वैज्ञानिक सोच: सवाल पूछने की आदत ही असली प्रगति है Scientific Thinking: The habit of asking questions is true progress. हम अक्सर विज्ञान को किताबों, प्रयोगशालाओं और वैज्ञानिकों तक सीमित कर देते हैं। जबकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ केवल विज्ञान पढ़ना नहीं है। इसका अर्थ है-हर बात को तर्क, प्रमाण और अनुभव की कसौटी पर परखना। वैज्ञानिक सोच सवाल प्रगति आदत डॉ रीटा अरोड़ा Scientific mindset, questioning, progress, habit, Dr. Rita Arora डॉ रीटा अरोड़ा एक बच्चा अपनी माँ से पूछता है- “माँ, ग्रहण के समय खाना क्यों नहीं खाना चाहिए?” माँ कहती है-“क्योंकि हमारे बुजुर्ग ऐसा कहते आए हैं।” बच्चा फिर पूछता है-“लेकिन क्यों?” यही छोटा-सा “क्यों?” वैज्ञानिक सोच की शुरुआत है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण हमें सिखाता है कि किसी बात को केवल इसलिए सच न मानें क्योंकि वह वर्षों से कही जा रही है, किसी प्रभावशाली व्यक्ति ने कही है या बहुत सारे लोग उस पर विश्वास करते हैं। पहले प्रश्न पूछें, फिर तथ्य देखें और उसके बाद निष्कर्ष निकालें। हमारे संविधान में भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विशेष महत्व दिया गया है। नागरिकों के मूल कर्तव्यों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और जिज्ञासा की भावना विकसित करना शामिल है। इसका कारण स्पष्ट है-एक समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब उसके लोग अंधविश्वास से अधिक तर्क पर भरोसा करें। लेकिन वैज्ञानिक सोच का अर्थ परंपराओं का विरोध करना नहीं है। हर परंपरा गलत नहीं होती और हर आधुनिक विचार सही नहीं होता। वैज्ञानिक दृष्टिकोण हमें किसी चीज़ को बिना समझे स्वीकार करने या अस्वीकार करने से रोकता है। हमारे रोज़मर्रा के जीवन में इसके अनेक उदाहरण दिखाई देते हैं। व्हाट्सऐप पर कोई संदेश आता है- “इस घरेलू नुस्खे से सात दिन में हर बीमारी ठीक हो जाएगी।” वैज्ञानिक सोच वाला व्यक्ति उसे तुरंत आगे नहीं भेजेगा। वह पूछेगा- इस दावे का स्रोत क्या है? क्या कोई शोध हुआ है? क्या डॉक्टर इसकी पुष्टि करते हैं? कोई कहता है- “यह निवेश कभी नुकसान नहीं देगा।” वह पूछेगा- जोखिम क्या है? पिछले आँकड़े क्या कहते हैं? कोई व्यक्ति किसी एक घटना के आधार पर पूरे समुदाय या वर्ग के बारे में निष्कर्ष निकाल देता है। वैज्ञानिक सोच हमें याद दिलाती है कि एक उदाहरण प्रमाण नहीं होता। यही सोच व्यवसाय और जीवन में भी जरूरी है। यदि किसी कंपनी की बिक्री गिर रही है, तो अच्छे प्रबंधक अनुमान लगाने की बजाय डेटा देखते हैं। ग्राहक कम हुए हैं या औसत खरीद घट गई? कीमत समस्या है या उत्पाद? पहले कारण समझा जाता है, फिर समाधान खोजा जाता है। विज्ञान की सबसे सुंदर बात यह है कि वह अपनी गलती स्वीकार करने से नहीं डरता। कोई नया प्रमाण मिलता है तो पुरानी धारणा बदली जा सकती है। इसलिए वैज्ञानिक सोच हमें केवल बुद्धिमान ही नहीं, विनम्र भी बनाती है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया और सूचनाओं की बाढ़ के दौर में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पहले से कहीं अधिक जरूरी है। हमारे सामने हर दिन हजारों दावे आते हैं। सच और झूठ के बीच अंतर करने के लिए केवल शिक्षा पर्याप्त नहीं है; सोचने की सही पद्धति चाहिए। इसलिए बच्चों को केवल उत्तर याद करवाने के बजाय प्रश्न पूछना सिखाना होगा। “क्या?” से आगे बढ़कर “क्यों?” और “कैसे?” पूछना होगा। क्योंकि जिस समाज में सवाल पूछने की आज़ादी और आदत जीवित रहती है, वहीं नए विचार जन्म लेते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रयोगशाला से शुरू नहीं होता। वह उस क्षण शुरू होता है, जब हम किसी बात को सुनकर पूछते हैं- “इसका प्रमाण क्या है?” ~डॉ रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

वैज्ञानिक सोच: सवाल पूछने की आदत ही असली प्रगति है

डॉ रीटा अरोड़ा

 

एक बच्चा अपनी माँ से पूछता है-

“माँ, ग्रहण के समय खाना क्यों नहीं खाना चाहिए?”

माँ कहती है-“क्योंकि हमारे बुजुर्ग ऐसा कहते आए हैं।”

बच्चा फिर पूछता है-“लेकिन क्यों?”

यही छोटा-सा “क्यों?” वैज्ञानिक सोच की शुरुआत है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण हमें सिखाता है कि किसी बात को केवल इसलिए सच न मानें क्योंकि वह वर्षों से कही जा रही है, किसी प्रभावशाली व्यक्ति ने कही है या बहुत सारे लोग उस पर विश्वास करते हैं। पहले प्रश्न पूछें, फिर तथ्य देखें और उसके बाद निष्कर्ष निकालें।

हमारे संविधान में भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण को विशेष महत्व दिया गया है। नागरिकों के मूल कर्तव्यों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और जिज्ञासा की भावना विकसित करना शामिल है। इसका कारण स्पष्ट है-एक समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब उसके लोग अंधविश्वास से अधिक तर्क पर भरोसा करें।

लेकिन वैज्ञानिक सोच का अर्थ परंपराओं का विरोध करना नहीं है। हर परंपरा गलत नहीं होती और हर आधुनिक विचार सही नहीं होता। वैज्ञानिक दृष्टिकोण हमें किसी चीज़ को बिना समझे स्वीकार करने या अस्वीकार करने से रोकता है।

हमारे रोज़मर्रा के जीवन में इसके अनेक उदाहरण दिखाई देते हैं।

व्हाट्सऐप पर कोई संदेश आता है-

“इस घरेलू नुस्खे से सात दिन में हर बीमारी ठीक हो जाएगी।”

वैज्ञानिक सोच वाला व्यक्ति उसे तुरंत आगे नहीं भेजेगा। वह पूछेगा-

इस दावे का स्रोत क्या है?

क्या कोई शोध हुआ है?

क्या डॉक्टर इसकी पुष्टि करते हैं?

कोई कहता है-

“यह निवेश कभी नुकसान नहीं देगा।”

वह पूछेगा-

जोखिम क्या है?

पिछले आँकड़े क्या कहते हैं?

कोई व्यक्ति किसी एक घटना के आधार पर पूरे समुदाय या वर्ग के बारे में निष्कर्ष निकाल देता है। वैज्ञानिक सोच हमें याद दिलाती है कि एक उदाहरण प्रमाण नहीं होता।

यही सोच व्यवसाय और जीवन में भी जरूरी है। यदि किसी कंपनी की बिक्री गिर रही है, तो अच्छे प्रबंधक अनुमान लगाने की बजाय डेटा देखते हैं।

ग्राहक कम हुए हैं या औसत खरीद घट गई?

कीमत समस्या है या उत्पाद?

पहले कारण समझा जाता है, फिर समाधान खोजा जाता है।

विज्ञान की सबसे सुंदर बात यह है कि वह अपनी गलती स्वीकार करने से नहीं डरता। कोई नया प्रमाण मिलता है तो पुरानी धारणा बदली जा सकती है। इसलिए वैज्ञानिक सोच हमें केवल बुद्धिमान ही नहीं, विनम्र भी बनाती है।

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया और सूचनाओं की बाढ़ के दौर में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पहले से कहीं अधिक जरूरी है। हमारे सामने हर दिन हजारों दावे आते हैं। सच और झूठ के बीच अंतर करने के लिए केवल शिक्षा पर्याप्त नहीं है; सोचने की सही पद्धति चाहिए।

इसलिए बच्चों को केवल उत्तर याद करवाने के बजाय प्रश्न पूछना सिखाना होगा।

“क्या?” से आगे बढ़कर “क्यों?” और “कैसे?” पूछना होगा।

क्योंकि जिस समाज में सवाल पूछने की आज़ादी और आदत जीवित रहती है, वहीं नए विचार जन्म लेते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रयोगशाला से शुरू नहीं होता।

वह उस क्षण शुरू होता है, जब हम किसी बात को सुनकर पूछते हैं-

“इसका प्रमाण क्या है?”

~डॉ रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

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