आज़ादी के बाद की गुलामी

कभी आदेश बाहर से आता था, अब कई बार भीतर से उठता है। कभी कोई सत्ता हमारी सीमाएँ तय करती थी, अब अनेक बार हमारी इच्छाएँ, भय और पूर्वाग्रह स्वयं हमारे चारों ओर दीवारें खड़ी कर देते हैं।

वर्तमान माहौल में यह विचार बहुत ही मायने रखता है। तमाम लोगों की पीड़ा और चिंता को आवाज देता यह लेख स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आपको अवश्य पसंद आएगा। संपादक

आज़ादी के बाद की गुलामी

रत्ना भदौरिया

आज़ादी आई, मगर क्या सचमुच वह सब कुछ अपने साथ ले आई, जिसे गुलामी कहा जाता था?
कैलेंडर के पन्ने बदले, झंडे का रंग बदला, सत्ता की चौखट पर चेहरे बदले—लेकिन उन चौखटों के बाहर खड़ी ज़िंदगी की भाषा कितनी बदली? इतिहास ने पराधीनता की जंजीरें उतार दीं, पर उनकी खनक शायद अब भी हमारी नसों में कहीं बची हुई है। गुलामी केवल किसी विदेशी सत्ता के अधीन होने का नाम नहीं; वह मनुष्य के भीतर पैदा की गई वह आदत भी है, जिसमें वह अपने वास्तविक प्रश्नों से आँख चुराकर किसी और प्रश्न में शरण लेने लगता है।
कभी कहा जाता था कि इस धरती पर दूध की नदियाँ बहती थीं। अब उन्हीं नदियों की स्मृति के किनारे प्यासे कंठ दिखाई देते हैं। कुएँ सूखते हैं, नल प्रतीक्षा में जंग खाते हैं, बस्तियाँ पानी की एक बूँद के लिए सुबह से शाम तक कतारों में खड़ी रहती हैं। मगर इसी समय शहरों की दीवारों पर धार्मिक घोषणाएँ चमकती रहती हैं। पानी की खाली बाल्टी और आस्था से भरे पात्र के बीच खड़ा मनुष्य कभी-कभी स्वयं यह भूल जाता है कि उसकी प्यास किसकी देन है।
मंदिर और मस्जिद के बीच उठती आवाज़ें अक्सर इतनी ऊँची होती हैं कि रसोई में चूल्हे की बुझती आवाज़ सुनाई नहीं देती। घंटियों और अज़ानों के बीच बेरोज़गार हाथों की खामोशी दब जाती है। धार्मिक पहचान के शोर में उस किसान की मिट्टी की गंध खो जाती है, जिसकी फसल मौसम से पहले बाज़ार के हाथों सूख जाती है। शहरों की चमक के नीचे मजदूर के पसीने का नमक दिखाई नहीं देता।
यह कैसी विडंबना है कि जिन प्रश्नों का उत्तर रोटी, पानी, शिक्षा, रोज़गार और सम्मान में होना चाहिए, वे प्रश्न अक्सर धर्म की मोटी चादर के नीचे सोते मिलते हैं।
मनुष्य अपने ही बनाए प्रतीकों के जंगल में भटक रहा है। उसे बताया जाता है कि कौन उसका अपना है और कौन पराया। उसके हाथ में कभी झंडा थमा दिया जाता है, कभी नारा, कभी कोई धार्मिक पहचान। वह पहचान को अपनी भूख से बड़ा समझने लगता है। उसके घर की खाली थाली धीरे-धीरे उसकी दृष्टि से ओझल होती जाती है, लेकिन पड़ोसी की पूजा-पद्धति उसे असह्य दिखाई देने लगती है।
शायद गुलामी की सबसे गहरी शक्ल यही है—जब आदमी अपनी बेड़ियों को पहचानना छोड़कर दूसरे की बेड़ियों की गिनती करने लगे।
आज़ादी की सुबह से बहुत उम्मीदें थीं। मगर सुबह का सूरज हर आँगन में एक-सा नहीं उतरता। कहीं वह काँच की इमारतों पर चमकता है, कहीं टीन की छत पर तपता है, कहीं झुग्गी के फटे पर्दे से छनकर आता है और कहीं पानी की खाली सुराही में अपना चेहरा देखता हुआ लौट जाता है।
इतिहास के बड़े उत्सवों के बीच वर्तमान की छोटी-छोटी त्रासदियाँ अक्सर अनाथ रह जाती हैं।
हमने सत्ता बदलने को परिवर्तन समझ लिया, पर शायद व्यवस्था के भीतर बैठे पुराने साए उतनी आसानी से नहीं बदलते। गुलामी का चेहरा बदल सकता है; उसकी प्रवृत्तियाँ नहीं। कभी आदेश बाहर से आता था, अब कई बार भीतर से उठता है। कभी कोई सत्ता हमारी सीमाएँ तय करती थी, अब अनेक बार हमारी इच्छाएँ, भय और पूर्वाग्रह स्वयं हमारे चारों ओर दीवारें खड़ी कर देते हैं।
और उन दीवारों पर धर्म के रंग बहुत आसानी से चढ़ जाते हैं।
फिर कोई यह नहीं पूछता कि पानी किसका है, खेत किसका है, स्कूल किसके लिए है, अस्पताल किसकी पहुँच में है, रोज़गार किसके हिस्से में है। प्रश्न धीरे-धीरे अपना अर्थ खो देते हैं और बहसें अपनी दिशा। मनुष्य अपने जीवन से जुड़े प्रश्नों को पीछे छोड़कर उन मुद्दों पर लड़ने लगता है, जिनमें उसकी व्यक्तिगत जीत भी उसके जीवन की हार को नहीं बदलती।
शायद इसी जगह आज़ादी और गुलामी एक-दूसरे के बहुत करीब आ खड़ी होती हैं—एक हाथ में स्वतंत्रता का झंडा होता है और दूसरे हाथ में उन अदृश्य रस्मों की डोर, जिन्हें पीढ़ियाँ बिना पूछे आगे बढ़ाती रहती हैं।
नदियों का नाम बचा रहता है, नदी नहीं।
मंदिर खड़े रहते हैं, मनुष्य झुकता रहता है।
और आज़ादी—
वह शायद किसी सरकारी इमारत की दीवार पर टँगी हुई तस्वीर में मुस्कराती रहती है, जबकि बाहर एक आदमी खाली बर्तन लिये पानी की प्रतीक्षा में खड़ा है।

रत्ना भदौरिया के फेसबुक वॉल से साभार

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