अशोक वाजपेयी के बहाने साहित्य के नए सवाल- एक अंश-

अशोक वाजपेयी के बहाने साहित्य के नए सवाल- एक अंश

जगदीश्वर चतुर्वेदी

 

इस समय हिन्दी के सत्ताधारी प्रगतिशील-कलावादी लेखक बड़े कष्ट में हैं।इन लेखकों की मुश्किल यह है कि वे वगैर राजनेता के संरक्षण के साहित्य-सेवा नहीं कर सकते।कायदे से लेखकों को इस तरह के राजनीतिक संरक्षण से बचना चाहिए। विचार करें क्या जर्मनी के किसी लेखक ने हिटलर से लड़ने के लिए राजनीतिक संरक्षण मांगा ॽ यह कौन सी राजनीति है कि लेखक को समाज में काम करने के लिए राजनीतिक संरक्षण चाहिए ! राजनीतिक संरक्षण वस्तुतः लेखक की गुलामी है । जो लेखक काम करना चाहते हैं तो वे स्वतंत्र रूप से काम करें।कौन रोक रहा है।लेकिन संरक्षण लेकर काम करना लेखक के लिए मुसीबतें पैदा करता है। इस परिप्रेक्ष्य में हमें अशोक वाजपेयी फिनोमिना को देखना चाहिए।

हिन्दी आलोचना में नव्य उदार पूंजीवादी चारणों के बारे में जब भी सोचता हूँ तो रह-रहकर अशोक वाजपेयी याद आते हैं। इनकी भजनमंडली में ऐसे दो दर्जन लेखक हैं। अशोक वाजपेयी की शिक्षा-दीक्षा अव्वल दर्जे की रही है,सरकारी पद भी अव्वल रहे हैं ,उनके पास चमचे भी अव्वल दर्जे के रहे हैं । उन्होंने हिन्दी के अव्वल अखबार में नियमित कॉलम लिखे हैं।

पूंजीवादी विनय पत्रिका भी वे अव्वल लिखते हैं।वह अपने पूंजीवादी नजरिए से एकदम टस से मस होने को तैयार नहीं हैं। उनकी खूबी है कि वे हर विषय के ज्ञानी हैं ! जब भी जैसे मौका मिलता है सुंदर-असुंदर दोनों किस्म का लिखते हैं। उन्होंने एक ज़माने में मार्क्सवादी विचारधारा पर तथ्यहीन हमले किए हैं। दूसरी ओर मार्क्सवादी लोग चुपचाप उनको पढ़ते रहते हैं और प्रतिवाद नहीं करते। पहले मार्क्सवाद के खिलाफ बोलने वाले के खिलाफ मार्क्सवादी जवाब दिया करते थे। लेकिन इन दिनों हिन्दी में सर्वधर्म सदभाव की तरह सर्व विचारधारा मित्र मंडली या साहित्यिक गिरोह का दौर चल रहा है। यह अंतर करना मुश्किल होता है कि मार्क्सवादी कौन है और मार्क्सवाद विरोधी कौन है? मार्क्सवादी लोग इन दिनों अशोक वाजपेयी के लेखन की आलोचना नहीं करते।

साहित्य और संस्कृति में अमेरिकी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का झंड़ा बुलंद करने वाले अशोक वाजपेयी के लेखन और साहित्य-प्रशासनिक कर्मकांड को अभी लोग भूले नहीं हैं। इन्होंने साहित्य में आधुनिकता के पतनशील मूल्यों की हमेशा हिमायत की है पूंजीवादी संसार और अमेरिकी संस्कृति के पैरोकार और एजेण्ट की तरह हिन्दी में काम किया है।

अशोक वाजपेयी को अचानक इलहाम हुआ कि “इन दिनों अकसर यह लगता है कि हमने दुनिया बदलने या विकल्प खोजने का सपना देखना बंद कर दिया है: हम जो सपने देखते हैं वे अगर टुच्ची आकांक्षाओं के नहीं तो बहुत छोटी चीजों के लिए हो गए हैं।” सवाल यह है कि आखिरकार ऐसे हालत पैदा क्यों हुए कि लोगों ने बड़े सपने देखने बंद कर दिए ? समाजवादी या मार्क्सवादी विचारक इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं ,बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था और उसका आक्रामक रूख इसके लिए जिम्मेदार है। लेकिन अशोक वाजपेयी ने कभी विस्तार से पूंजीवाद के आक्रामक रवैय्ये की आलोचना नहीं की । उलटे भारत में अमेरिका के पहरूए की तरह काम करते रहे हैं।

सपनों के मरने में पूंजीवाद की भूमिका को न देखना स्वयं पूंजीवाद की भूमिका पर पर्दा डालना है। उनको गलतफहमी है कि भारत में बाहर भी लोगों ने सामाजिक परिवर्तन के सपने देखना बंद कर दिया है। सामाजिक परिवर्तन के सपने या दुनिया को बदलने के सपने लैटिन अमेरिका के क्रांतिकारियों ने देखने बंद नहीं किए हैं ,वहां पर वे विभिन्न देशों में सामाजिक परिवर्तन के नए विकल्पों की खोज और निर्माण में लगे हैं। लैटिन के साहित्यकारों ने भी बुनियादी परिवर्तन के सपने देखना बंद नहीं किया है। समाजवाद के पराभव के बाद वहां एक विशाल जनउभार आया है।लोकतंत्र और क्रांति में नए किस्म के अंतस्संबंध के निर्माण के प्रयास हो रहे हैं।

समाजवादी यथार्थवाद और आलोचनात्मक यथार्थवाद से आगे की मंजिल के साहित्य के नए-नए प्रयोग वे ही लेखक कर रहे हैं जो लैटिन अमेरिका में किसी न किसी किस्म के सामाजिक परिवर्तन के वामपंथी आंदोलन से जुड़े हैं या उसके समर्थक हैं। मजदूरों और किसानों के संगठनों की जुझारू क्षमता भी इन देशों में जगजाहिर है ।इसका सु-परिणाम है कि समूचे लैटिन अमेरिका में आज अमेरिकी साम्राज्यवाद हाशिए पर है और लैटिन अमेरिकी देशों में एकजुटता पैदा करने और संघर्ष करके समाज बदलने की भावना को निर्मित करने में मार्क्सवादी अग्रणी कतारों में हैं। यह सारा परिवर्तन सोवियत संघ और समाजवादी समूह के पूर्वी यूरोपीय देशो में समाजवादी व्यवस्था के पतन के बाद का है।

अशोक वाजपेयी ने तारिक अली को उद्धृत करते हुए लिखा है- “मार्क्सवाद को धर्म बनाना गलत था और है तथा मार्क्स या अन्य चिंतकों के अंतर्विरोधों को नजरअंदाज करना भी गलत था और है।” यह धारणा भी गलत है। मार्क्सवाद कभी भी धर्म नहीं रहा है कम्युनिस्टों के यहां। कम्युनिस्ट पार्टी का अंधानुकरण और समाजवादी लोकतंत्र के अभाव के कारण समाजवादी व्यवस्था का पराभव हुआ और जनता को बड़े पैमाने पर कष्ट उठाने पड़े और इस तथ्य को रूस से लेकर अन्य देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों ने माना और फिर से लोकतंत्र की ओर इन देशों को धकेला है। दूसरी बड़ी बात यह कि मार्क्सवादी चिन्तकों ने चाहे भारत हो या रूस हो,जर्मनी हो चीन हो, कहीं पर भी मार्क्स के अंतर्विरोधों की अनदेखी नहीं की। अनेक मामलों में भारत के मार्क्सवादी अपने लेखन में एशियाई उत्पादन संबंधों के सवाल से लेकर जातिप्रथा तक, अंग्रेजों की भूमिका से लेकर सामंतवाद के चरित्र के सवालों पर मार्क्स से भिन्न नजरिए का प्रतिपादन करते रहे हैं।

अशोक वाजपेयी ने अपने टिपिकल मार्क्सवाद विरोधी अंदाज में लिखा है – “यह सवाल उठता है कि मार्क्सवाद पर आधारित तानाशाहियों ने जो किया और उनका जो हश्र हुआ उनसे क्या सबक लिया जाए। जाहिर है कि मरणोत्तर आलोचना एक तरह का सुविधापरक लगभग अवसरवादी काम है, हालांकि इस वजह से आलोचना से बचना या उसे स्थगित नहीं करना चाहिए। मनुष्य की मुक्ति और समानता का सपना दृश्य पर फिर से आए यह जरूरी है, लेकिन अब क्या यह सपना फिर से मार्क्सवादी पदावली में देखा-समझा जा सकता है? एक तरह से सोवियत और चीनी साम्यवादियों और उनकी राज व्यवस्थाओं को इसके लिए माफ नहीं किया जा सकता कि उन्होंने एक महान मुक्ति-दर्शन को संहार और दमन का, मुक्ति के हनन का, अन्याय की व्यवस्था बनाकर उसे हमेशा के लिए लांछित-दूषित, विकृत करने का पाप किया है। पर दूसरी ओर इस सचाई को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि अगर एक दर्शन का इतने दशकों तक ऐसा दुर्विनियोजन संभव हुआ तो उस दर्शन के मूल में कहीं कोई खोट होगी, जिसने इतनी सारी सामाजिक-सांस्कृतिक विकृतियों को जन्मा और पोसा। अकेले लेनिन, स्टालिन और माओ भर दोषी नहीं हैं- मार्क्स की भी जिम्मेदारी बनती है।”

अशोक वाजपेयी को मार्क्सवादी दर्शन में खोट नजर आ रहा है और मार्क्स में भी खोट नजर आ रहा है। सवाल यह है कि मार्क्स में कौन सा खोट है जो इन जनाव को तकलीफ दे रहा है ? समाजवादी व्यवस्था में जो गड़बड़ियां हुईं उनके बारे में इन जनाब के पास कोई एक-दो बड़ी मिसाल नहीं हैं जो कही जाए। स्वयं कम्युनिस्ट पार्टियों और कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित थिंकरों के द्वारा जो बातें आलोचना में कही गयी है वे ही समाजवादी व्यवस्था की गड़बड़ियों को समझने के लिए काफी है। इनमें सबसे खतरनाक है उदार बुर्जुआ मूल्यों का समाज में विकास किए बगैर सीधे सामंतवाद से समाजवाद में छलांग लगाना समाजवादी व्यवस्था को काफी महंगा साबित हुआ है। दूसरे बड़ी समस्या राज्यतंत्र के पर्याय के रूप में पार्टीतंत्र का उभरना था। इससे समाजवादी जनतंत्र का सपना नष्ट हुआ। सर्वहारा के अधिनायकवाद की जगह पार्टी के नेताओं का अधिनायकवादी तंत्र पैदा हुआ। लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक, साहित्यिक,वैज्ञानिक क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति हुई। समूची दुनिया में पूंजीवाद को अपना रास्ता बदलने के लिए समाजवादी देशों ने दबाब पैदा किया और कल्याणकारी राज्य के पूंजीवादी सपने और कार्यक्रम का जन्म हुआ। मनुष्यों के लिए जिन अधिकारों की स्थापना समाजवाद ने की उनमें से अनेक अधिकारों को कालान्तर में पूंजीवादी देशों को अपने यहां भी लागू करना पड़ा।

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि समाजवाद को तानाशाही के रूप में नहीं देखा जा सकता। समाजवाद यदि तानाशाही है तो उसके बिखरने के बाद तो दुनिया में खुशहाली आनी चाहिए थी ? ऐसा क्यों हुआ कि अमेरिका और भी आक्रामक हो गया ? युद्ध दैनंदिन संस्कृति बन गए हैं ? परवर्ती पूंजीवाद की नई विश्व व्यवस्था सामने आई जो समाजवादी व्यवस्था के देशों के अभाव में और भी ज्यादा बर्बर ढ़ंग से विभिन्न देशों के साथ व्यवहार करती रही है।

समाजवादी व्यवस्था का जन्म पूंजीवाद विरोधी व्यवस्था के रूप में हुआ था। अशोक वाजपेयी ने बड़ी ही चालाकी के साथ अमेरिकी बर्बरता पर कुछ भी नहीं कहा है। सवाल है कि क्या पूंजीवाद पुण्यात्माओं की व्यवस्था है ? इस संसार पर दो-दो विश्वयुद्ध किसने थोपे ? इन युद्धों में करोड़ों लोग मारे गए हैं। इराक-अफगानिस्तान में अमेरिकी नेतृत्व में काम कर रही नाटो सेनाओं के अत्याचारों के खून के धब्बे अभी तक धुले नहीं हैं।

अशोक वाजपेयी साहब अपने टिपिकल मार्क्सवाद विरोधी और पूंजीवाद के चारणों की पदावली का इस्तेमाल करते हुए पूंजीवाद को धर्म बताने का काम कर रहे हैं। पूंजीवाद के जरिए इस दुनिया की मुक्ति संभव नहीं है। यह बात सबसे पहले मार्क्स ने ही कही थी और उनकी यही भविष्यवाणी बार बार सही साबित हुई है। अशोक वाजपेयी भूल गए है कि चीन ने बहुत ही कम समय में अपने देश की अर्थव्यवस्था में जो लंबी छलांग लगाई है वैसी छलांग पहले किसी भी पूंजीवादी मुल्क ने नहीं लगाई है। पूंजीवाद से मुक्ति का आज भी एक ही विज्ञान है और वह है मार्क्सवाद। मार्क्स ने कभी नहीं कहा कि वे जो लिख रहे हैं वह पत्थर की लकीर है और उनके अनुयायियों को उनकी बातों को आँखें बंद करके मानना चाहिए. मार्क्सवाद का नाम अनुकरण नहीं है। यह विज्ञान है, विश्व दृष्टिकोण है। दुनिया के परिवर्तन का सबसे प्रभावशाली दर्शन है ,और करोड़ों लोग आज भी अपनी मुक्ति के संघर्ष में मार्क्सवाद से प्रेरणा ले रहे हैं।
भारत में जब से फोर्ड फाउंडेशन जैसी अमेरिकी संस्थाओं और भारतीय कारपोरेट घरानों का कला,साहित्य,संस्कृति, शिक्षा आदि में पैसा आना आरंभ हुआ है उसके बाद तेजी से आलोचना और अकादमिक अवमूल्यन आरंभ हुआ है। हिन्दी आलोचना और साहित्य में अमेरिकी हस्तक्षेप कोई नयी चीज नहीं है। कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के हिन्दी में आगमन के साथ यह सिलसिला 1951-52 के आसपास से आरंभ होता है।भारत भवन में फोर्ड फाउंडेशन के सहयोग से अशोक वाजपेयी एंड कंपनी का वैभव नई बुलंदियों को प्राप्त करता है।

कांग्रेस का और खासकर स्व.अर्जुनसिंह का अक्षम्य सांस्कृतिक अपराध यह है कि इन लोगों ने भारत के शिक्षा संस्थानों और संस्कृति केन्द्रों के द्वार अमेरिकी संस्थाओं और फाउण्डेशनों के लिए खोल दिए।आज संस्कृति और शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में अमेरिकी दानदाता संस्थाओं की पूंजी का कृषि से लेकर संस्कृति तक व्यापक नेटवर्क फैला हुआ है। खासकर कृषि विश्वविद्यालयों से लेकर स्पीकमैके जैसी संस्थाओं, अकादमिक फैलोशिप से लेकर लाइब्रेरी तक यह नेटवर्क काम कर रहा है। अमेरिकी दानदाता संस्थाओं की व्यापक भूमिका को विस्तार देने में स्वयंसेवी संस्थाओं की भी बड़ी भूमिका रही है। इन संस्थाओं में अमेरिकी दौलत का खेल कई हजार करोड़ रूपये सालाना तक फैला हुआ है।शोध संस्थानों से लेकर विश्वविद्यालयों तक इस पैसे की नेटवर्किंग काम करती रही है।

अमेरिकी बहुराष्ट्रीय सांस्कृतिक निगमों की दान राशि के आने के बाद से ज्ञान, विज्ञान, कृषि,साहित्य,संस्कृति आदि के क्षेत्र में अवमूल्यन की प्रक्रिया ने तेज गति पकड़ी है। संयोग की बात है कि कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम के साथ जुड़ने में जयप्रकाश नारायण,अज्ञेय,रामवृक्ष बेनीपुरी,पीलू मोदी आदि की भूमिका के बारे में कभी बहस ही नहीं हुई। इसी तरह एक जमाने में भारत भवन और फोर्ड फाउंडेशन के अंन्तस्संबंधों को लेकर थोड़ी बहुत बहस भी हुई ,लेकिन इस संबंध का हिन्दी आलोचना और साहित्य पर क्या असर हो सकता है इसकी ओर कभी ध्यान ही नहीं गया। प्रगतिशील लेखकों को राजनीति रहित लेखक के रूप में पेश करने में अशोक वाजपेयी के जमाने में भारत भवन से छपने वाली पत्रिकाओं की बड़ी भूमिका रही है और इस काम को प्रोत्साहन देने में प्रगतिशील लेखक संघ की पूरी लेखकमंडली का सक्रिय सहयोग रहा है।नामवर सिंह जैसे बड़े आलोचक ने भी अमेरिकी पूंजी के सांस्कृतिक प्रभाव को लेकर कभी एक शब्द नहीं लिखा। यह आश्चर्य की बात है कि वे भारत भवन के सभी कार्यक्रमों में पूरी टीम के साथ हमेशा उपलब्ध रहते थे।

साहित्य में अमेरिकी प्रभाव का सबसे प्रभावशाली मंत्र है साहित्य और साहित्यकार को राजनीति से मुक्त करके विश्लेषित करो। साहित्य को ग्लैमर बनाओ। इवेंट बनाओ। इस परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर साक्षात्कार और पूर्वाग्रह पत्रिकाओं ने हिन्दी के तमाम प्रगतिशील लेखकों पर अमेरिकी साहित्यवादी नजरिए से मोटे-मोटे अंक निकाले और इन अंकों में लिखने वाले लेखकों में हिन्दी के जाने-माने लेखकों की बड़ी भूमिका थी और इस भूमिका को नियोजित करने में अशोक वाजपेयी का मूल्यवान योगदान रहा है।

फोर्ड फाउंडेशन ,कॉग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम आदि संस्थाओं के फंड के जरिए और अमेरिकी लक्ष्यों के अनुरूप लेखकों-साहित्यकारों –चित्रकारों-संगीतकारों और बुद्धिजीवियों को गोलबंद करने में जो भूमिका रही है उसका सही ढंग से मूल्यांकन किया जाना चाहिए।इनकी मदद से किस तरह की संस्कृति और राजनीति को पाला-पोसा गया, इस पर व्यापक नज़रिए से विचार करने की जरुरत है।भारत के ‘भोले लेखक’ यह भूल ही गए कि सत्ता और अमेरिकी कारपोरेट पूंजी के सहमेल से महान समीक्षा,महान राजनीति और महान साहित्य नहीं रचा जा सकता। इतिहास ने यह सच साबित किया है कि भारत भवन से न तो कोई साहित्य आंदोलन पैदा हुआ और न नया साहित्य ही सामने आया। बल्कि साहित्य के आयोजनों के जरिए लेखकों के वैचारिक पंख कतर दिए गए। इस काम को अशोक वाजपेयी ने बड़ी दक्षता के साथ किया।

संक्षेप में कहें तो भारतभवन और उनके प्रकाशनों के जरिए प्रगतिशील लेखकों के राजनीतिविहीन-विचारधाराविहीन मूल्यांकन करते हुए जो विशेष अंक आए उन्होंने आलोचना के अवमूल्यन का मार्ग प्रशस्त किया। इस समूची प्रक्रिया के सूत्रधार बने अशोक वाजपेयी।इस अर्थ में आलोचना के अवमूल्यन के भी वे ही प्रमुख सूत्रधार हैं। हिन्दी आलोचना की यह त्रासदी है वह इस प्रवृत्ति को पहचानने से भागती रही है और तकरीबन सभी समर्थ आलोचक इन दिनों अशोक वाजपेयी की मित्र मंडली का हिस्सा हैं और अब वे लोग मित्र-संवाद करते हैं, आलोचना नहीं करते।

(हिंदी साहित्य और परवर्ती पूंजीवाद,नामक किताब का अंश,यह किताब अमेजन पर उपलब्ध है)

जगदीश्वर चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से साभार

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