कविता
पता नहीं?
– मंजुल भारद्वाज
खरपतवार सा खप जा
घास सा सब जगह पसर जा
जानवर चर जायेंगे
पांव मसल जायेंगे
एक बूंद नमी से भी
तुम ज़िंदा रहोगे !
ज़िंदा रहना ही
तुम्हारा सुकूं है
चैन है
जीवन लक्ष्य है !
हर पल रौंदे जाना
क्या जीवन है ?
नहीं है तो
क्यों रौंदे जा रहे हो ?
सैंकड़ों कुचले गए
एक बाबा के सत्संग में
हज़ारों बह गए बाढ़ में
कितने जल गए नफ़रत की आग में
हां वो धर्म, अंधश्रद्धा के शिकार हुए
विकास को उन्होंने लील लिया!
हाईवे पर महंगी गाड़ी में
धू धू कर कौन जला ?
डंपर पलटने से कौन मरा ?
हज़ारों बाइक सवार की मौत का
ज़िम्मेदार कौन ?
दो वैक्सीन से मरने वालों की
मौत का कौन ज़िम्मेदार?
सामंतवाद के गुलाम दिखते थे
बदन भूख से कंकाल हो जाता था
आज गुलाम सामंतवाद से दिखते नहीं है
वो भूखे नहीं खाए पिए हैं
अनपढ़ नहीं पढ़े लिखे हैं
उनके दिमाग में गुलामी का चिप लगा है
हाथ में एनराइड स्मार्ट फ़ोन है
24 घंटे अदृश्य मालिक उन पर नज़र रखता है
यह विकास की गुलाम पीढ़ी
उसे हर पल सजदा करती है
ईएमआई भरती है
उसके बनाए उत्पाद खरीदती है
धर्म के नाम पर मर मिटती है
एक अनपढ़ को चुनती है!
आवाज़ उठाने वालों को
सत्ता कौड़े मारती है
बुलडोजर से ज़मीदोज़ करती है
मीडिया के रोबोट उसे कानून का राज बताते हैं
अदालतें मौन हो तमाशा देखती हैं!
जब गुलाम अपने आप को
आज़ाद मानने के भ्रम में हैं
हज़ारों चैनलों पर पसरे गंद को
जन्नत मान रहे हैं
जंगल काट कर कंक्रीट के टावर्स को
विकास मान रहे हैं
तब भी
क्यों लिख रहा हूं?
पता नहीं?
क्योंकि मैंने
प्राकृतिक जंगल देखा है
शुद्ध पानी के झरने देखें हैं
विविधता से हरे भरे माहौल में
पंछियों को उन्मुक्त उड़ते देखा है
पसरी हुई घास के साथ साथ
हर मौसम में आपदाओं से
लड़ने वाले
ज़मीन में अपनी ऊंचाई से ज्यादा गहरी जड़ें जमाए
सीधे तने बरगद के पेड़ों को देखा है!
