रत्ना भदौरिया की संवेदनशीलता में डूबी बौद्धिक सक्रियता चकित करती है..!
दया शंकर राय
ये रत्ना भदौरिया Ratna Bhadouriya हैं। गुणगांव के एक निजी अस्पताल में नर्स। लेकिन संवेदनशीलता में डूबी हुई इनकी बौद्धिक सक्रियता चकित करती है..! अभी थोड़ी देर पहले इनकी पोस्ट देखी जिसमें ये अस्पताल में एक मरीज के आयुष्मान कार्ड के तहत पैसा खर्च हो जाने के बाद उसके इलाज को लेकर चिंतित और विचलित थीं..! इनकी यह संवेदनशीलता इनके लेखन में साफ गुंथी हुई दिखती है।
मेडिकल का पेशा बहुत ही व्यस्त और तनाव वाला माना जाता है। फिर भी देश को मथ रहे विषयों पर इनका प्रखर हस्तक्षेप काबीलेगौर होता है..! मैं रत्ना को निजी तौर पर बिल्कुल नहीं जानता और मेरी मित्र सूची में भी ये शायद अभी दो साल से ही होंगी।
लेकिन इनके लेखकीय वैविध्य ने मेरा ध्यान गहरे खींचा क्योंकि मेडिकल पेशे में होते हुए भी इनके लेखन का कैनवास बहुत विस्तृत है। महिला विषय से लेकर, राजनीति, साहित्य संस्कृति, मानवाधिकार और यहां तक कि विदेशी मामलों पर भी इनकी सजग टिप्पणियां देखने को मिल जाती हैं।
महिला और साहित्य संस्कृति के कुछ प्रसंगों पर तो इन्होंने जिस प्रखरता और संवेदनशीलता के साथ गहरे उतर कर लिखा है वह विस्मित करता है और साहित्य संस्कृति की दुनिया में सक्रिय पेशेवर बुद्धिजीवियों के लिए भी विमर्श की एक जमीन प्रदान करता है।
रत्ना पर आज लिखने की जरूरत इसीलिए महसूस हुई क्योंकि ऐसी बेटियां ही इस मुल्क और समाज का भविष्य हैं और समाज में आज जिस आधुनिक प्रबोधन पर आधारित नवोन्मेषी नव जागरण की जरूरत वह इनके जरिए ही होकर जाता है। इसलिए समाज को आज रत्ना जैसी बेटियों की ही जरूरत है जिनके लिए बौद्धिकता कोई चकाचौंध पैदा करने का विषय नहीं बल्कि भोजन की तरह ही एक अनिवार्य जरूरत है। जीवन में गूंथा हुआ..! इसलिए रत्ना को खूब सारा स्नेह और शुभकामनाएं कि वह अपनी संवदेनशील और प्रखर बौद्धिक और लेखकीय सक्रियता के जरिए बहुत सारी आम हिन्दुस्तानी लकड़ियों के लिए एक नजीर बनें।

मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ ।
जानता मैं भी नहीं था लेकिन भाई ओमसिंह अशफ़ाक ने जब रत्ना भदौरिया का प्रतिबिंब मीडिया पर प्रकाशित लेख भेजा तो उन्हें पढ़ने लगा। रूढ़ि को पहचान सकने वाली निगाह, सुस्पष्ट विचार, जनपक्षधरता और अनुभवसम्मत/ज्ञानसम्मत सलाह रत्ना भदौरिया के लिखे को ख़ास बनाते हैं। हिंदी में इस (मेडिकल) पृष्ठभूमि रचनाकारों की कमी खटकती है। बारामासा के लेखक ज्ञान चतुर्वेदी, विवेक मिश्र (कथाकार, हंस पत्रिका से सम्बद्ध) जैसे दो-चार लोग ही नज़र आते हैं।
Bilkul sahi hai sir. Ratna ki soch bahut original hai. Visited beti ko bahut bahut sadhuwad. Us ki lekhni me God aur Takat de