सम्पा – विश्वास, धैर्य और संकल्प की अनूठी दास्तान

पुस्तक समीक्षा

सम्पा – विश्वास, धैर्य और संकल्प की अनूठी दास्तान

सुरेश हंस

 

दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल का एक शे’र है :

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है,

माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है।

उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप,

वो आदमी नया है, मगर सावधान है।

यह पुस्तक सम्पा के बीच की औरत के ऐसे ही  का लफ़्ज़ों का बयान है जो तीर की तरह सीधे दिल में उतरता है | पुस्तक हाथ में आते ही जब हम कवर पेज देखते हैं तो एक विचार भी आ जाता है : यह विश्वास, धैर्य और संकल्प की अनूठी दास्तान है | अब कितनी अनूठी होगी सम्पा की यह दास्तान तो यह पुस्तक पढने के बाद ही पता चलेगा |

संघर्ष की यह गाथा शुरू होती है 2010 से जब स्कूल के लिए निकलते हुए सम्पा को अचानक दिल्ली से एक फ़ोन आता है | यह फ़ोन नहीं उसके संघर्ष का उद्घोष था | उसे पता चलता है कि उसके पति को सोमालिया के समुद्री लुटेरों ने कैद कर लिया है | जिस औरत ने फ़ोन किया उसके पति और सम्पा के पति एक साथ उन लुटेरों की कैद में हैं | मधु  सम्पा को बताती है कि उसके पति रविंदर ने उसके लिए सन्देश छोड़ा है कि ‘यह सूचना सम्पा को दे दें वह जरुर कुछ न कुछ करेगी |’

‘वह जरुर कुछ न कुछ करेगी’ यह कोई आम वाक्य नहीं था | इसमें दुनिया जहान का भरोसा और विश्वास समाया था | सम्पा को इसी एक वाक्य ने संघर्ष की उस यद्ध भूमि में ला खड़ा किया , जहाँ न उसके पास लड़ने को हथियार थे और न ही सफल होने वाली किसी दिशा की खबर थी | गाँव की सीधी-सादी लड़की जिसे घर से स्कूल का रास्ता ही पता था वह अपने पति को छुडवाने के लिए उस राजधानी के द्वार खटखटाने निकल पड़ती है, जहाँ तक पहुँचने के लिए लोगों की जूतियाँ घिस जाती हैं |

यह अंधेर नगरी थी, जहाँ वह रौशनी का सुराग ढूंढ रही थी | उसने अपने ग्यारह महीनों के संघर्ष में किस किस नेता , मंत्री का दरवाज़ा नहीं खटखटाया | मगर हर तरफ से कोई रौशनी का बिंदु तक दिखाई नहीं दिया | निराश हताश वह भटकती रही गाँव से दिल्ली | पुस्तक पढ़ते हुए लगता रहा यह एक सम्पा का अपने पति को सोमालिया के लुटेरों से छुड़वाकर वापस लाने भर की कहानी नहीं है, बल्कि  महानगर से गाँव के निरंतर सवाल करने और सहायता मांगने का प्रश्न है | सम्पा गिड़गिड़ाने का नाम नहीं है , सम्पा इतनी मानसिक तनाव पीड़ा और निराशा के बीच भी अपनी ठसक बनाए रखती है | सम्पा अपने पति की मृत्यु का सोच कर तड़प उठती है | फिरौती की करोड़ों रुपए की भारी रकम न मिलने पर लुटरे उसके रविंदर को मार देंगे | रविंदर के बिना वह बेचैन रूह थी | इस लड़ाई में उसके पिता और ससुर भाई मामा का साथ साए की तरह बना रहा | घोर अनिश्चितता में अदम्य साहस और खुद पर भरोसा कायम रखना हर व्यक्ति के बूते की बात नहीं होती |

सम्पा शायद किसी और ही मिट्टी की बनी थी | हर रोज़ टूटना और अगली सुबह अपने पति के लिए स्वचालित मशीन सी नए साहस के साथ फिर खड़ी हो जाती है | देश का पूरा मीडिया उसकी कहानी सुनने और सुनाने को लालायित है | राजदीप सर देसाई के सी एन एन से लेकर लोकल चैनलों तक में उन दिनों सम्पा की गुहार ही दिखाई देने लगी थी | वह मुख्य मंत्री से लेकर प्रधान मंत्री तक वह सबको मिल चुकी है | कहीं से भी उसे आस की किरण दिखाई नहीं दी | न्यूज़ मीडिया के लिए वह केवल टी आर पी थी | कुछ पत्रकारों को छोड़कर सब उसे प्रोडक्ट समझने लगे थे | कभी विदेश मंत्रालय, कभी शिपिंग कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया, कभी न्यज़ स्टूडियोज , कभी पी एम् हाउस हर रोज़ अपनी अर्जी लेकर पहुँच जाती | इसी बीच विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने उसके लिए संसद में आवाज़ उठाई | बात सरकार के हर विभाग तक पहुंची लेकिन कोई दिशा फिर भी न मिली | दस महीने भटकने के बाद उसने राहुल गांधी और सोनिया गांधी से मिलने का मन बनाया | लेकिन इनसे भी वह कई चक्कर लगाने के बाद भी नहीं मिल पायी | आखिर एक दिन उसे राहुल गांधी से मिलने का अवसर मिल ही गया | लेकिन जब वहां पहुंची तो पता चला राहुल को पैर में फ्रेक्चर है | इसलिए वह मिल नहीं पाएँगे | निराश हताश सम्पा सारे सिस्टम को कोसती रही | लेकिन तभी वहां एक व्यक्ति आया जिसने कहा आप निश्चिन्त हो जाएं और घर जाएं | आपके पति ठीक आज से एक महीने बाद आपको मिल जाएँगे |”

उसने कहा , “आप ऐसा कैसे कह रहे हैं |”

उस अधिकारी ने कहा , “हमसे जो कहा गया है वही आपको कहा है |” सम्पा लगा यह व्यक्ति गोली दे रहा है |

उसने फिर कहा , “ आप झूठ बोल रहे हैं |”

लेकिन उस व्यक्ति ने प्रत्युत्तर दिया , “मैडम हमारे यहाँ इस ऑफिस झूठ नहीं बोला जाता |”

वह फिर से अनिश्चितता की खोह में चली गई | निराश, हताश लौट आती है अपने घर | लेकिन जिस दिन उसका पति रविंदर आता है | उस दिन उसे राहुल गांधी के दफ्तर में कही गई उस व्यक्ति की बात याद आती है | जिस दिन सारे भारतीय एयर पोर्ट पर लैंड किए उस दिन उस बात को ठीक एक माह हुआ था |

खैर सम्पा की कहानी में भारतीय सरकार और अपने आप से एक ऐसी अंधी लड़ाई है जिसका अंत उसे नहीं मालूम, लेकिन उसकी अदम्य जिजीविषा ने कभी घुटने टेकने नहीं दिए |

यह पुस्तक पाठक को जहाँ एक तरफ ग्रामीण लोगों की सादगी का भ्रष्ट तंत्र से टकराने का अंदाज़ प्रस्तुत करती है वहीँ यह भी बताती है कि ईमानदारी से किया गया सतत प्रयास सफलता की दहलीज़ पर आकर ठहरता है | दूसरी महत्वपूर्ण बात सम्पा का जो किरदार पाठकों के सामने आता  है वह न केवल बहु आयामी है अपितु विभिन्न दृष्टिकोणों से देखने की मांग करता है | उसका प्रेम शरीर की सीमा निर्धारित नहीं करता बल्कि रूह तक अपनी पैठ रखता है | वह उस व्यक्ति के लिए तड़प रही है जो उसका वफादार नहीं है | वह मुंहफट है लेकिन छोटे बड़े की तमीज उसके संस्कारों से आई है | उसने अपने रास्ते खुद तय किए हैं तो उन रास्तों के लिए मिट जाने की हद तक गई है | अंत में माधव राव सिंधिया तक के हाथों से पुरस्कार ठुकराने वाली हिम्मत सम्पा ही कर सकती थी | बोलते हुए, करते हुए परिणाम के बारे नहीं सोचना उसे निष्काम भाव वाली स्त्री के रूप में प्रस्तुत करता है | सम्पा उन तमाम स्त्रियों के लिए उम्मीद की किरण है जो संघर्ष में हार मान कर बैठ जाती हैं | हर संघर्षरत स्त्री को ‘सम्पा’ पुस्तक एक बार जरुर पढ़नी चाहिए |

रविंदर आम कामनाओं में उलझा, यह बखूबी समझता है कि वास्तविक प्रेम उसे सम्पा ही कर सकती है | सम्पा के अतिरिक्त देखना उसकी भटकन है जो उसके स्वभाव और अकेलेपन की उपज है | इसीलिए वह सम्पा को अपने से दूर जाते देख अपना अंत करने का रास्ता चुन लेता है | आदमी कितना भी बुरा क्यों न हो उसे अच्छे बुरे की पहचान होती ही है | पुस्तक न केवल पठनीय है अपितु संग्रहणीय भी है | इस पुस्तक की लेखिका मीनाक्षी चौधरी ने सम्पा के चरित्र को जिस तरह प्रस्तुत किया वह अपने आप में अद्भुत है | पुस्तक की रोचकता पाठक को अंत तक बांधे रखती है | सत्य घटना पर आधारित यह पुस्तक सम्पा के जीवन का खुबसूरत दस्तावेज़ है | वेस्टलैंड से प्रकाशित दोनों के योगदान से पाठकों तक पहुंची है | संजीव पालीवाल और मीनाक्षी चौधरी बधाई के पात्र हैं |

पुस्तक : सम्पा

प्रकाशन : एकदा वेस्ट लैंड

लेखिका : मीनाक्षी चौधरी और संजीव पालीवाल

उपलब्धता :westland

कीमत  : 399/- रूपए

समीक्षक : सुरेश हंस

 

 

Comments

Your email address will not be published.

0