इसरो राष्ट्रीय ‘वैज्ञानिक’ खजाना, निजी कंपनियों को बेचना ‘एंटीनेशनल’
गौहर रजा
इसरो हमारे और आपके खून-पसीने की कमाई से बना हुआ राष्ट्रीय ‘वैज्ञानिक’ खज़ाना है, जिस पर हम गर्व करते रहे हैं। इसे टुकड़ों-टुकड़ों में निजी कंपनियों को बेचना ‘एंटीनेशनल’ हरकत है।

इसरो के वैज्ञानिकों का प्रोटेस्ट ख़त देश की संपत्ति बचाने के ख़िलाफ़ एक सराहनीय कोशिश है।
कहा जा रहा है कि इसरो को प्रोडक्शन रोक देना चाहिए और रिसर्च पर ध्यान देना चाहिए। अगर यही कमी थी तो प्राइवेट सेक्टर को यह जिम्मेदारी दे देते कि वह रिसर्च करे और इसरो की मदद करे।
नहीं साहब, इस सरकार ने तो हमारी संपत्ति को टुकड़े-टुकड़े कर के अपने दोस्तों के हवाले करने की सुपारी ले रखी है।
दुनिया के किसी भी देश का प्राइवेट सेक्टर ‘देश सेवा’, ‘जान सेवा’ या ‘रोजगार देने’ के लिए नहीं होता, उसका लक्ष्य मुनाफ़ा कमाना होता है।
यह भी कहा जा रहा है कि प्राइवेट सेक्टर में वैज्ञानिकों को ज़्यादा ‘सैलरी’ मिलेगी। इतिहास, और खासकर इसरो का अनुभव, बताता है कि वैज्ञानिक पैसों के लिए आविष्कार नहीं करते।
क्या कोई यकीन कर सकता है कि इतने दशकों तक दूसरे देशों ने इसरो के वैज्ञानिकों को बड़ी-बड़ी सैलरी का लालच नहीं दिया होगा, पर इसरो से कभी वैज्ञानिकों का पलायन की खबरें नहीं आईं।
अब यह दरवाज़ा खोल दिया गया है। पहले उन्हें भारत के प्राइवेट सेक्टर में धकेला जा रहा है, फिर उन्हें देश से बाहर धकेला जाएगा (ज़्यादा पगार का लालच देकर)।
जब आम नागरिक की नज़र में मीडिया, नेता, कानून, प्रशासन, चुनाव आयोग की इज़्ज़त दाव पर लगी है तो सिर्फ़ ‘वैज्ञानिक’ समुदाय ही ऐसा बचा है जिसे हम लोग इज़्ज़त की नज़र से देखते हैं। इसलिए कि हर नागरिक को पता है कि बुरे हालात में भी देश के वैज्ञानिकों ने अनथक सेवा की है, मान बढ़ाया है।
देशभक्ति के नाम पर वोट मांगने वाले, इसरो और डीआरडीओ को बेचकर, कर रहे हैं देश सेवा।
इसरो को बचाने की ज़िम्मेदारी अब देश के नागरिकों की है, हमारी और आपकी है, विपक्षी दलों की है।
देखना यह है कि जिस संस्थान ने दुनिया भर में देश का मान बढ़ाया है, और हर नागरिक ने उसके काम पर गर्व किया है, क्या हम उसके टुकड़े-टुकड़े किए जाने के ख़िलाफ़ खड़े होंगे।
