कविता
नई पीढ़ी का ऐलान
अनुपम शर्मा
ये नई नस्ल के पंछी हैं
पिंजरबंद ना रह पाएंगे
माओवादी, नक्सलवादी नहीं ये
जेन जी, अल्फा कहलाएंगे
तुम कब तक इनको डराओगे
डंडे बरसाओगे
और फिर
बहलाओगे, फुसलाओगे
नई जेनरेशन ये सब जान गई है
चेहरे अच्छे से पहचान गई है
इसलिए अब वो
दो जून रोटी की खातिर
हर अन्याय से टकराएंगी
भूखे पेट सवाल करेगी
मेहनतकश का हाथ थामेगी
अन्याय से आँख मिलाकर
अपने हिस्से का हक माँगेगी।
मार्क्स,लेनिन और भगत सिंह का स्वप्न पढ़ेगी
सर्वहारा का हाथ थामेगी
नई सुबह के गीत रचेगी
और एक दिन
लाल परचम लहराएगी
लाल परचम लहराएगी।
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