मक़बूल फ़िदा हुसैन: फुटपाथ से शुरुआत और दुनिया के प्रतिष्ठित कला मंचों तक पहुँचने वाला चित्रकार

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मक़बूल फ़िदा हुसैन: फुटपाथ से शुरुआत और दुनिया के प्रतिष्ठित कला मंचों तक पहुँचने वाला चित्रकार

कभी आपने सोचा है कि एक ऐसा कलाकार कैसा होगा, जिसने अपनी शुरुआत फुटपाथ से की और दुनिया के प्रतिष्ठित कला मंचों तक पहुँचा?

मक़बूल फ़िदा हुसैन की कहानी केवल एक चित्रकार की कहानी नहीं है। यह आधुनिक भारतीय कला, सिनेमा, संस्कृति, पहचान और अभिव्यक्ति के बदलते रिश्तों की कहानी भी है। 17 सितंबर 1915 को महाराष्ट्र के पंढरपुर में जन्मे हुसैन ने अपने जीवन में लगभग एक सदी को बेहद करीब से देखा। उन्होंने भारत को बदलते हुए देखा। उन्होंने विभाजन देखा। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद की नई भारतीय चेतना को देखा। साथ ही, उन्होंने कला की सीमाओं को लगातार चुनौती दी।

उनका नाम भारतीय आधुनिक कला के इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्हें अक्सर भारत का Picasso कहा गया। हालांकि, हुसैन की अपनी कला भाषा भारतीय अनुभवों से गहराई से जुड़ी थी। उनके घोड़े, स्त्री आकृतियाँ, लोक जीवन, महाकाव्य, गांधी, मदर टेरेसा और भारतीय शहरों के दृश्य उनके कैनवास पर अलग-अलग रूपों में दिखाई देते रहे।
लेकिन उनकी कहानी का सबसे जटिल अध्याय उनकी प्रसिद्धि नहीं था।
वह अध्याय था विवाद।

और उससे भी बड़ा सवाल था, एक कलाकार को अपनी कला के कारण अपना देश क्यों छोड़ना पड़ा?

फुटपाथ से शुरू हुई वह यात्रा, जिसने भारतीय कला बदल दी

हुसैन की शुरुआती जिंदगी किसी स्थापित कलाकार जैसी नहीं थी। उनके पास कोई बड़ा स्टूडियो नहीं था। कोई प्रभावशाली कला परिवार नहीं था। उनके पास सबसे महत्वपूर्ण चीज थी, चित्र बनाने की बेचैनी।

युवा हुसैन मुंबई पहुँचे। उस समय शहर तेजी से बदल रहा था और भारतीय सिनेमा भी अपना विस्तार कर रहा था। फिल्मों के बड़े-बड़े पोस्टर और होर्डिंग बनाने का काम उनके लिए रोजगार का माध्यम बना।

यही वह दौर था, जब उनके हाथों ने विशाल पोस्टरों पर चेहरे और आकृतियाँ बनानी शुरू कीं। दिन में काम और रात में कला के साथ प्रयोग उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गए। आर्थिक संघर्ष के बावजूद उन्होंने अपने भीतर के कलाकार को खत्म नहीं होने दिया।

उन्होंने खिलौने और फर्नीचर डिजाइन करने का काम भी किया। गुजरात की यात्राओं के दौरान वे प्राकृतिक दृश्यों को चित्रित करते रहे। इस तरह धीरे-धीरे उनका अनुभव बढ़ता गया और उनकी शैली विकसित होती गई।

कहा जाता है कि शुरुआती दौर में उनकी एक पेंटिंग केवल दस रुपये में बिकी थी।
कुछ दशक बाद यही कलाकार भारत के सबसे चर्चित और महंगे कलाकारों में शामिल होने वाला था।

फिर आया 1947, और भारतीय कला ने भी करवट ली

1947 केवल भारत के राजनीतिक इतिहास में बदलाव का वर्ष नहीं था। कला की दुनिया में भी यह एक निर्णायक समय था।

विभाजन ने कलाकारों और बुद्धिजीवियों की सोच को गहराई से प्रभावित किया। हिंसा, विस्थापन और टूटती सामाजिक संरचना के बीच कलाकारों की एक नई पीढ़ी सामने आई।
मुंबई में Progressive Artists’ Group का गठन इसी वातावरण में हुआ। हुसैन इसके प्रमुख सदस्यों में शामिल थे।

इस समूह का उद्देश्य भारतीय कला को पुराने स्थापित ढाँचों से आगे ले जाना था। कलाकार भारतीय विषयों को आधुनिक अंतरराष्ट्रीय कला तकनीकों के साथ देखने की कोशिश कर रहे थे।
हुसैन ने भी यही रास्ता चुना।

उनकी कला में भारतीय परंपरा और आधुनिकता साथ दिखाई देने लगी। उन्होंने धार्मिक कथाओं, लोक जीवन और भारतीय प्रतीकों को आधुनिक शैली में प्रस्तुत किया।

उनकी कला में कोई एक दुनिया नहीं थी।
वहाँ गाँव भी था।
शहर भी था।

सिनेमा भी था।
महाकाव्य भी थे।
और आम भारतीय जीवन भी था।

घोड़े आखिर हुसैन की पहचान क्यों बन गए?

अगर हुसैन का नाम लिया जाए, तो घोड़ों की छवि शायद सबसे पहले याद आती है।
उनके घोड़े केवल जानवरों के चित्र नहीं थे। वे गति, ऊर्जा, शक्ति और बेचैनी के प्रतीक जैसे दिखाई देते थे। तेज रेखाएँ और मजबूत आकृतियाँ उनके चित्रों को एक अलग पहचान देती थीं।
लेकिन हुसैन की कला को केवल घोड़ों तक सीमित करना उनके विशाल रचनात्मक संसार को छोटा कर देना होगा।

उन्होंने मदर टेरेसा पर चित्रों की श्रृंखला बनाई। गांधी उनके कार्यों में दिखाई दिए। रामायण और महाभारत जैसे भारतीय महाकाव्यों ने भी उन्हें प्रेरित किया। ब्रिटिश राज और भारतीय सामाजिक जीवन उनके कैनवास का हिस्सा बने।

वे चित्रकार होने के साथ-साथ कहानीकार भी थे।

उनका कैनवास अक्सर शब्दों के बिना कहानी कहता था।

जब चित्रकला और सिनेमा एक-दूसरे से मिले

हुसैन की रचनात्मकता केवल कैनवास तक सीमित नहीं रही।
1967 में उन्होंने Through the Eyes of a Painter नाम की फिल्म बनाई। यह एक लघु फिल्म थी, जिसमें चित्रकार की दृष्टि से दुनिया को देखने की कोशिश की गई।
फिल्म को बर्लिन अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में Golden Bear मिला। इसके साथ ही हुसैन ने साबित किया कि उनका प्रयोग केवल चित्रकला तक सीमित नहीं था।

बाद के वर्षों में उन्होंने सिनेमा में भी काम किया।

Gaja Gamini में माधुरी दीक्षित उनके रचनात्मक संसार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं। इसके बाद Meenaxi: A Tale of Three Cities आई।
हुसैन के लिए सिनेमा भी एक तरह का कैनवास था।
रंग, संगीत, नृत्य, स्त्री, शहर और स्मृति उनके फिल्मी संसार में भी दिखाई देते रहे।
लेकिन Meenaxi के साथ एक ऐसा विवाद सामने आया, जिसने यह दिखाया कि धार्मिक संवेदनशीलता का प्रश्न केवल चित्रकला तक सीमित नहीं था।

फिर वह समय आया, जब उनकी कला सवालों के घेरे में आ गई

हुसैन की कुछ पेंटिंग्स को लेकर 1990 के दशक में गंभीर विरोध शुरू हुआ।

विशेष रूप से हिंदू देवी-देवताओं के नग्न चित्रण को लेकर कई संगठनों और लोगों ने आपत्ति जताई। इन चित्रों को लेकर उनके खिलाफ शिकायतें और कानूनी मामले दर्ज हुए।
यहाँ कहानी केवल एक कलाकार और उसके चित्र के बीच नहीं रह गई थी।
इसके साथ धार्मिक भावनाएँ, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून जैसे प्रश्न जुड़ गए।
1998 में उनके घर पर हमला हुआ और उनकी कुछ कलाकृतियाँ क्षतिग्रस्त की गईं। विरोध प्रदर्शनों के कारण कुछ प्रदर्शनियाँ भी प्रभावित हुईं।
बाद में कई कानूनी मामलों में अदालतों ने अलग-अलग स्तरों पर विचार किया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2004 में कुछ शिकायतों को खारिज भी किया।
फिर भी विवाद समाप्त नहीं हुआ।
इसके बजाय वह लगातार बढ़ता गया।
एक पेंटिंग ने पूरे देश की बहस को और तेज कर दिया
2006 के आसपास विवाद एक नए स्तर पर पहुँचा।
उनकी भारत माता से संबंधित एक पेंटिंग को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। पेंटिंग में भारत के मानचित्र को एक नग्न महिला आकृति के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
इस चित्र को लेकर विरोध हुआ और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग उठी।
हुसैन ने इस पेंटिंग को लेकर माफी मांगी और इसे नीलामी से हटाने का आश्वासन दिया। बाद में यह पेंटिंग फिर चर्चा में आई और इसकी बिक्री भी हुई।
इसी दौर में उनके खिलाफ कई मामले लंबित थे।
हुसैन के समर्थकों का तर्क था कि कला को उसके संदर्भ और कलात्मक भाषा में देखा जाना चाहिए। विरोध करने वालों का कहना था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धार्मिक भावनाओं की सीमा से पूरी तरह अलग नहीं हो सकती।
यही बहस आज भी भारतीय लोकतंत्र के सामने एक कठिन प्रश्न रखती है।
कलाकार की स्वतंत्रता कहाँ तक है?
और दर्शक की धार्मिक संवेदनशीलता कहाँ से शुरू होती है?

2006: जब कलाकार ने भारत से बाहर रहना चुना

विरोध और कानूनी मामलों के बीच हुसैन ने 2006 में भारत से बाहर रहना शुरू किया।
उन्होंने लंदन और दोहा में समय बिताया। उनके लिए यह केवल भौगोलिक दूरी नहीं थी। जिस देश को उन्होंने अपनी कला का सबसे बड़ा विषय बनाया था, उसी देश से दूर रहना उनके जीवन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक बन गया।
हुसैन ने कई बार भारत लौटने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन कानूनी मामलों और अपनी सुरक्षा को लेकर चिंताओं के कारण वे वापस नहीं आए।

2010 में उन्होंने कतर की नागरिकता स्वीकार की और भारतीय पासपोर्ट छोड़ दिया। फिर भी भारत उनके काम और स्मृतियों में लगातार मौजूद रहा।

उन्होंने विदेश में रहते हुए भी भारतीय इतिहास और सभ्यता पर काम जारी रखा।
यानी देश से दूरी ने उनके भीतर से भारत को दूर नहीं किया।

सम्मान भी मिला और विरोध भी

हुसैन के जीवन में विरोध के साथ-साथ असाधारण सम्मान भी रहा।

भारत सरकार ने उन्हें 1966 में Padma Shri दिया। 1973 में Padma Bhushan मिला। 1991 में उन्हें Padma Vibhushan से सम्मानित किया गया।

उनकी कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। वे São Paulo Biennial में Pablo Picasso के साथ विशेष आमंत्रित कलाकार रहे।

1986 में  राज्यसभा के लिए नामित

उनकी फिल्मों और चित्रों को भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मान मिला।
लेकिन उनकी उपलब्धियों की सूची जितनी लंबी थी, विवादों की सूची भी उतनी ही जटिल होती गई।
यही विरोधाभास शायद हुसैन की कहानी को इतना महत्वपूर्ण बनाता है।
एक कलाकार की सबसे बड़ी पहचान क्या होती है?
हुसैन ने अपने जीवन में हजारों चित्र बनाए।

उनकी कला में भारत के अनेक चेहरे दिखाई दिए। धार्मिक प्रतीक भी आए। सामाजिक जीवन भी आया। स्त्री की अलग-अलग छवियाँ आईं। इतिहास आया। सिनेमा आया। संगीत आया।
उन्होंने लगभग हर उस चीज को चित्रित करने की कोशिश की, जो उन्हें भारतीय जीवन का हिस्सा लगती थी।

उनका मानना था कि वे भारत की हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति का हिस्सा हैं।

इसीलिए उनके जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जिस संस्कृति से उन्होंने प्रेरणा ली, उसी संस्कृति के कुछ हिस्सों से उनके चित्रों को लेकर तीखा विरोध भी हुआ।
यह विरोध केवल हुसैन की कहानी नहीं है।

यह आधुनिक भारत में कला और समाज के बदलते रिश्ते की कहानी भी है।
9 जून 2011: लंदन में थम गई वह रेखा
9 जून 2011 को लंदन में हुसैन का निधन हुआ।
उनकी उम्र 95 वर्ष थी।

जिस कलाकार ने जीवन का बड़ा हिस्सा भारत की सड़कों, शहरों, लोगों और सांस्कृतिक प्रतीकों को चित्रित करने में बिताया था, उसकी अंतिम यात्रा भारत से दूर हुई।
उन्हें इंग्लैंड के Brookwood Cemetery में दफनाया गया।

उनकी मृत्यु के बाद भी उनके बारे में बहस खत्म नहीं हुई।

किसी ने उन्हें महान आधुनिक भारतीय कलाकार कहा। किसी ने उनके कुछ चित्रों की आलोचना की। कुछ लोगों ने उनके साथ हुए व्यवहार पर सवाल उठाए।
इसलिए हुसैन की विरासत एक सरल निष्कर्ष में समेटना आसान नहीं है।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती

हुसैन की मृत्यु के वर्षों बाद भी उनकी कला को लेकर रुचि बनी रही।

2015 में उनकी जन्म शताब्दी पर Google ने उन्हें Doodle के माध्यम से याद किया।
उनकी कला अंतरराष्ट्रीय संग्रहों और नीलामियों में चर्चा का विषय बनी रही। 2020 में उनकी पेंटिंग Voices लगभग 2.5 मिलियन डॉलर में नीलाम हुई।
2025 में दोहा के Education City में M. F. Husain को समर्पित Lawh Wa Qalam Museum खोला गया। इस संग्रहालय की वास्तुकला में हुसैन के बनाए स्केच से प्रेरणा ली गई।
एक कलाकार, जिसने कभी मुंबई की सड़कों पर पोस्टर बनाए थे, उसकी कला के लिए विदेश में संग्रहालय का बनना इतिहास का एक असाधारण मोड़ है।
आखिर हुसैन की कहानी हमें क्या सोचने पर मजबूर करती है?
म. फ़. हुसैन की कहानी को केवल महानता या विवाद के दो हिस्सों में बाँटना शायद पर्याप्त नहीं होगा।

यह एक ऐसे कलाकार की कहानी है, जिसने भारतीय आधुनिक कला को अपनी अलग भाषा दी। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसने सिनेमा से लेकर महाकाव्यों तक को अपनी कल्पना में जगह दी।

साथ ही, यह कहानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच मौजूद कठिन सवालों को भी सामने लाती है।

एक लोकतांत्रिक समाज में कला असहमति पैदा कर सकती है।

दर्शक कलाकार से असहमत हो सकता है।

कलाकार समाज के स्थापित विचारों को चुनौती दे सकता है।
लेकिन जब असहमति धमकी, हिंसा या कानूनी संघर्ष का रूप लेती है, तब सवाल केवल कला का नहीं रहता।

तब सवाल समाज की सहनशीलता का भी बन जाता है।

और शायद यही वजह है कि 15 वर्ष बाद भी हुसैन की कहानी हमें पीछे मुड़कर देखने के लिए मजबूर करती है।

फुटपाथ पर पोस्टर बनाने वाला वह नंगे पाँव कलाकार आखिरकार दुनिया के बड़े कला मंचों तक पहुँचा।

लेकिन उसकी सबसे बड़ी कहानी शायद उसके बनाए चित्रों में नहीं, बल्कि उस सवाल में छिपी है जो उसकी जिंदगी हमारे सामने छोड़ गई—

क्या लोकतंत्र में कला को केवल पसंद आने की आजादी है, या असहज करने की भी?

ओल्ड इज गोल्ड फिल्म्स के फेसबुक वॉल से साभार

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