बंगाल में सांप्रदायिक ज़हर की खेती तेज़ हो गई है!

पिछले कुछ दिनों से RW का आईटी सेल वाले एक झूठा नैरेटिव चला रहे हैं — कि खुदीराम को फाँसी “अब्दुल करीम” नाम के किसी व्यक्ति की झूठी गवाही पर दी गई।

बंगाल में सांप्रदायिक ज़हर की खेती तेज़ हो गई है!

शीतल पी सिंह

खुदीराम बोस (3 दिसंबर 1889 – 11 अगस्त 1908) भारत के सबसे युवा क्रांतिकारियों में से एक थे। महज 18 साल की उम्र में उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाया। 30 अप्रैल 1908 को मुजफ्फरपुर में जज किंग्सफोर्ड को मारने के इरादे से बम फेंका गया। गलती से प्रिंगल कैनेडी की पत्नी और बेटी मारी गईं। खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी भाग निकले। प्रफुल्ल ने खुद को गोली मार ली, जबकि खुदीराम 25 मील पैदल चलकर वैनी (अब खुदीराम बोस पूसा) स्टेशन पहुँचे।
1 मई 1908 की सुबह वहाँ दो सिपाहियों — फतेह सिंह और शिवप्रसाद सिंह — ने उन्हें पहचाना और गिरफ्तार किया। दोनों ऊँची जाति के हिंदू सिपाही थे। उनकी सतर्कता से खुदीराम एक दुकान के पास घिर गए। अंग्रेज सरकार ने इन दोनों को इनाम भी दिया।
कोर्ट में गवाह बने लोग:
कोचवान कलीराम
• उसका सहायक संगतराम दूसाध
• धर्मशाला के कर्मचारी खेमन कहार और रामधीर मिशिर
• सिपाही फतेह सिंह, शिवप्रसाद सिंह
• और कुछ अन्य सिपाही — तहसीलदार खान, फैयाजुद्दीन खान, याकूब अली
पूरे मामले में “अब्दुल करीम” नाम का कोई गवाह, मुखबिर या व्यक्ति ऐतिहासिक रिकॉर्ड में नहीं मिलता। न गिरफ्तारी में, न मुकदमे में, न हाईकोर्ट के फैसले में।
फिर भी पिछले कुछ दिनों से RW का आईटी सेल वाले एक झूठा नैरेटिव चला रहे हैं — कि खुदीराम को फाँसी “अब्दुल करीम” नाम के किसी व्यक्ति की झूठी गवाही पर दी गई। यह पूरी तरह गलत है। इतिहास में ऐसा कोई नाम ही नहीं है।
यह साफ-साफ सांप्रदायिक शरारत है।
खुदीराम बोस जैसे शहीद को लेकर हिंदू-मुस्लिम बाँटने की कोशिश करना शर्मनाक है। गिरफ्तार करने वाले दोनों मुख्य सिपाही हिंदू थे। ज्यादातर अहम गवाह भी हिंदू नाम वाले थे। कुछ मुस्लिम सिपाही भी गवाह बने, लेकिन उनमें से कोई “अब्दुल करीम” नहीं था।
आजादी की लड़ाई में हिंदू-मुस्लिम दोनों ने अपना योगदान दिया। खुदीराम बोस की कहानी को सांप्रदायिक रंग देकर नफरत फैलाना न तो इतिहास का सम्मान है, न शहीदों का।
खुदीराम बोस अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे, किसी धर्म के खिलाफ नहीं। उनकी शहादत को सस्ती पॉलिटिक्स का औजार बनाने वाले लोग वास्तव में उनके बलिदान का अपमान कर रहे हैं।
इतिहास पढ़ो, झूठ मत फैलाओ।
वंदे मातरम।

शीतल पी सिंह के फेसबुक वॉल से साभार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *