानसिक दबाव भी पड़ता है। भय, घबराहट, अनिश्चितता और तनाव के बीच व्यक्ति कई बार सही निर्णय लेने में कठिनाई महसूस करता है। इसलिए आपदा प्रबंधन में मनोवैज्ञानिक समझ भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

यहीं शिक्षा और मनोविज्ञान का आपदा प्रबंधन से संबंध दिखाई देता है।

डॉ. विक्रम सिंह चौहान की गतिविधियों का दायरा विभिन्न संस्थानों तक फैला हुआ बताया जाता है। वे पीजीआई चंडीगढ़ में कई बार आपदा प्रबंधन काउंसलिंग सेवाएँ दे चुके हैं।

हरियाणा पुलिस अकादमी, मधुबन में भी उनके द्वारा आपदा प्रबंधन से संबंधित कार्यशालाएँ आयोजित की जाती रही हैं।

पुलिस और सुरक्षा बल किसी भी बड़ी आपदा की स्थिति में अग्रिम पंक्ति में काम करते हैं। दुर्घटना स्थल पर लोगों को नियंत्रित करना, घायलों को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाना, यातायात व्यवस्था संभालना और राहत एजेंसियों के साथ समन्वय करना—इन सभी कार्यों में प्रशिक्षण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

ऐसे में आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण केवल सैद्धांतिक विषय नहीं रह जाता, बल्कि यह वास्तविक परिस्थितियों में काम आने वाला व्यावहारिक कौशल बन जाता है।

आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में डॉ. चौहान की गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विद्यार्थियों के प्रशिक्षण से जुड़ा है।

हरियाणा राज्य के भारत स्काउट्स एवं गाइड्स के माध्यम से वे कई हजार विद्यार्थियों को प्रशिक्षित कर चुके हैं और यह कार्य जारी रहने की बात कही गई है। हरियाणा के सरकारी स्कूलों में भी वे कार्यशालाओं के माध्यम से विद्यार्थियों को लगातार प्रशिक्षण देने का काम कर रहे हैं।

बच्चों और युवाओं को आपदा प्रबंधन से जोड़ने का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि वे समाज में जागरूकता के संदेश को तेजी से आगे ले जा सकते हैं।

एक बच्चा यदि स्कूल में सीखता है कि आग लगने पर लिफ्ट का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, सुरक्षित रास्ते से बाहर निकलना चाहिए और घबराने के बजाय सहायता लेनी चाहिए, तो वह जानकारी घर के अन्य सदस्यों तक भी पहुँचा सकता है। इस तरह एक प्रशिक्षण कई लोगों तक पहुँच सकता है।

भारत में रेलवे करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा है। रेल दुर्घटना जैसी स्थिति में कुछ ही समय में बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हो सकते हैं।

ऐसी घटनाओं में शुरुआती कुछ मिनट बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। घायल यात्रियों की मदद, भीड़ को नियंत्रित करना, सुरक्षित स्थान तक लोगों को पहुँचाना और बचाव दल के साथ समन्वय करना जैसी गतिविधियों में प्रशिक्षित कर्मचारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

डॉ. विक्रम सिंह चौहान द्वारा रेलवे कर्मचारियों को समय-समय पर आपदा प्रबंधन संबंधी सेवाएँ और प्रशिक्षण दिए जाने की जानकारी दी गई है। इस तरह का प्रशिक्षण कर्मचारियों को आकस्मिक परिस्थितियों में अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से समझने में मदद कर सकता है।

बड़ी आपदा के समय सरकारी मशीनरी के साथ स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

स्थानीय लोग घटनास्थल को सबसे पहले देखते हैं। वे जानते हैं कि आसपास कौन-से रास्ते हैं, कहाँ लोग फँसे हो सकते हैं और किन परिवारों को तत्काल सहायता की आवश्यकता है। यदि इन्हीं स्थानीय लोगों को पहले से प्रशिक्षण प्राप्त हो, तो वे राहत एवं बचाव व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी बन सकते हैं।

डॉ. चौहान द्वारा सैकड़ों गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से कई हजार लोगों को आपदा बचाव कर्मी के रूप में प्रशिक्षित किए जाने की जानकारी दी गई है।

इस पहल के पीछे एक सीधा विचार दिखाई देता है—मुश्किल घड़ी में हर व्यक्ति को अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार होना चाहिए। संकट की घड़ी में हर व्यक्ति बन सकता है ‘सिपाही’।

आपदा के समय बचाव कार्य केवल वर्दी पहने लोगों की जिम्मेदारी नहीं रह जाता। घटनास्थल पर मौजूद हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में मददगार हो सकता है।

कोई घायल को प्राथमिक उपचार दे सकता है। कोई बच्चों और बुजुर्गों को सुरक्षित स्थान तक पहुँचा सकता है। कोई आपातकालीन सेवाओं को सही जानकारी दे सकता है। कोई भीड़ को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।

लेकिन इसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति को पता हो कि क्या करना है और क्या नहीं करना है। यही कारण है कि आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण में केवल बचाव तकनीक ही नहीं, बल्कि व्यवहार और निर्णय लेने की क्षमता पर भी जोर दिया जाता है।

डॉ. विक्रम सिंह चौहान सरकारी स्कूल में पॉलिटिकल साइंस के लेक्चरर के रूप में कार्यरत हैं। लेकिन उनके कार्यों का दायरा कक्षा में पढ़ाए जाने वाले विषय तक सीमित नहीं दिखाई देता।

एक शिक्षक जब विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम से बाहर जीवन के जरूरी कौशल सिखाता है, तो शिक्षा का अर्थ व्यापक हो जाता है।

आपदा प्रबंधन भी ऐसा ही एक जीवन कौशल है। किसी विद्यार्थी को परीक्षा में अच्छे अंक मिलना महत्वपूर्ण है, लेकिन यदि वही विद्यार्थी संकट की स्थिति में खुद को और दूसरों को सुरक्षित रखने का तरीका जानता है, तो यह ज्ञान उसके पूरे जीवन में काम आ सकता है।

डॉ. चौहान के कार्यों के लिए विभिन्न सम्मानों का उल्लेख भी मिलता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उन्हें हरियाणा के राज्यपाल द्वारा तीन बार LM अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। उन्हें प्राइम मिनिस्टर शील्ड अवॉर्ड भी प्राप्त हुआ है।

शिक्षा के क्षेत्र में उन्हें ग्लोबल एक्सीलेंस टीचर अवॉर्ड से सम्मानित किए जाने की जानकारी है। कोरोना महामारी के दौरान उनके कार्यों के लिए कोरोना योद्धा अवॉर्ड भी मिलने का उल्लेख किया गया है।

इसके अलावा डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम लाइफ अचीवमेंट अवॉर्ड और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन शिक्षा सम्मान से भी उन्हें सम्मानित किए जाने की जानकारी दी गई है। राष्ट्रीय शिक्षा समिति (रजि०) एवं राष्ट्रीय सनातन सेना भारत संस्था ने 20 सितम्बर 2026 को उनके आपदा प्रबंधन के योगदान के लिए राष्ट्र गुरु विभूषण से पुरस्कृत किया।

सम्मानों की यह सूची लंबी है, लेकिन किसी भी सामाजिक कार्य की वास्तविक कसौटी केवल सम्मान नहीं, बल्कि उसका समाज पर पड़ने वाला प्रभाव होता है।

आपदा प्रबंधन को जनआंदोलन बनाने की जरूरत है। आज जब शहरों का विस्तार तेजी से हो रहा है, आबादी बढ़ रही है और तकनीक पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, तब आपदा प्रबंधन की आवश्यकता भी बढ़ रही है।

आपदा प्रबंधन को केवल सरकारी विभागों का विषय न मानकर सामुदायिक जिम्मेदारी बनाना होगा। स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, उद्योग, रेलवे, पुलिस, स्वयंसेवी संस्थाएँ और आम नागरिक—सभी को इस व्यवस्था का हिस्सा बनना होगा।

आपदा को हमेशा टाला नहीं जा सकता। भूकंप को रोका नहीं जा सकता, चक्रवात को समाप्त नहीं किया जा सकता और हर दुर्घटना की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। लेकिन तैयारी की जा सकती है।

लोगों को प्रशिक्षित किया जा सकता है। बच्चों को जागरूक किया जा सकता है। संस्थानों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जा सकती है। स्वयंसेवकों को तैयार किया जा सकता है। प्राथमिक उपचार की जानकारी दी जा सकती है और संकट के समय सही निर्णय लेने का अभ्यास कराया जा सकता है।

डॉ. विक्रम सिंह चौहान की गतिविधियाँ इसी व्यापक विचार से जुड़ी दिखाई देती हैं—आपदा के समय मदद के लिए केवल किसी और का इंतजार न किया जाए, बल्कि समाज का हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार मदद करने के लिए तैयार हो, क्योंकि जब संकट आता है, तब कुछ मिनटों का प्रशिक्षण वर्षों की शिक्षा से भी अधिक उपयोगी साबित हो सकता है और शायद आपदा प्रबंधन की सबसे बड़ी सीख भी यही है– आपदा आने का इंतजार मत कीजिए, उससे पहले तैयार हो जाइए।

 

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