लघुकथा
सास का अनकहा दर्द
डॉ. रीटा अरोड़ा
“कमला… आज तू इतनी चुप क्यों है?”
कमला ने फीकी-सी मुस्कान दी-
“कुछ दर्द आवाज़ नहीं करते, सुधा… बस भीतर उतरते जाते हैं।”
“कुछ हुआ है क्या?”
“कल रात बहू अपनी माँ से फोन पर बात कर रही थी। अनजाने में मैंने उसकी बातें सुन लीं।”
“क्या कह रही थी?”
कमला कुछ पल चुप रही।
“कह रही थी- ‘माँ, मम्मीजी को मेरे हर काम में कमी ही दिखती है। कल सब्ज़ी में नमक कम था, तो कहने लगीं-तुम्हें अभी तक खाना बनाना नहीं आया।”
सुधा ने पूछा-
“तूने सच में ऐसा कहा था?”
कमला ने धीरे से सिर झुका लिया-
“हाँ… कहा था। लेकिन क्या उसे मेरी बात सुनाई दी… मेरी चिंता नहीं?”
“और?”
“वह कह रही थी- ‘ऑफिस से थककर आती हूँ, फिर भी उन्हें चाहिए कि मैं उनके पास बैठूँ।’”
कमला के चेहरे पर एक क्षीण मुस्कान आई।
“मैंने कब बहुत समय माँगा था, सुधा? बस कुछ पल… ताकि मुझे लगे कि मैं इस घर में अकेली नहीं हूँ।”
सुधा ने उसका हाथ थाम लिया-
“फिर तूने बहू से बात क्यों नहीं की?”
“कैसे करती? वह कहती- ‘मम्मीजी, आप मुझे समझती ही नहीं।”
“तो बेटे से कह देती।”
कमला की आँखें नम हो गईं-
“नहीं… वह कहेगा- ‘माँ, आप मेरी पत्नी की शिकायत क्यों करती रहती हैं?”
“फिर अपना दर्द किससे कहेगी?”
कमला कुछ देर मौन रही।
फिर बहुत धीमे से बोली-
“यही तो नहीं जानती, सुधा… बहू अपनी माँ के सामने रो सकती है, मैं किसके सामने रोऊँ?”
“कमला…”
“रात को मेरा तकिया ही मेरा साथी है। उसी में मुँह छिपाकर रो लेती हूँ… आँसू भी छिपा देती हूँ।”
सुधा की आँखें भी भर आईं।
कमला ने आँसू पोंछे-
“क्योंकि सुबह फिर सास बनकर उठना होता है…”
अगली सुबह कमला ने चेहरे पर मुस्कान सजाई, रसोई में गई और बहू से बस इतना कहा-
“बहू… चाय बना दूँ?”
~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
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