पश्चिम बंगाल के असली हीरो कौन : सुभाष चंद्र बोस या श्यामा प्रसाद मुखर्जी?
शुभम शर्मा
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ज़बरदस्त जीत के बाद बंगाल के लिए नए नायकों को सामने लाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। पश्चिम बंगाल के नए वित्त मंत्री और इतिहासकार स्वप्न दासगुप्ता इस मुहिम की अगुवाई कर रहे हैं। वे और उनकी पार्टी हिंदू महासभा और बाद में भारतीय जनसंघ के नेता रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी को (पश्चिम) बंगाल का असली नायक बताकर उनके इर्द-गिर्द एक नई छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
खासकर बंगाल राजनीति में, जब भी किसी नए नायक को लेकर कोई नया ‘मिथ’ (यानी किसी की छवि को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना) बनाया जाएगा, तो उसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मज़बूत विरासत का सामना करना ही होगा। श्यामा प्रसाद के मामले में तो यह बात और भी साफ़ है, क्योंकि राजनीति में वे नेताजी के समकालीन थे।

श्यामा प्रसाद दक्षिणपंथी सांप्रदायिक राजनीति से जुड़े थे, जबकि सुभाष बोस — जिन्हें गांधीजी ने ‘देशभक्तों का राजकुमार’ कहा था — वामपंथी और उपनिवेशवाद-विरोधी विचारधारा से जुड़े थे। सुभाष बोस ‘वामपंथी’ और ‘दक्षिणपंथी’ जैसी वैचारिक श्रेणियों को बहुत गंभीरता से लेते थे। अपनी किताब ‘द इंडियन स्ट्रगल’ में उन्होंने खुद को वामपंथियों के साथ जोड़ा ; उनके शब्दों में, वामपंथी वे लोग थे जो ‘‘सामाजिक और आर्थिक मुद्दों यानी जाति, ज़मींदार बनाम किसान और पूंजी बनाम श्रम से जुड़े मुद्दों पर क्रांतिकारी विचार रखते थे।’’
नेहरू के बारे में, जिन्हें बोस ने ‘पक्के समाजवादी’ कहा था, बोस ने लिखा था : ‘‘हालांकि उनका दिमाग वामपंथियों के साथ है, लेकिन उनका दिल महात्मा गांधी के साथ है।’’ ज़ाहिर है, बोस की विचारधारा के दायरे में श्यामा प्रसाद और हिंदू महासभा धुर दक्षिणपंथी खेमे में थे, जिन्होंने जाति, किसान बनाम ज़मींदार और पूंजी बनाम श्रम जैसे सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को गंभीरता से नहीं लिया था।

औपनिवेशिक भारत में उपनिवेश-विरोधी राजनीति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के मामले में सुभाष बोस और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं और वामपंथी (व्यापक अर्थों में) खेमे से हिंदू दक्षिणपंथी गुट काफी पीछे छूट गए थे। श्यामा प्रसाद और उनकी पार्टी ‘हिंदू महासभा’ ने, और ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस)’ ने कभी भी अंग्रेजों से आज़ादी का कोई औपचारिक प्रस्ताव पारित नहीं किया था, जैसा कि ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ ने 1929 में अपने लाहौर अधिवेशन में किया था।
हिंदू दक्षिणपंथी गुट के ऐसा न करने का मुख्य कारण राष्ट्रवाद की उनकी परिभाषा थी। बोस के लिए भारतीय राष्ट्रवाद ब्रिटिश शासन के संयुक्त विरोध से बन रहा था। इसके विपरित, श्यामा प्रसाद और उनके समर्थकों ने भारतीय राष्ट्रवाद को पूरी तरह हिंदू नज़रिए से और धार्मिक अल्पसंख्यकों (जिन्हें वे बाहरी मानते थे, खासकर मुस्लिमों को) के विरोध में परिभाषित किया। सोच की यही कड़ी आज़ादी से पहले से लेकर अब तक हिंदू राष्ट्रवाद या ‘हिंदुत्व’ के सभी समर्थकों को एक साथ जोड़ता है।
सुभाष बोस न सिर्फ़ इस तरह की राजनीति को नापसंद करते थे, बल्कि बंगाल में इसके ख़िलाफ़ शारीरिक बल का इस्तेमाल करने के लिए भी तैयार थे। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि उनके समर्थकों ने बंगाल में हिंदू महासभा की सभाओं पर हमले किए और उन्हें भंग किया था। ऐसी ही एक झड़प में श्यामा प्रसाद भी शारीरिक रूप से घायल हो गए थे। सुभाष बोस और उनके भाई बंगाल कांग्रेस में ऐसे उग्रवादी नेताओं के तौर पर उभरे, जो ज़मींदारी प्रथा को खत्म करने और गरीबों के हित में सुधार लाने के लिए प्रतिबद्ध थे।
बांग्ला कांग्रेस के भीतर का दक्षिणपंथी गुट, बंगीय ब्राह्मण सभा और बाद में हिंदू महासभा उनके मुख्य वैचारिक विरोधी बन गए थे। सुभाष बोस ने राजनीति का अपना पहला पाठ देशबंधु चित्तरंजन दास से सीखा था, जिनके लिए बंगाली मुसलमानों का राजनीतिक उत्थान सबसे महत्वपूर्ण था। इस दिशा में ‘बंगाल पैक्ट’ एक अहम पड़ाव था।
सुभाष बोस का मानना था कि हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना भारत और बंगाल, दोनों का कोई भविष्य नहीं है। इस बात पर ज़ोर देने के पीछे निजी कारण भी थे। भारत पर राज करने वाले मुस्लिम शासकों और हिंदुओं के बीच हमेशा टकराव की हिंदू दक्षिणपंथी सोच के विपरित, बोस अतीत को एक मिली-जुली संस्कृति के तौर पर देखते थे, जिसमें हिंदू भी मुसलमानों की तरह ही शासक वर्ग का हिस्सा थे। उनके अपने पूर्वजों ने बंगाल में मुग़ल-पूर्व मुस्लिम सुल्तानों की सेवा की थी।
उनके पूर्वजों में से एक, महीपति को सुल्तान ने ‘सुबुद्धि खान’ (सुबुद्धि का अर्थ है अच्छी सलाह देने वाला) की उपाधि दी थी। महीपति के पोते, गोपीनाथ बोस, सुल्तान हुसैन शाह (1493-1519) के शासनकाल में वित्त और नौसेना के मंत्री बने और उन्हें ‘पुरंदर खान’ की उपाधि मिली। अपनी जवानी के दिनों में, वे (सुभाष बोस) स्वामी विवेकानंद, आदि शंकराचार्य, ब्रह्म आंदोलन, लीक से हटकर सोचने वाले ईसाइयों और यहाँ तक कि हेगेल जैसे अलग-अलग तरह के विचारों से प्रभावित थे।
जब बंगाल में हिंदू महासभा की शुरुआत हुई, तो सुभाष बोस को बहुत निराशा हुई। वायसराय लिनलिथगो ने लंदन में अपने आकाओं से बड़े उत्साह के साथ कहा, ‘‘मौजूदा हालात को देखते हुए मुझे हैरानी नहीं होगी कि महासभा कांग्रेस का कुछ प्रभाव या लोकप्रियता छीनने में कामयाब हो जाए।’’ जैसे ही (द्वितीय विश्व) युद्ध शुरू हुआ, अंग्रेजों ने हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग जैसे सांप्रदायिक संगठनों को बढ़ावा दिया। बंगाल में सुभाष बोस ने इसके नतीजों को किसी और से कहीं ज़्यादा गहराई से समझा। मार्च 1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर प्रस्ताव के बाद, बंगाल में मुसलमानों की राय उसकी ओर झुकने लगी।
सुभाष बोस ने सी आर दास के ‘बंगाल पैक्ट’ के एक नए रूप के ज़रिए बंगाल में हिंदू-मुस्लिम एकता बनाने की कोशिश की। उनका मकसद था कि वे हिंदुओं और मुस्लिमों को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट करें, इससे पहले कि ज़्यादातर गैर-लीग मुसलमान, लीग के सांप्रदायिक एजेंडे से पूरी तरह प्रभावित हो जाएं। उन्होंने कृषक प्रजा पार्टी के नेता अब्दुल मंसूर अहमद के सामने यह बात साफ़ तौर पर रखी। बोस ने अप्रैल 1940 में कलकत्ता कॉर्पोरेशन के चुनाव में मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन किया।
गठबंधन ने चुनाव में ज़बरदस्त जीत हासिल की और बोस ने खुद मेयर पद के लिए बंगाल मुस्लिम लीग के नेता अब्दुर रहमान सिद्दीकी का नाम घोषित किया। क्या करिश्माई और समझौता न करने वाले सुभाष बोस के लिए 1941 में भारत छोड़ने से पहले बंगाल में सांप्रदायिकता की लहर को रोकना मुमकिन होता? यह इतिहास से जुड़ी एक दिलचस्प कल्पना होगी।
हमारे संदर्भ में ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि श्यामा प्रसाद बंगाल की राजनीति में सक्रिय थे और उनकी कोशिशों ने हिंदू-मुसलमानों के बीच की खाई को कम करने के बजाय और बढ़ाया। उदाहरण के लिए, सितंबर 1939 में श्यामा प्रसाद ने ‘भारत सेवाश्रम संघ’ की एक बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें 2,600 लोग शामिल हुए थे। इस बैठक में बंगाली हिंदुओं से कहा गया कि वे अपना शरीर मज़बूत करें, लाठियाँ साथ रखें, अहिंसा का रास्ता छोड़ें और पौरुष (मर्दानगी) विकसित करें।
बंगाल की राजनीतिक अर्थव्यवस्था, जिसमें हिंदू ज़मींदारों का सामना मुख्य रूप से मुस्लिम किसानों से होता था, ने भी बंगाल की राजनीति का स्वरूप तय करने में अहम भूमिका निभाई। अर्थव्यवस्था और पहचान इस तरह आपस में जुड़े हुए थे कि आज़ादी की प्रक्रिया भी अक्सर सांप्रदायिक रंग से अछूती नहीं रह पाती थी। सुभाष बोस के जाने के बाद, बंगाल में राजनीति के पूरी तरह सांप्रदायिक होने को रोकने वाला कोई नहीं बचा था।
अपने बड़े मिशन पर होने के बावजूद, बोस ने हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने के लिए बहुत कुछ किया। उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज के झंडे पर टीपू सुल्तान के ‘छलांग लगाते हुए बाघ’ के निशान को अपनाया, आज़ाद हिंद फ़ौज की एक ब्रिगेड का नाम मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के नाम पर रखा, अपनी सेना के लिए तीन उर्दू शब्द – एतमाद (विश्वास), इत्तेफ़ाक़ (एकता) और क़ुरबानी (बलिदान) – को नारे के तौर पर अपनाया, और आज़ाद हिंद फ़ौज के शीर्ष कमांडरों के तौर पर मुस्लिमों को नियुक्त किया।
उन्होंने बर्मा में बहादुर शाह ज़फ़र की मज़ार का भी दौरा किया और उन्हें “भारत की आज़ादी के लिए लड़ने वाले आखिरी सिपाही” के तौर पर सराहा। उन्होंने आगे कहा : “वे ऐसे व्यक्ति थे, जो इंसानों के बीच एक सम्राट थे और साथ ही सम्राटों के बीच एक इंसान थे। हम बहादुर शाह की याद को संजोकर रखते हैं। हम भारतीय, चाहे किसी भी धर्म को मानने वाले हों, उनकी याद को इसलिए संजोते हैं, क्योंकि उन्होंने ही अपने देशवासियों को आज़ादी का बिगुल फूँकने का आह्वान किया था… बल्कि इसलिए भी, क्योंकि वे ऐसे व्यक्ति थे, जिनके झंडे तले सभी धर्मों को मानने वाले भारतीयों ने लड़ाई लड़ी थी।”
आज़ाद हिंद फ़ौज के कैदियों पर चले मुकदमों की वजह से कांग्रेस, मुस्लिम लीग और कम्युनिस्टों के बीच एकता बनी, भले ही यह एकता कुछ समय के लिए ही रही। 22 नवंबर 1945 को कलकत्ता के सभी मज़दूर हड़ताल पर चले गए। ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’ ने इसे भारत में ब्रिटिश शासन को खत्म करने के लिए एक राष्ट्रीय विद्रोह के रूप में दिखाया, जिसे मुख्य रूप से सुभाष बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज ने आगे बढ़ाया था।
श्यामा प्रसाद की राजनीति के साथ धर्मनिरपेक्ष, उपनिवेश-विरोधी राष्ट्रवाद का ऐसा कोई इतिहास नहीं जोड़ा जा सकता। बंगाल को किसी नए नायक की ज़रूरत नहीं है। बंगाली धर्मनिरपेक्षता के पास सुभाष बोस जैसा महान व्यक्तित्व है। उसे बोस से कमतर किसी नए बौने की ज़रूरत नहीं है।
