विवेक पै विवेकहीनता का हमला

व्यंग्य

विवेक पै विवेकहीनता का हमला

रणबीर सिंह दहिया

तर्क, युक्ति, विवेक, अनुसंधान, प्रयोग अर परीक्षण के बिना विज्ञान का विकास नहीं हो सकदा। शुरू तै ए विज्ञान अपने इन पुख्ता आधारां पै खड़या होके आगै बढ़या। इनके आधार पर वैज्ञानिकां मैं यो मानकै चलने का नैतिक बल और साहस आवै सै अक वे ईब ताहिं सही समझे जावण आले सिद्धान्तां नै चुनौती दे सकैं।

नये सिद्धान्त प्रतिपादित कर सकैं अर इस बात खातर तैयार रहवैं अक इनै आधारा पै उनके सिद्धांतां ताहिं बी चुनौती दी जा सकै सै अर नये सिद्धांत उसके सिद्धांता नै गल्त साबित कर सकैं सैं। फेर आज के दिन या बात देख कै हैरानी होवै सै अक खुद विज्ञान के क्षेत्र में विज्ञान के इन आधारां नै नष्ट करण का काम करया जाण लागरया सै।

इसतै बी घनी हैरानी की बात या सै अक यो काम विज्ञान के विरोधी तो करैं सो करैं बल्कि वैज्ञानिक कहे अर माने जावण आले लोग भी यो काम करण मंडरे सैं अर बड़े पैमाने पै। जै एक हरफी बात करनी हो तै यो इस विवेक पै विवेकहीनता का हमला कहया जा सकै सै। अर यू हमला इतना जबरदस्त सै अक विज्ञान विवेक की दिशा मैं आगै बढण की बजाय उसतै पाछे नै हटता हुया दिखाई देवै सै। सोचण की बात सै अक इसा क्यूं हुआ अर इसके संसार अर मानवता पै के असर पड़ैंगे। फेर सोच्चण की फुरसत किसनै सै?

जै कोए सोचना समझना चाहवै सै तो उसकी खातर पढ़ण नै एक आच्छी किताब सै ‘साइंस एंड दि रिट्रिट फ्रॉम रीजन’ जो मर्लिन प्रैस लन्दन तै 1995 मैं छपी सै। या किताब लंदन के दो लेखकां जॉन गिलैट अर मनजीत कुमार नै मिलकै लिखी सै। जॉन गिलैट गणितज्ञ सैं अर मनजीत कुमार भौतिकी अर दर्शन के विद्वान सैं।

पहलम विज्ञान की प्रगति नै समाज की प्रगति की नींव मान्या जाया करदा। साथ मैं यो विचार अक मानवता को विज्ञान के द्वारा पूर्णतर बनाया जा सकता है, प्रगति का आधार था। यो विचार सबतै पहलम ठारवीं सदी मैं एक फ्रांस के गणितज्ञ अर दार्शनिक कोंदोर्से ने अपनी किताब ‘मानव मस्तिष्क की प्रगति की एक ऐतिहासिक झांकी’ (1794) मैं व्यक्त करया था।

फेर ब्रूनो नै जिन्दा जलावण आलै हरेक युग मैं हुये सैं अर आज भी सैं। एक अंग्रेज पादरी था माल्थस जिसनै फांचर ठोक कहदें तो गलत बात नहीं उसनै कोंदोर्से के विचार का विरोध करया ‘ऐस्से ऑन दि पिं्रसीपल ऑफ पापुलेशन’ (1798) मैं अपनी किताब छपवा कै।

इसके बावजूद पीछे सी ताहिं कोंदोर्से का सिद्धांत काम करया करदा। उस बख्त लोगां के दिल में या आस थी यो विश्वास था अक विज्ञान के दम पै समाज की प्रगति, मानवता की प्रगति बहोत आगे ताहिं करी जा सकै सै। उननै उम्मीद थी कि अक वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक प्रगति भी हो सकै सै अर होवैगी अर आम आदमी की जिन्दगी मैं खुशहाली आवैगी।

हरित क्रांति के दौर मैं हरियाणा के लोगों नै बी खूब सपने देखे थे। फेर कितने लोगां के सपने पूरे हुए अर कितन्यां के सपने टूट कै चूर-चूर होंगे? वैज्ञानिक प्रगति तै आर्थिक विकास तो हुया फेर सामाजिक विकास पिछड़ता चल्या गया। आम आदमी के मन मैं विज्ञान के प्रति मोह भंग के हालात पैदा होगे। क्यों? सोच्चण की बात सै।

भारत मैं भी विकास का योह मॉडल तबाही मचावण लागरया सै। भारत महाशक्ति बणाण के सपने देखैं सैं फेर 80 प्रतिशत जनता का गला घोंट के महाशक्ति बण बी जावैगा तो के फायदा? एक बर फेर विवेक पै विवेकहीनता की जीत का मौका आ ज्यागा। भारत बहोत बड़ी आबादी आला देश सै, इस करकै आड़ै कुशल श्रमवाली, कम पूंजी आली अर म्हारे प्राकृतिक संसाधनां नै नुकसान ना पहोंचावण आली प्रौद्योगिकी ताहिं प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

फेर इसकी जागां आपां कैपिटल इंटेंसिव प्रौद्योगिकी अपनावां सां तो एक तरफ तो हम अपने देश के बहोत से श्रमिकों नै बेरोजगार बनावां सां अर दूसरी तरफ नई प्रौद्योगिकी बाहर से ल्यावण पै अपनी औकात तै फालतू खर्च करकै कर्ज के शिकंजे मैं फंस ज्यावां सां अर फेर विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष अर विश्व व्यापार संगठन बरगी संस्थावां की उन शर्तां नै माणण नै लाचार हो ज्यावां सां। ये शर्त म्हारे देश की अर्थव्यवस्था के प्रतिकूल होवैं सैं। या बात साफ सै अक जै हम ज्यादा श्रम आली अर स्थानीय ज्ञान प्रणालियां पै आधारित प्रौद्योगिकी नै विकसित करांगे तो म्हारे काम तै रोजगार बधैंगे, जनता के जीवन में खुशहाली आवैगी।

जनता हमनै अपना मित्र अर हितचिंतक मानैगी अर एक बेहतर जीवन दृष्टि अपना कै अज्ञात अर अंधविश्वास फैलाने आली अवैज्ञानिक ताकतां के खिलाफ लड़ण मैं सक्षम हो सकैगी। बिल्कुल अनपढ़ अर गरीब किसान भी जानै सै अक अपने खेत मैं उसनै जो फसल पैदा करनी सै वह खाद बीज पानी वगैरह के साथ ही हो सकै सै। या फसल ना तै हिन्दुत्व, भारतीयता अर कै सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नारयां तै पैदा होगी अर ना किन्हीं अंधविश्वासां अर कर्म काण्डां तै।

हटकै विवेक अपनी जागां बनावैगा अर जनपक्षीय विज्ञान का विकास होगा। जिसतै समाज का आम जनता का विकास होगा। काम आसान नहीं। फेर मुश्किल बी कोन्या जै जनता के समझ मैं आज्या तो। समझल्यो तावले से मेरे बीरा। मनै बेरा सै अन्धविश्वास पैर फैलान्ते जाण लागरे सैं।

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