हिंदी कविता की स्वविवेकी पड़ताल वाया डॉ. बाबू जोसफ़

हिंदी कविता की स्वविवेकी पड़ताल वाया डॉ. बाबू जोसफ़

बजरंग बिहारी तिवारी

हिंदी कविता की दुनिया बड़ी भरी-पूरी है। कई पीढ़ियो के कवि एक साथ सक्रिय हैं। इस काव्य-जगत में कई विचार दृष्टियों की सक्रियता भी है। डॉ. बाबू जोसफ ने अपने लिए कोई खाँचा नहीं बनाया है। वे सभी धाराओं के कवियों को पढ़ते हैं, समझते हैं, उन पर चर्चा करते हैं। लेकिन, वे लिखते उन्हीं कवियों पर हैं जो उन्हें रुचते हैं। उनका लेखन देखने पर ज्ञात होता है कि प्रगतिशील धारा के कवि उन्हें विशेष प्रिय हैं। यह प्रगतिशीलता मानव मात्र को बराबर मानती है। उसके लेखे जन्म, रक्त, रंग/वर्ण, क्षेत्र के आधार पर किया जाने वाला भेदभाव अनुचित है, अमान्य है। जीवन जीने के सभी संसाधनों तक सभी मनुष्यों की पहुँच होनी चाहिए। वैयक्तिक गरिमा की रक्षा की जानी चाहिए। वंचित तबकों की तरफ़ विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। स्त्रियों, बच्चों, बुजुर्गों के लिए हिंसामुक्त वातावरण सुनिश्चित करना चाहिए। दलितों, आदिवासियों के लिए सत्ता संरचना में जगह बनायी जानी चाहिए। विकलांगों को पूरी संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ने के मौके मुहैया कराए जाने चाहिए। साम्प्रदायिक वैमनस्य देश की उन्नति में रोड़ा है। विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच सद्भाव क़ायम होना ही चाहिए। देश की प्रगति के लिए ज़रूरी है कि अल्पसंख्यक समूह सुरक्षित महसूस करें। भाषा, धर्म, पंथ के आधार किसी के साथ भेदभाव न हो।

अल्पसंख्यक समुदायों को ऐसे संवेदनशील व्यवहार का भरोसा मिलना आवश्यक है।
कविता मुक्त करती है। बेहतरीन कविता यह काम बेहतरीन ढंग से करती है। यह मुक्ति कभी बाहर से शुरू होकर भीतर पहुँचती है और कभी भीतर से आरंभ होकर बाहर जाती है। व्यक्तियों का अनुकूलन करने वाला सत्तातंत्र किसी भी राह से आ सकता है। जिन्हें हम ‘संस्कार’ कहते हैं और आजीवन उसकी रक्षा में प्रवृत्त रहने का संकल्प दोहराते रहते हैं उसकी भी सतत समीक्षा की ज़रूरत होती है। अविचारित, अशोधित, अमूल्यांकित संस्कार जड़ता पैदा करते हैं। व्यक्ति जाने-अनजाने उनसे जकड़ा रहता है। वे उसकी ‘आत्मा’ अथवा अंतःकरण को इस तरह आच्छादित कर लेते हैं कि उन संस्कारों के पुनरीक्षण की कभी आवश्यकता ही नहीं अनुभव होती। यह जड़ता मानसिक ग़ुलामी का ही दूसरा रूप है। इसे लादे हुए लोगों से आप आत्मावलोकन के लिए नहीं कह सकते। उन्हें आत्मपरिष्कार के लिए कहना संकट मोल लेना है। इन दिनों यह संकट गहरा हुआ है। धर्मसत्ता से पोषित ‘संस्कार’ वास्तव में जड़ताएं हैं। ये अपने प्रभाव क्षेत्र में आए व्यक्ति को अतिरिक्त रूप से ‘सेंटीमेंटल’ और आक्रामक बनाती हैं।

आक्रामकता संक्रमित होती जाती है और आख़िरकार महामारी जैसी स्थिति तक पहुँच सकती है। हमारा समाज उस महामारी की ज़द में आया प्रतीत हो रहा है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने ‘भारत भारती’ में लिखा है कि उत्कृष्ट कविता समाज अथवा देश में सद्भाव बनाए रखती है। मध्यकालीन भारत में संत-रचनाकारों ने यह भूमिका निभाई थी। आधुनिक युग में नवजागरणकालीन कवियों ने सामाजिक ताने-बाने में सौहार्द स्थापित किया था। प्रगतिवादी कवियों ने सामाजिक-आर्थिक विषमता को हटाने पर बल देते हुए तमाम उत्पीड़ितों के बीच एकता क़ायम करने की पुरज़ोर कोशिश शुरू की थी। यह कोशिश आज भी ज़ारी है।

डॉ. बाबू जोसफ़ ने एक तरफ़ कुमार अंबुज, भगवत रावत, वेदप्रकाश अमिताभ जैसे कवियों पर विचार किया है वहीं दूसरी तरफ़ असंगघोष जैसे दलित अस्मितावादी कवि पर भी कलम चलाई है। कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की पीड़ा उकेरने वाले अग्निशेखर की कविताओं की मार्मिक व्याख्या करते हुए लेखक ने अपेक्षाकृत कम चर्चित विजय संदेश, लखनलाल सिंह आरोही और आनन्द स्वरूप श्रीवास्तव के काव्यजगत से हमारा परिचय कराया है। हम उनकी पारखी निगाह की बदौलत केरल की हिंदी कवयित्री डॉ. नवीना के भाव संसार में विचरण कर पाते हैं। इसी तरह मलयालम के अराजकतावादी कहे जाने वाले कवि ए. अय्यप्पन की कविताओं के हिंदी अनुवाद का स्वागत करते हुए उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष दिए हैं। विमर्शमूलक काव्य हमारे समय की बहसधर्मी धारा है। तीन महत्त्वपूर्ण विमर्शों को चुनकर उन्होंने उस जगत में नए पाठकों के प्रवेश हेतु मार्ग बनाया है। ये विमर्श हैं दलित, पर्यावरण और स्त्री। कथाकार जगदीश चंद्र के उपन्यास ‘नरककुण्ड में बास’ पर लिखते हुए डॉ. जोसफ़ ने इसे ‘दलित जीवन का महाकाव्य’ कहा है।

किताब का समापन डॉ. बाबू जोसफ़ ने अपने यात्रा वृत्तांतों से किया है। यात्राएँ भी मुक्तिकारी होती है। दुनिया देखे बगैर न हम अपनी संकीर्णताओं से मुक्त होते हैं और न प्रकृति का वैविध्य समझ पाते हैं। डॉ. बाबू जोसफ़ ने देश के भीतर उत्तराखंड की यात्रा का वृत्तांत लिखा है और देश के बाहर जार्जिया, मारिसस और रूस भ्रमण का अनुभव साझा किया है। मुझे मरमंस्क की यात्रा बड़ी लोमहर्षक प्रतीत हुई।

मुझे विश्वास है कि हिंदी पाठक डॉ. बाबू जोसफ़ की यह दिलचस्प किताब पढ़ेंगे, चर्चा करेंगे और गुण-दोष का विवेचन करते हुए अन्य पाठकों को भी पुस्तक पढ़ने की प्रेरणा देंगे। लेखक को इसी तरह उत्साहित किया जा सकता है और उसे अगले प्रोजेक्ट में लगाया जा सकता है। अपसंस्कृति से लड़ने का एक तरीका यह है कि पठन संस्कृति का विकास किया जाए। पुस्तकें पढ़ने को आंदोलन की तरह चलाया जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *