फ़ासिज़्म ,कम्युनिज्म और बंगाल में हिंसा
जगदीश्वर चतुर्वेदी
मैं जानता हूँ कि मैं स्वयं कम्युनिस्ट नहीं हूँ,बंगाल में माकपा के लोगों ने मुझे बहुत दुख दिए ,मेरी निजी तौर पर बड़ी क्षति की।अहर्निश कीचड़ उछालने की कोशिश की।अफसोस की बात है कि यह अकेले मेरे साथ ही नहीं हुआ हजारों लोगों के साथ उन्होंने अनेक अमानवीय काम किए हैं, इसके बावजूद मेरे सबसे अच्छे मित्र कम्युनिस्ट ही हैं।बंगाल में कम्युनिस्टों के अमानवीय-अलोकतांत्रिक आचरण के लिए बंगाल की जनता ने उनको लोकतांत्रिक दण्ड दिया। जनता उनका साथ छोड़ गई।
भारत के कम्युनिस्टों का चरित्र बाकी देशों के कम्युनिस्टों से भिन्न है,वे यहां लोकतंत्र में बड़े हुए हैं,लोकतांत्रिक संस्कार ,लोकतांत्रिक आचार-व्यवहार और लोकतांत्रिक मूल्य सीख रहे हैं,उनकी सीखने की गति थोड़ी धीमी है,लेकिन वे बुनियादी तौर पर लोकतांत्रिक हैं और लोकतंत्र में आस्था रखते हैं।
कम्युनिस्ट इसी समाज से आते हैं जिसमें अंधविश्वास है,पुनर्जन्म की धारणा है,गीता है,उपनिषद है, रामायण है,शाहरूख खान है,सलमान खान है,सत्यजीत राय है,ऋत्विक घटक हैं,प्रेमचंद हैं,वल्लतोल हैं,रवीन्द्रनाथ हैं,वे इन सबसे गुजरते हैं।कम्युनिस्ट होने का मतलब जैसा है वैसा बने रहना नहीं है।जबकि बाकी दलों में यह सुविधा है आप जैसे हैं सारी जिन्दगी वैसे ही बने रहते हैं।आपके नजरिए में मूलगामी परिवर्तन नहीं होता।
मार्क्सवाद और कम्युनिस्टों के संसर्ग में आने के बाद अनेक लोग हैं जो बदल जाते हैं,जैसे मैं बदला,मैं एकदम परंपरागत था, पंडितों की तरह सोचता था,मेरी तरह हजारों लोगों के जीवन और नजरिए को मार्क्सवाद और कम्युनिस्टों ने बदला है,उसी तरह यह भी सच है कि कम्युनिस्टों में भी ऐसे लोग हैं ,बल्कि इन दिनों ज्यादा हैं जो वर्षों से कम्युनिस्ट पार्टी में हैं लेकिन वे एकदम नहीं बदले,जैसे आए थे आज भी वैसे ही बने हुए हैं।वे वफादार के रूप में आए थे आज भी वफादार बने हुए हैं, मार्क्सवादी नहीं बन पाए हैं।यही सबसे बड़ी चुनौती भी है। वफादार कम्युनिस्ट में अंध आस्था होती है।वह दवाब पड़ने पर आस्था बदलकर अन्य दल की ओर जा सकता है और हकीकत में बंगाल और त्रिपुरा में माकपा के साथ यही हुआ, वफादार लोग माकपा का साथ छोड़ गए और इन दिनों भाजपा के साथ हैं।कहने का आशय यह कि कम्युनिस्ट और वफादार कम्युनिस्ट में अंतर करो।
आप पूछ ही सकते हैं कि कम्युनिस्टों ने क्या किया ,मैं कहूँगा इस देश को सामाजिक परिवर्तन का नया नजरिया दिया,लाखों युवाओं को नए सामाजिक नजरिए से लैस किया। करोड़ों बेहतरीन नागरिक तैयार करके दिए।
कम्युनिस्ट आज संविधान की रक्षा के मामले में सबसे आगे की कतारों में हैं। कम्युनिस्टों के संघर्षों ने लोकतांत्रिक हकों के विस्तार को नई बुलंदियों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।
ईमानदार और सादगीपूर्ण प्रशासन निर्मित करने में वे बेजोड़ रहे हैं।राजनेताओं को जनता से जुड़कर,जनता के संघर्षों में से निकलकर सत्ता के करीब जाकर जनता के संघर्षों की रक्षा करनी चाहिए,इसकी मिसालें कायम की हैं।राजनीति में कथनी-करनी के भेद को खत्म किया है।
कम्युनिस्ट घोषणापत्र का पहला पैराग्राफ बहुत ही महत्वपूर्ण है और आज भी प्रासंगिक है, लिखा है, “यूरोप को एक भूत आतंकित कर रहा है-कम्युनिज्म का भूत।इस भूत को भगाने के लिए पोप और ज़ार,मेटर्निख़ और गीजो, फ्रांसीसी उग्रवादी और जर्मन खुफ़िया पुलिस- बूढ़े यूरोप की सभी शक्तियों ने पुनीत गठबंधन बना लिया है।”
वर्गीय समाज में विचार और सामाजिक परिवर्तन की जंग लड़ने में मार्क्सवाद को जंग का हथियार बनाने की बजाय दिल जीतने का विज्ञान बनाने की जरूरत है।
मार्क्सवाद कोई किताबी ज्ञान नहीं है।यह व्यवहार सिद्ध विज्ञान है। मार्क्सवादी वह है जिसके पास सब समय विकल्प रहते हैं। मार्क्सवादी वह नहीं है जिसके पास सीमित विकल्प होते हैं या एक ही विकल्प के रूप में मार्क्सवाद होता। वे तमाम विकल्प खोजे जाने चाहिए जो शोषणमुक्त समाज का सपना साकार करने में मदद करें।इस सपने को विकल्पों की हर समय उपलब्धता के आधार पर ही हासिल कर सकते हैं।मसलन् मुझे अभी दिल्ली जाना है लेकिन ट्रेन नहीं है ,ऐसी स्थिति में जो भी उपलब्ध विकल्प मेरी क्षमता से संभव हो सकता है उसका मुझे इस्तेमाल करना चाहिए। मार्क्सवाद किस तरह का होगा यह निर्भर करता है कि उत्पादक शक्तियों की किस तरह की चेतना और सामाजिक-कौशलगत क्षमता है और मार्क्सवादी सामयिक सामाजिक चेतना से कितने सम्पन्न हैं।
यदि बुर्जुआजी के भक्तों की मानें तो मार्क्सवाद का अंत हो गया है और देश-दुनिया में कोई मार्क्सवादी नहीं बचा है।सवाल यह है कि तो फिर मार्क्सवाद से इतना भय क्यों है ? असल में मार्क्सवादी हैं इसीलिए वे भयभीत भी हैं।
हर वह व्यक्ति मार्क्सवादी है जो व्यक्ति के द्वारा व्यक्ति के शोषण को खत्म करना चाहता है। शोषणमुक्त समाज का सपना वे लोग भी देखते हैं जिन्होंने कभी मार्क्स का नाम तक नहीं सुना है। शोषणमुक्त समाज का सपना वे लोग भी देखते हैं जो मार्क्सवाद को जानते,मानते और अपनाते हैं। मार्क्सवादी का मतलब संयासी नहीं है।
एक मार्क्सवादी का दिल बड़ा होता है,जो बड़ा दिल नहीं कर पाते वे कठमुल्ले रह जाते हैं। मार्क्सवादी के लिए कोई व्यक्ति अछूत नहीं है और मनुष्य की बनाई कोई भी वस्तु,मूल्यवान विचार,प्रासंगिक आचार-व्यवहार और आदतें अछूत नहीं हैं।
वे मनुष्यमात्र का सम्मान ही नहीं करते उसको अधिकारसंपन्न भी देखना चाहते हैं। समाज में ऐसे लोग हैं जो मनुष्य का सम्मान करते हैं लेकिन उसे अधिकारहीन रखना चाहते हैं।मार्क्सवादी की बुनियादी चिन्ता है मनुष्य को अधिकार संपन्न बनाने की।
मार्क्स इसलिए महान बने क्योंकि वे समाज का मर्म पहचानने में सफल रहे।
कांग्रेस और कम्युनिस्टों के बीच हिंसा और प्रेम का संबंध रहा है।नेहरु के शासन में तेलंगाना में सैंकड़ों कॉमरेड मारे गए,हजारों पर वर्षों मुकदमे चले,1962 में अनेक बड़े नेताओं को नेहरू सरकार ने जेलों में डाल दिया,वहीं आपातकाल में भाकपा ने कांग्रेस का समर्थन किया,कईराज्यों में भाकपा ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा,यही स्थिति 1972-77 के बीच बंगाल की रही है,उस समय सिद्धार्थ शंकर राय के शासन में माकपा के सैंकड़ों कॉमरेड मारे गए,हजारों को पलायन करके बंगाल छोड़ना पड़ा,बाद में 34साल के वामशासन में तकरीबन 65हजार राजनीतिक हत्याएं हुईं,इनमें कांग्रेस -माकपा दोनों के लोग मारे गए,ये कुछ आंकड़े हैं हिंसाचार के। इस सबके बावजूद कम्युनिस्टों ने कभी कांग्रेस के साथ घृणा का रिश्ता नहीं बनाया,जब भी कांग्रेस के नेताओं ने गंभीर समस्याओं पर मदद मांगी, कम्युनिस्टों ने मदद दी।जबकि कायदे से माकपा को हिंसा से बचना चाहिए,लेकिन वे बंगाल में जब तक शासन में रहे राजनीतिक हिंसा बंद नहीं कर पाए। अपराधियों पर अंकुश नहीं लगा पाए।
आयरनी देखिए बंगाल में कांग्रेस के हाथों सबसे ज्यादा कम्युनिस्टों की हत्याएं हुईं, उसी बंगाल में सन् 2016एवं 2021 के विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट-कांग्रेस मिलकर लड़े।कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए -1 के गठबंधन को कम्युनिस्टों ने समर्थन दिया।
कांग्रेस-कम्युनिस्ट संबंधों की दूसरी आयरनी यह है कि कम्युनिस्टों को उदारतावाद नापसंद है, कांग्रेस को मार्क्सवाद नापसंद है,फिर भी दोनों में मित्रता है। इस मित्रता को राजनीतिक कार्यक्रम पर आधारित होना चाहिए। इसका बुनियादी लक्ष्य फासिस्ट विरोधी ताकतों को एकजुट करना होना चाहिए। मोदी शासन को : सामान्य रूप में नहीं लेना चाहिए।यह रूटीन शासन नहीं है। बल्कि फासिस्ट शासन है।
पश्चिम बंगाल में विगत पचास सालों में राजनीतिक हिंसा की हजारों घटनाएं हुई हैं। ममता सरकार का 2011में जन्म हिंसा के प्रतिवाद में हुआ लेकिन ममता को हिंसा रोकने में सफलता नहीं मिली,उलटे वामदलों खासकर माकपा पर टीएमसी के गुंडों ने असंख्य हमले किए ।2016में भी चुनाव के पहले और बाद में असंख्य हमले हुए हैं।वाम पर हमले ऐसे समय में हुए जब टीएमसी को अपार बहुमत मिला था।टीएमसी वाले जीत के बाद भी उदार बनने को तैयार नहीं हुए।और लगातार हमले करते रहे ।वहीं दूसरी ओर भाजपा ने स्थानीय और बाहरी अपराधी तत्वों और गुंडों के बल पर ममता से निबटने का फैसला लिया, इसके कारण हिंसा में गुणात्मक तौर पर इजाफा हुआ है। सन् 2026में भाजपा की बंगाल में जीत फ़ासिज़्म की जीत है।
सच यह है हिंसा का समाधान हिंसा नहीं है।2021में टीएमसी जीती,यह जीत मूलत: संघी फ़ासिज़्म की पराजय की अभिव्यक्ति है।इस जीत के बाद भी हिंसा थमी नहीं । 2026की भाजपा जीत के बाद भी हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही।
सवाल उठता है इस हिंसा की जड़ कहां है ॽ हिंसा वे लोग करते हैं जिनका जनता पर विश्वास नहीं होता।वे जनता के दिलो-दिमाग पर हिंसा के जरिए कब्जा या वर्चस्व रखना चाहते हैं।जिस दल का जनता में असर होगा वह हिंसा का सहारा नहीं लेगा लेकिन जो दल हिंसा का सहारा लेता है वह सतह पर कहता है कि आत्मरक्षा के लिए हिंसा कर रहा है या बदले की भावना से कर रहा है।
हिंसा का असल मकसद है वर्चस्व स्थापित करना।वर्चस्व स्थापित करने वाली मनोदशा राजनीतिक कमजोरी से पैदा होती है। हिंसा जिस इलाके में होती है वहां पर वह तो असर छोड़ती ही है,इसके अलावा उन इलाकों में भी असर छोड़ती है जो दूर पड़ते हैं।लेकिन हिंसा हमेशा एक वृत्त में केन्द्रित रहती है।मसलन्,केरल के जिस जिले में माकपा-आरएसएस के बीच हिंसा हो रही है वह अधिक से अधिक केरल तक या संबंधित जिले तक सीमित रहेगी,उसके बाहर नहीं जाएगी।इस अर्थ में हिंसा स्थानीय और प्रांतीय होती है।
बंगाल की मौजूदा हिंसा की जड़ें राजनीतिक असहिष्णुता में छिपी हैं।यह बड़ी बीमारी है इसके माकपा, टीएमसी, भाजपा आदि शिकार हैं,फिलहाल सभी राजनीतिकदलों में असहिष्णुता चरम पर है।कोई असहिष्णुता छोड़ने को तैयार नहीं है।मौजूदा हिंसा को पहल करके रोकने के लिए कोई दल तैयार नहीं है,उलटे गरम-गरम बयान आ रहे हैं या फिर उपेक्षा करके चुपचाप हिंसा देख रहे हैं।यह मनोदशा अ-लोकतांत्रिक और हिंसक है।हिंसा का जवाब हिंसा नहीं है,हिंसा का जबाव पुलिस भी नहीं है।हिंसा का जवाब है शांति और वह संवाद-सहयोग के बिना स्थापित नहीं हो सकती।लोकतंत्र के ये दोनों महत्वपूर्ण तत्व हैं।जो दल लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए कल तक वोट मांग रहा था वही दल आज मुँह फुलाए,गुस्से में ऑफिस में बैठा है या हिंसा में मशगूल है।
हिंसा को हिंसा या घृणा या निंदा से खत्म नहीं कर सकते। हिंसा को खत्म करने के लिए शांति,सहयोग और संवाद की जरूरत है। कम्युनिस्टों को यदि जनप्रियता हासिल करनी है तो शांति और लोकतांत्रिक हकों की लडाई के पक्षधर के रुप में नया कार्यक्रम बनाना होगा। इस कार्यक्रम का मूलाधार लोकतंत्र ,शांति और न्याय को बनाना होगा। पुरानी अदावतों और पार्टीजानशिप के दलदल से बाहर निकलकर संपर्क, संबंध और संघर्ष की प्राथमिकताएं तय करनी होंगी।
संकट गहरा है,यह कहना अब बेकार है,क्योंकि हम सब संकट में घिर चुके हैं।कातिल कितने ताकतवर हैं यह कहना अर्थहीन है क्योंकि हम सब असहाय साबित किए जा चुके हैं। जब किसी निर्दोष व्यक्ति को भीड़ पीट रही हो और लोग तमाशा देख रहे हों तो समझो चीजें हम नहीं वे तय कर रहे हैं।ये ´वे´कौन हैं ॽ बताने की जरूरत नहीं,ये ´वे´तो ´हम ´में से ही हैं।´हम´को ´वे´में तब्दील करने की कला का नाम ही तो फासिज्म है। उसकी कारीगरी बेहद जटिल होती है।
फासिस्ट विचार एकदिन ,दो दिन ,एक साल या तीन साल में पैदा नहीं होता,बल्कि फासिस्ट विचार लंबा समय लेता है पूरी तरह पकने में।भारत में फासिस्ट विचारों की फसल एक ही दिन में पैदा नहीं हुई है, इस फसल को किसी एक संगठन या विचार विशेष ने तैयार नहीं किया है,बल्कि फासिस्ट विचार को अनेक संगठनों और हजारों लोगों ने मिलकर रचा है। यह किसी एक के दिमाग की खुराफात नहीं है,यह खामखयाली भी नहीं है।
फासिस्ट विचारों का हमारे देश में पहले से भौतिक और वैचारिक आधार मौजूद है, नए फासिस्टों ने सिर्फ इतना किया है कि उस आधार को पाला-पोसा और बड़ा किया है।फासिज्म आज हर व्यक्ति के अंदर जगा दिया गया है। फासिज्म को उन पुरानी सड़ी-गली मान्यताओं और धारणाओं से मदद मिल रही है जिनके बारे में हम यह मानकर चल रहे थे कि वे मान्यताएं तो पुरानी हैं,मर चुकी हैं।लेकिन हकीकत में सड़ी गली मान्यताएं मरती नहीं हैं। भारत में तो एकदम नहीं मरतीं,पुरानी सड़ी गली मान्यताओं को बचाकर रखना,उनमें जीना और उनकी पूजा करना भारत की विशेषता है और यही वह जगह है जहां से फासिस्ट लोग अपने लिए ईंधन और समर्थन जुटाते हैं।
´गऊ हमारी माता है ´ उसी तरह का पुराना विचार है,जिसे हम मान चुके थे कि वह मर गया,लेकिन वह इतना ताकतवर होकर चला आएगा हमने कभी सोचा नहीं था। मन में विचार करें कि पुराने सड़े गले विचार के निशाने पर कौन लोग हैं, किस आय़ुवर्ग के लोग हत्याएं कर रहे हैं ॽ पुराने सड़े गले विचारों से चिपके हुए समाज में फासिज्म आसानी से पैदा होता है,तय मानो पीएम लाख चिल्लाएं, मेरे जैसे लोग लाखों-करोड़ों शब्द खर्च कर दें पुराने सड़े गले विचारों को हम सब मिलकर पछाड़ नहीं सकते।वे महाबलि हैं। आरएसएस और उसके संगठनों ने लाखों युवाओं को पुराने ,सड़े-गले विचारों का वाहक बना दिया है।
पुराने सड़े-गले विचारों को समूल नष्ट करने की भावना हम जब तक अपने मन में नहीं लाते हम आधुनिक मनुष्य नहीं बना सकते।हमने अजीब सा घालमेल किया हुआ है।कपड़े बदल लिए हैं,शिक्षा बदल ली है।व्यवस्था बदल दी है।कम्युनिकेशन के उपकरण बदल दिए हैं,लेकिन विचारों के दुनिया में नए विचारों के प्रवेश को रोक दिया है,विचारों की दुनिया वही सड़े –गले विचारों से लबालब भरी है।
फ्रेडरिक एंगेल्स ने लिखा है जब कोई विचार एकबार जन्म ले लेता है और व्यवहार में आजाता है तो फिर आसानी से वो नष्ट नहीं होता बल्कि एक अवधि के बाद वो भौतिक शक्ति बन जाता है।उसे आप व्यवस्था बदलने के बाद भी हटा नहीं सकते जब तक आप इसके विकल्प को लोगों के मन में न उतार दें। ´गऊ माता है´ आदि किस्म के विचारों को हम आज तक लोगों के मन से नहीं निकाल पाए,हम कितने असफल हैं,हमारा सिस्टम कितना अक्षम है,हमारी शिक्षा कितनी अधूरी है,यह इस बात का सबूत है।पुराने सड़े-गले विचारों को मन में जब तक बनाए रखोगे फासिस्ट हमले होते रहेंगे,जुनैद-अखलाक जैसे लोग कत्ल होते रहेंगे। बार बार मोदी जीतता रहेगा।
फासिज्म महज कोई एक संगठन विशेष नहीं है,बल्कि वह एक विचारधारा है। मानव इतिहास की सबसे बर्बर विचारधारा है। इसे हमने विदेशों से नहीं मंगाया है बल्कि यह हमें विरासत में मिली है,हमारे संस्कारों में इसकी गहरी जड़ें हैं,अविवेकवाद और पितृसत्तात्म इसकी बुनियाद है। अविवेकवाद और पुंसवाद को त्याग दो फासिज्म मर जाएगा।अविवेकवाद को जब तक गले लगाए रखोगे फासिज्म आपसे चिपटा रहेगा और जुनैद जैसे लोग मरते रहेंगे। कम्युनिस्टों और उदार संगठनों की यह सबसे बड़ी चुनौती है। जगदीश्वर चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से साभार
